मिशन नहीं कारोबार बनी पत्रकारिता
प्रदीप तिवारी : भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के आंदोलन ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। राजनीति के बड़े-बड़े महारथी भी इस समर में निहत्थे हो गए। आंदोलन को छोटी सी चिंगारी समझने वाली सरकार को आभास भी न था कि यह एक शोला है। बूढ़े, बच्चे, जवान, महिला, पुरुष, यहां तक कि सरकारी हुक्मरान भी इस आंदोलन में शामिल होकर गर्व से इस आंदोलन का समर्थन किया। पूरी दुनिया को एक बार फिर से भारत में अन्ना रूपी गांधी का दर्शन हुआ। इस ऐतिहासिक क्षण ने चैथे स्तंभ की भी दीवाली मना दी। मीडिया पर नजर रखने वाली वेबसाइट हूट ने अन्ना के इस आंदोलन का विश्लेषण किया। हूट के अनुसार 16 अगस्त से 28 अगस्त तक मीडिया ने करोड़ो रुपये अतिरिक्त कमाएं। मीडिया ने 304 घंटे केवल इस आंदोलन से जुड़ी हुई खबरों को दिया। इस दौरान विभिन्न चैनलों ने 8455 खबरों का प्रसारण किया गया। आंदोलन के पक्ष में कुल 8240 खबरें दिखाई गई लेकिन विरोध में केवल 215 खबरें प्रसारित की गइ्र्र। चैनलों को कुल 470.28 करोड़ रुपये का विज्ञापन इस आंदोलन से प्राप्त हुआ। अर्थ जगत की खबरों के लिए समर्पित चैनलों ने भी बहती गंगा में हांथ धो कर 60 करोड़ रुपये कमाए।
लोगों का मत है कि अन्ना ने तो केवल अनशन किया, असली आंदोलन तो मीडिया के द्वारा हुआ। अन्ना के अनशन से जहां पूरा विश्व हलकान था वहीं मीडिया की बांछे खिली हुई थी। बलात्कार, लूट जैसी खबरों को चटकारे के साथ परोसने वाली मीडिया को इतने दिनों के मध्य एक भी बार ऐसी खबर दिखाने का समय नहीं मिला। देश भर के पत्रकार उमस भरी गर्मी में एसी का सुख छोड़ रामलिला ग्राउंड में परेड करते नजर आए। पत्रकारिता एक मिशन का राग अलापने वाली मीडिया इस आंदोलन में एक मझे हुए कारोबारी की भांति करोबार करती रही। अब तो यह बहस का मुद्दा है कि मीडिया ने अन्ना को इस्तेमाल किया या फिर अन्ना ने मीडिया को। लेकिन इस आंदोलन में सेंसेक्स गिरा तो कांग्रेस का। दशकों के अंतराल पर आई यूपीए सरकार को इस आंदोलन ने फिर से कई वर्श के वनवास का दुस्वप्न तो जरुर दिखा दिया। इसी के साथ भाजपा को अपनी पकड़ आम जनता तक बनाने का एक मौका भी दे दिया। आंदोलन ने विश्व को दिखा दिया कि भारत एक पूर्ण गणतंत्र देश है। यहां पर किसी की दादागिरी नहीं चल सकती। देश की सर्वेसर्वा, केवल यहां की जनता है।
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