युद्ध अयोध्या का
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले का एक छोटा सा कस्बा ‘आयोध्या’। सूरज का प्रकाश चिडि़यों की चहचआहट और सितारों के बीच से चन्द्रमा की शीतलता अन्य स्थानों की भाँति ही सामान्य, फिर भी समय-समय पर आपसी हिंसा और विद्वेश की आग में जलता, असहाय अयोध्या। कारण केवल अहिंसा और भाईचारे के संदेशक, “ईश्वर या अल्ला”।त्रेता युग के चैथे चरण में हिन्दूओं के आराध्य श्री रामचन्द्र इस भूमि पर अवतरित हुए थे। हिन्दुओं की आस्था का यही प्रमुख कारण है।
ईसा शताब्दी के एक दशक पूर्व अवन्तिका पति महाराजा विक्रमादित्य ने ठीक उसी स्थान पर एक भव्य मंन्दिर का निर्माण करवाया। शायद उन्हें आभास भी न था कि भविष्य में यही मंन्दिर, आराध्य श्री राम के आदर्शो के हनन करने का कारण बनेगा।
श्री राम चन्द्र की यह जन्म भूमि हूण, बौद्ध, शक् और मुसलमानों के अत्याचार, लूट के साथ इनके संस्कृति को समेटने के इतिहास का पर्याय बनी। इस मंन्दिर को लुटने में किसी ने कोई कमी नहीं छोड़ी, परन्तु यहाँ की मूर्ति को नष्ट-भ्रष्ट करने का साहस किसी का नहीं हुआ।
इसवी सन् की 14वीं शताब्दी में भारत पर मुगलों का वर्चस्व हो गया। 25 अप्रेल 1526 ई0 को जब बाबर दिल्ली सिंहासन पर बैठा तब जन्मभूमि पर महात्मा श्यामानन्द का अधिकार था। बाबर ने श्यामानन्द के शिष्य जलाल शाह को मन्दिर तोड़ कर मस्जिद बनाने के लिए बाध्य कर दिया। बाबर यह कार्य अपने वजीर मीरबांकी खाँ को सुपुर्द करके वापस दिल्ली चला गया। श्यामानन्द जी अपने शिष्य की इस करतूत पर पछताते हुए प्रतिमा को सरयू में प्रवाहित कर, दिव्य ग्रह को अपने साथ लेकर उत्तराखण्ड की ओर चले गये। पुजारियों ने मंन्दिर पार्षद आदि का सामान हटा दिया और प्रातःकाल मंन्दिर द्वार पर खड़े होकर कहा कि “पहले हम मरेंगे फिर मंन्दिर के अन्दर कोई प्रवेश करेगा।”
जलालशाह की आज्ञानुसार तोपों की मार से मन्दिर गिरा दिया गया। मन्दिर की सामग्री से मस्जिद का निर्माण प्रारम्भ हुआ। दिन भर जितनी दीवार बनती शाम को वह अपने आप गिर पड़ती थी। इस कारण वजीर मीर बांकी हैरानी के साथ चारों ओर संगिनो का पहरा लगा दिया, मगर यह सिलसिला नहीं रूका। अन्त में बाबर ने निर्माण कार्य रूकवा दिया, और महात्माओं से मस्जिद बनाने का उपाय पूछा। मस्जिद का रूप न देने के साथ इसे ‘सीता पाक’ के नाम से प्रसिद्ध करने का सुझाव बाबर को स्वीकार हो गया।
1528 ई0 में मंन्दिर के चारो ओर की दीवार गिरा दी गयी और द्वार पर मुडि़या और फारसी भाषा में “श्री सीता पाक” लिखवा कर मस्जिद का रूप दे दिया गया।
“मस्जिद तो बना ली दम भर में,
ईमा की हरारत वालों ने।
मन अपना पुराना पापी था,
वरषों में नमाजी बना न सका।।”
