शनि के सेल्समैन
प्रदीप तिवारी : ‘भैया जै शनि देव’, एक पल के लिए चैक गए। सामने 6-7 वर्ष का दुबला-पतला एवं मैला-कुचला कपड़ा पहने एक लड़का, हांथ में कमंडलनुमा डिब्बा उसमे कुछ सिक्कों के साथ एक लौह मुर्ती, तेल में डूबी हुई। आंखों में कुछ पाने की आस और जिन्दगी के साथ संघर्ष उस नव संचित पौधे में सहर्ष ही देखा जा सकता था। पूछने पर उसने अपना नाम अकरम बताया। इससे मैं दंग रह गया। एक पल को लगा क्या यह बालक धर्म के नाम पर रोटी सेकने वालों को मुंह चिढ़ा रहा है या उस अदृश्य शक्ति का अर्थ समझा रहा है। कारण जो भी हो पर उसके लिए शनि देव का नाम दिन भर में 200-300 रुपये का इंतजाम है, ना मिलने पर शायद भूखा सोना पड़े।
प्रमुख चैराहों के साथ लगभग सभी मन्दिरों पर शनि नाम का यह धंधा देखा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि इन सब जगह केवल अकरम जैसे बच्चे ही सर्वशिक्षा अभियान को मुंह चीढ़ा रहे है, हट्टे-कट्टे नौजवानें के साथ औरतंे और लड़कियां भी बढ़-चढ़ कर इस रोजगार में शामिल हैं। शायद इनके लिए सबसे बड़ा धर्म छुधा पूर्ति है। अब थोड़ा धर्म की बात कर ले तो सनातन धर्म में साफ कहा गया है कि शनि मुर्ति का स्पर्श महिलाओं के लिए वर्जित है। शनि देव को न्याय का देवता कहा गया है। ये सभी को उनके कर्म के अनुसार फल और दंड देते है। अब बात ध्यान देने वाली यह है कि हमारे-आपके एक-दो रुपये से इनका कितना भला हो रहा है या नुकसान हो रहा है। बात वैसे भी ध्यान देने लायक है क्यों कि शनि के ठेकेदारों ने लोगों के बीच ऐसी छवि पेश किया की हर कोई यहां बेबस हो गया। हर्र लगे न फिटकीरी रंग चोखा ही चोखा शायद लोगों को इसी लिए शनि नाम का यह धंधा खूब भा रहा है। सरकारी जमीन, जहां खाली देखी बस वहीं लग गई शनि नाम की दुकान। बाल शिक्षा अधिकार व रोजगार गारंटी अधिनियम आदि लागु करने से पहले सरकार की नजर, शनि के इन सेल्समैन्स पर क्यों नहीं जाती? क्या इस धंधे की चहलकदमी सत्ता के गलियारों तक है? आदि सवाल ज्वार-भंाटे की तरह दिमाग में आता है। लोग कहते हैं कि आस्था अंधी होती है, लेकिन कोई उनसे तो पूछे की क्या अंधों को अहसास भी नहीं होता? हम एक-दो रुपये देने से पहले क्या यह नहीं सोच सकते कि आस्था के नाम पर यह उचित है?
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