किस्सा आगरा का है। एक कमरे में 2 लड़के रहते थे। होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के बाद इंटर्नशिप कर रहे थे। उनके कमरे में एक दिन सिलिंडर फट गया। एक अखबार ने खबर छापी कि सिलिंडर नहीं, बम ब्लास्ट था। रिपोर्टर को क्लू मिला या पुलिस ने इसे प्लांट कराया, आज तक यह साबित नहीं हुआ।
पुलिस, एसटीएफ, आईबी सब जांच में जुट गई। यह वही दौर था जब साबरमती ट्रेन में ब्लास्ट की चर्चा पूरे देश में थी। स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) पर प्रतिबंध लगाने की आवाज उठ रही थी। आज के जेएनयू (JNU) की तरह उस वक्त अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) चर्चा में थी।
जिन लड़कों के कमरे में ब्लास्ट हुआ, उनमें से एक ने एएमयू से पढ़ाई की थी। सिद्धार्थ नगर में एक गांव है बगहवा। उसी गांव के अब्दुल मुबीन एएमयू से बीयूएमएस (BUMS) कर रहे थे। पढ़ाई के दौरान उस लड़के से कभी-कभार यूनिवर्सिटी में ही मुबीन से मुलाकात हो जाती। चाय-नाश्ते के बीच देश, राजनीति आदि पर भी चर्चा होती।
सिमी पर जब प्रतिबंध की बातें चलने लगीं तो कई लोगों ने संगठन छोड़ा था। उनमें से मुबीन भी एक थे। लेकिन, जब सबकुछ ठीक था तो मुबीन ने उस लड़के को सिमी से जुड़े कुछ लेख दिए थे। जिस घर में ब्लास्ट हुआ था, वहां पुरानी किताबों के बीच ये लेख भी रखे थे। हां, एक बात याद रखना, अप्रैल 1977 में जब मोहम्मद अहमदुल्ला सिद्दीकी ने सिमी की नींव रखी तो वह छात्र हितों की आवाज उठाने वाला संगठन था।
अखबार में बम ब्लास्ट की खबर छपी तो दूसरे समाचार पत्रों ने भी फॉलो किया। तमाम कयासबाजी खबरों का रूप लेने लगीं। दूसरी तरफ सिमी से जुड़े लेख मिले तो आग में घी का काम किया। लड़के मुसलमान थे। फिर आतंकी कनेक्शन के कई तार अखबारों में जुड़ने लगे।
मुबीन का बीयूएमएस का कोर्स लगभग पूरा हो चला था। कहीं प्रैक्टिस करने की वे सोच रहे थे। तभी एक दिन एसटीएफ और आईबी ने उन्हें एएमयू से उठा लिया। कई दिनों तक अवैध हिरासत में रखकर टॉर्चर किया गया। पहले आगरा ब्लास्ट में आरोपी बनाया। फिर लखनऊ में सहकारिता भवन के पास, कानपुर में कूड़े के ढेर में ब्लास्ट, फिर साबरमती एक्सप्रेस में बम धमाके (Sabarmati express bomb blast case) का आरोपी बना दिया गया।
8 वर्षों तक मुबीन विभिन्न जेलों में रहे। कभी 6X6 के सेल में बंद किया गया तो कभी खुंखार कैदियों के बीच आतंकी बोलकर छोड़ा गया। खुंखार कैदी देशद्रोही बोलकर तमाम तरह की यातनाएं देतें। मारपीट तो आम बात थी।
रमजान का पाक महीना आता तो मुबीन ज्यादा परेशान हो जाते। 6 बाई 6 की सेल शाम होते बंद हो जाती। शौच के लिए एक डिब्बा रखा था। रात में डिब्बा भर जाता तो सेल में गंदगी फैलती। सुबह सेल खुलने पर उसे साफ करने की जिम्मेदारी मुबीन की होती। दिन में रोजा रखते और रात में इस डर से ज्यादा न खाते कि पेट खराब हुआ तो दिक्कत बढ़ जाएगी। यह सेल जमीन से 10 फुट नीचे थी। वहां गर्मी में भीषण उमस और सर्दी में कड़ाके की ठंड लगती।
8 वर्षों बाद जेल से छूटे तो उनकी 6 महीने की बेटी साढ़े 8 साल की हो चुकी थी। बड़ा बेटा 22 साल का हो गया था। डॉक्टर बनकर बच्चों की अच्छी पढ़ाई और परवरिश का उनका ख्वाब चकनाचूर हो गया था। घर में पत्नी की हालत बिल्कुल मौन वाली हो चुकी थी। बच्चे भी अपने बाप को नहीं पहचान रहे थे। बड़े भाई किसी तरह परिवार और मुबीन का कानूनी खर्च उठा रहे थे। बाद में मुबीन की छोटी बेटी की मौत हो गई।
करीब 17 साल तक केस चला। सभी केस में मुबीन बरी हो गए। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी कि एक बेकसूर की जिंदगी बरबाद करने वालों से मुआवजे की वसूली होनी चाहिए। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ। मुबीन कानून की नजर में अब आतंकी नहीं हैं। उन्होंने अपने बच्चों का बचपना नहीं जीया। उन्हें मनमाफिक तालीम और सुख-सुविधाएं नहीं दे सके।
आज भी लोगों की नजर में मुबीन पर आतंकी होने का ठप्पा लगा है। कोर्ट ने मुबीन को बेकसूर होने का फैसला सुनाया तो अखबारों ने लिखा- ‘आतंकी मुबीन पुलिस की लचर जांच से रिहा।’ इंटरनेट पर मौजूद खबरों में मुबीन पर लगा आतंकी का ठप्पा आज भी बरकरार है। रिश्तेदार, दोस्त सब दूर हो गए। मुबीन अब निजी संस्थान में अंग्रेजी पढ़ाते हैं। करीब 6 बीघा खेत है, जिसमें खाने भर का अनाज भी उगा लेते हैं।
सोर्सः किताब #बाइज्जत बरी की एक कहानी।

टिप्पणियाँ
न जाने कितने मुबीन और अन्य लोग ऐसी पत्रकारिता का शिकार हुए होंगे और हो रहे ही।
आर एन डी बिल्कुल शून्य है, केवल एक दूसरे की पूंछ हाथ में लेकर काम होनराहा है।