कब आएगा कलयुग में श्रवण

कब आएगा कलयुग में श्रवण
प्रदीप तिवारी: एक अक्टूबर अर्थात वरिष्ठ नागरिक दिवस, भारत ही नहीं वरन पूरा विश्व इस दिन को वरिष्ठ नागरिक दिवस के रूप में मनाता है। मैं यहां विश्व की बात न करके केवल अपने देश भारत की बात करना चाहता हूं। यह केवल इस लिए क्योकि मैं मानता हूं कि विश्व की सभ्यताओं की जननी है हमारे देश की सभ्यता। इस देष में श्रवण कुमार, श्री रामचंद्र जैसे मातृ-पितृ भक्त पुण्यात्माओं ने जन्म लिया। यह सत्य है या असत्य, यह तो वाद-विवाद का विषय है, परन्तु इनकी कहानियों ने हमें बचपन में ही माता-पिता की सेवा का ज्ञान कराया। हां वही बचपन जब हमे अच्छे-बुरे, सही-गलत का जरा भी ज्ञान न था। हमने बिस्तर गीला किया तो उन्होने हमें सूखे में सुला कर स्वयं गीले में सो गए। रात में नीद नहीं आई तो अपनी नीद को भूला कर लोरी सुनाई। पांव के छालों के दर्द को भूल हमें अपने कंधों पर घुमाया। जीवन के सफर में अनेक कष्टों को उठाते हुए विश्व का हर एक सुख देने की कोशिश की। उम्मीद थी कि सारा दर्द बेटा बड़ा होकर जरुर दूर करेगा। 20-25 सालों की तपस्या के बाद जब फल मिलने की बारी आई तो बेटा प्रोफेशनल हो गया, और एक ही सांस में बोल गया- दिस इस इनफ डैड, अब मै आपको नहीं झेल सकता, प्लीज आप लोग ओल्ड एज होम में शिफ्ट हो जाएं, जो भी खर्चा होगा मैं दे दूंगा।शायद कुछ ऐसे ही शुरु हुआ ओल्ड एज होम्स का सफर।
सरकार ने भी इस कड़वे सच को समझा और अनेक तरह की सुविधाए देने लगी। बृद्धा पेंशन, सफर के दौरान किराए में रियायत आदि। लेकिन हद तो तब हो गई जब देश के सर्वोच्च न्यायालय को भी इस विषय पर हस्तक्षेप करना पड़ा। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा कि बुजुर्ग माता-पिता का उत्पीड़न करने वालों को सख्त से सख्त सजा दी जाए। यहां बात यह उठती है कि क्या किसी कानून या सजा के डर से मानवता का पाठ पढ़ाया जा सकता है? हमें सोचना होगा की आखिर गलती कहां से हुई। क्या हमारी शिक्षा में ही दोष है जो हमें संस्कार नहीं दे पाई, केवल एक मशीन बना दिया? कारण जो भी हो लेकिन मुद्दा बड़ा है। समाज को इस वर्ग पर इनायत की नजर न करके समस्या के कारण को तलाश करने की आवश्यकता है। विकास तो जरुरी है लेकिन सभ्यता को ताक पर रख कर नहीं। किसी देश का भविष्य ओल्ड ऐज होम्स के विकास पर नहीं टिका होना चाहिए। आज हर तरफ केवल एक ही नारा देखने को मिलता है की आज के युवा ही देश का भविष्य है लेकिन क्या 60-70 साल के अनुभव को दरकिनार करके विकास की यात्रा की जा सकती है? हमें अपनी सोच को बदलना होगा। तभी एक विकसित भारत का निर्माण किया जा सकता है। दोगुने से अधिक का बसंत देख चुके इन सिपाहियों के बिना हम विकास का युद्ध नहीं जीत सकते हैं। इस बात को भी अपने जेहन में रखना होगा। झुर्रियों के बीच से आई हुई एक हंसी लाखों सूर्य से ज्यादा रोशन करने का हौंसला रखती हैं। इसको हमेशा याद रखना होगा। तभी हमारे जीवन की यात्रा सुगम होगी। 

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