बजरंग बली के भक्त को सताया तो अकबर को करना पड़ा पलायन, मरघट बन गया था समृद्ध शहर

1571 से 1585 के बीच फतेहपुर सीकरी देश के सबसे खुशहाल इलाकों में शुमार था। अकबर ने अपनी राजधानी बनाई थी। लेकिन, 1585 के अंतिम समय में फतेहपुर सीकरी में भयंकर सूखा पड़ा। पीने के पानी के लिए भी लड़ाई-झगड़े होने लगे। बीमारियों से लोग दम तोड़ने लगे। हालात इतने विकट हो गए कि अकबर भी दिल्ली कूच कर गया। कहते हैं कि फतेहपुर सीकरी के इस हालात का जिम्मेदार अकबर का एक आदेश था। 


महावीर बजरंग बली के एक भक्त को कैद में रखने का शाप था। 40 दिन की कैद के बाद भी जब भक्त को आजाद नहीं किया तो बंदरों ने हमला कर दिया। सैनिक, कारोबारी, किसान, कलाकार, शिक्षक बंदरों के हमले से सब परेशान हो गए। बंदरों के डर से अकबर ने भी खुद को एक कमरे में कैद कर लिया। अंत में बीरबल के अनुरोध पर उस भक्त को तुरंत रिहा किया गया। फिर अचानक से बंदरों की वह फौज गायब हो गई। यह कहानी है तुलसीदास की। 


एक दिन सुबह में तुलसीदास कहीं जा रहे थे। रास्ते में एक महिला मिली। उसने उन्हें प्रणाम किया तो तुलसीदास ने सौभाग्यवती भव का आशीर्वाद दे दिया। तब उस स्त्री ने कहा- हे महात्मा, मेरे पति का अभी निधन हो गया। अब आपके इस आशीर्वाद का कोई महत्व नहीं। तुलसीदास बोले- देवी, मेरा आशीर्वाद कभी खाली नहीं गया है। उन्होंने शव के पास खड़े सभी लोगों से आंख बंद कर जय श्रीराम का जप करने के लिए कहा। कुछ ही देर में महिला के पति ऐसे खड़े हुए, जैसे कोई गहरी नींद से उठा हो। 


तुलसीदास के इस चमत्कार की खबर अकबर के दरबार तक पहुंची। अकबर भी चमत्कार देखना चाहता था, इसलिए तुलसीदास को दरबार में बुलाया। सैनिक बुलावा लेकर पहुंचे तो तुलसीदास ने जाने से मना कर दिया। बोले- प्रभु की सेवा में लीन एक आम आदमी की सम्राट के दरबार में क्या जरूरत? अकबर को बेइज्जती लगी। उन्होंने सैनिकों से कहा कि तुलसीदास को कैद करके हाजिर करो। गिरफ्तार कर तुलसीदास को अकबर के दरबार में हाजिर किया गया। 


अकबर ने तुलसीदास से कहा कि अपने प्रभु श्रीराम को याद करके चमत्कार दिखाओ। तुलसीदास निडर होकर अकबर से बोले- मैं चमत्कार नहीं करता। प्रभु श्रीराम अपने भक्तों की रक्षा करने खुद आ जाते हैं। अकबर इस बात से इतना आक्रोशित हुआ कि उसने तुलसीदास को जेल में डालने का हुक्म दिया। बोला- अब देखते हैं कि तुम्हारे प्रभु श्रीराम कैसे आते हैं? तब तुलसीदास ने कहा कि इतने तुच्छ काम के लिए प्रभु श्रीराम को आने की जरूरत नहीं। उनके सेवक वीर हनुमान ही काफी हैं। 


अकबर की उसी कैद में तुलसीदास ने हनुमान चालीसा की रचना की। 40 दिन लगातार हनुमान चालीसा का पाठ करते रहे। 40वें दिन अचानक से बंदरों की फौज ने हमला कर दिया। महल की हर चीज को उखाड़ने लगे। अचानक से इतने बंदर देख सैनिक भी परेशान हो गए। पूरे राज्य में त्राहिमाम मच गया। बंदरों के डर से अकबर ने भी महल के एक कमरे में खुद को कैद कर लिया। तब बीरबल को एक हाफिज ने याद दिलाया कि तुलसीदास को कैद में रखने का यह नतीजा तो नहीं? 


बीरबल अकबर के पास पहुंचे। उन्होंने हाफिज की पूरी बात बताई। तब अकबर ने फौरन ही तुलसीदास को रिहा करने का आदेश दिया। जेल से जैसे ही तुलसीदास निकले बंदरों की फौज अचानक से लापता हो गई। फिर सबकुछ सामान्य हो गया। लेकिन, एक भक्त को अनायास कैद में रखने का दंड अकबर को मिलना ही था। कुछ ही महीने बीते थे कि फतेहपुर सीकरी में पीने के पानी की भयंकर किल्लत हुई। सूखे की वजह से अकाल के हालात बन गए। जान बचाने के लिए अकबर ने फिर राजधानी को दिल्ली शिफ्ट किया। इस तरह एक आबाद शहर महज 10-15 वर्षों में ही खंडहर होने लगा। 


प्रफेसर आर. नाथ की किताब India As Seen by William Finch में इस घटना का जिक्र किया है। 1608 से 1613
के बीच विदेशी यात्री विलियम फिंच ने देश के कई हिस्सों का भ्रमण किया था। जब वह फतेहपुर सीकरी पहुंचा तो बेहद जिर्णशीर्ण हालत में पूरा शहर था। पीने के पानी की बड़ी समस्या थी। लोगों बताते थे कि जब से तुलसीदास को कैद किया गया, तब से समृद्ध नगर निर्धन हो गया। अपने अंतिम दिनों में अकबर ने आदेश जारी किया कि श्रीराम और हनुमान के भक्तों को किसी तरह से परेशान न किया जाए...


कहा जाता है कि अकबर की उसी कैद में तुलसीदास ने हनुमान चालीसा की रचना की थी। "जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहिं बंदि महा सुख होई" हनुमान चालीसा का यह दोहा तुलसीदास ने खुद पर अजमाया था। उन्होंने 40 दिन हनुमान चालीसा का पाठ किया और अकबर को मजबूर होकर रिहा करना पड़ा।

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