विक्षुब्ध और दुःखी हिन्दुओं के आँसु पोछते हुए बाबर ने, मुसलमानों को सिर्फ जुमें की नमाज पढ़ने के आदेश के साथ हिन्दुओं को मस्जिद के अन्दर पुजा-पाठ की अनुमति दे दी, और अपनी धार्मिक कुटनीति से श्री राम चन्द्र की पावन जन्म भूमि पर मस्जिद निर्माण में सफल हो गया।
‘ऐ हवा के झकोरों कहाँ आग ले के निकले।
मेरा गाँव बच सकें तो मेरी झोपड़ी जला दों।।
काश उस वक्त निष्ठुर, अत्याचारी, धर्म अज्ञानी बाबर इन पक्तियों पर ध्यान दिया होता तो आज सबसे बड़े धर्म मानवता का ऐसा नंगा नाच अयोध्या में नहीं होता।
18वीं शताब्दी में न्यायिक प्रक्रिया के बहाल होेने पर आस्था का यह सैलाब धीरे-धीरे हिचकोले लेने लगा और सिल सिले वार बाद-परिवाद का दौर शुरू हो गया।
जनवरी 1885 - सर्वप्रथम पं0 हरिकृष्ण ने फैजाबाद के आयुक्त से विवादित स्थल के बाहर चबुतरें पर मंन्दिर बनाने की अनुमति माँगी। आयुक्त ने मुसलमानों की आपत्ति के कारण इसे अस्वीकार कर दिया।
फरवरी 1885- फैजाबाद के सब जज ने अपने आदेश में कहा कि चबुतरे की भूमि वादी की है। लेकिन वहाँ मंन्दिर नहीं बनाया जा सकता क्योंकि, यह स्थल मस्जिद के बहुत निकट है और मुकदमा खारिज कर दिया गया।
मार्च 1885- जिला जज (फैजाबाद) ने निरीक्षण के पश्चात् अपील खारिज करने के साथ-साथ चबुतरे की भूमि को भी वादी के अधिकार से हटा दिया। जिला जज ने अपने फैसले में यह भी कहा कि मस्जिद का निर्माण बाबर ने कराया था।
मार्च 1886- वादी ने अवध के न्यायिक आयुक्त के समक्ष अपील की, लेकिन वादी द्वारा अपने दावे के पक्ष में ठोस प्रमाण प्रस्तुत न कर पाने पर नवम्बर 1886 में यह मुकदमा समाप्त हो गया।
फरवरी 1944- शिया और सुन्नी सम्प्रदाय ने मस्जिद के निर्माणकर्ता के विषय में सिविल जज फैजाबाद की अदालत में एक मुकदमा दायर किया।
मार्च 1946- इस मुकदमें का फैसला सुनते हुए सिविल जज फैजाबाद ने कहा इसका निर्माण बाबर ने कराया था, लेकिन इसमें दोनों संम्प्रदाय के लोग नमाज अदा कर सकते हैं।
22 दिसम्बर 1949- कुछ व्यक्तियों ने इस स्थल पर प्रतिमाएँ स्थापित कर दी और इस बात का प्रचार किया कि भगवान स्वयं यहाँ प्रकट हुए है। फैजाबाद के जिलाधीश कृष्ण कुमार ने मूर्तियाँ हटा लेने का आदेश दिया, परन्तु मुख्य गृह सचिव एवं पुलिस महानिरीक्षक ने आदेश को अस्वीकार कर दिया। तर्क दिया कि, इससे बड़ी संख्या में दंगा भड़क सकता है।
दिसम्बर 1949- सरकार ने इस स्थल की देख-रेख के लिए रिसीवर नियुक्त कर दिया।
16 जनवरी 1950- फैजाबाद के सिविल जज ने मूर्तियों की पूजा-अर्चना का अधिकार देने के साथ-साथ इस स्थान से मूर्तियाँ न हटाये जाने पर एक अंतरिम निषेधाज्ञा जारी कर दी।
1959- हिन्दू पक्ष की ओर से तीसरा दावा निर्मोही अखाडे़ की तरफ से दाखिल और मुकदमा संख्या 26/1959 के रूप में दर्ज। इस मुकदमें में रिसीवर से कब्जा दिलाये जाने की बात कही गयी।
दिसम्बर 1961- मूर्तियाँ रखने की तारीख से 12 साल के अन्दर मुसलमानों की ओर से एक दावा मालिकाना हक और कब्जा वापसी के बावत दाखिल किया गया।
18 दिसम्बर 1985- भाजपा के शीर्ष नेता फैजाबाद के जिला जज से मिले ओर अगले दिन राम लला के दर्शन करने की इच्छा के साथ-साथ उन्होंने कहा कि ताला बन्दी की कोई कानूनी अनुमति नहीं है।
26 जनवरी 1986- अयोध्या के एक वकील ने सदर मुसिफ की अदालत मंे अर्जी दी कि दर्शन और पूजा पर प्रतिबन्ध न लगाया जाय, लेकिन उन्होंने ऐसा आदेश देने से मना कर दिया।
1 फरवरी 1986- जिला जज के0 एन0 पाण्डेय ने अपील को स्वीकार करते हुए वादी समुदाय के सदस्यों को दर्शन तथा पूजा करने से न रोकने के आदेश दिये। इसी शाम 5ः20 पर ताला खोल दिया गया।
3 फरवरी 1986- मो0 हासिम ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट के समझ स्टे के लिए अर्जी दी।
14 फरवरी 1986- मुसलमानो ने काला दिवस मनाया।
9 अक्टूबर 1989- भाजपा के शिला पूजन पर रोक लगाने के लिए वी0एम0 तारकुण्डे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
22 अक्टूबर 1989- तारकुण्डे की याचिका पर निर्णय देते हुए कोर्ट ने शिला पूजन पर रोक लगाना मौलिक अधिकारों का हनन बताया।
2 नवम्बर 1989- शाम को शिला पूजन का कार्य पूरा हो गया।
5 नवम्बर 1989- शिलाए अयोध्या पहुँचनी आरम्भ हो गयी।
7 नवम्बर 1989- हाईकोर्ट ने उ0प्र0 सरकार से उसकी, शिलान्यास पर रोक लगाने सम्बन्धि याचिका पर यह पूछा कि यह स्थल विवादित है या नहीं ।
8 नवम्बर 1989- सरकार ने घोषणा की शिलान्यास स्थल विवादित भूमि नहीं है, तथा शिलान्यास स्थल पर तैनात पुलिस बल हटा लिया गया है।
11 नवम्बर 1989- जिलाधीश फैजाबाद की आज्ञा से निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गयी।
फरवरी 1990- प्रधानमंत्री ने राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के सदस्यों से बातचीत करके इस समस्या के हल के लिए कुछ और समय की माँग की, समिति ने चार माह का समय दिया।
25 सितम्बर 1990- आडवानी की सोमनाथ से रथ यात्रा आरम्भ हुई।
23 अक्टूबर 1990- बिहार में आडवानी गिरफ्तार, देशभर में ब्यापक दंगा हुआ।
30 अक्टूबर और 2 नवम्बर 1990- कार सेवकों द्वारा अयोध्या में भगवा ध्वज फहराया गया। पुलिस और कारसेवकों के बीच मुठभेड़ में 22 कार सेवको की मृत्यु हुई। बी0एच0पी0 द्वारा यह संख्या सैकड़ों बताई गयी।
9 अक्टूबर 1991- उ0प्र0 सरकार द्वारा विवादित स्थल से सटी भूमि 2.77 एकड़ का अधिग्रहण कर लिया गया। सरकार ने भूमि अधिग्रहरण का उद्देश्य पर्यटन का विकास बताया।
5 फरवरी 1992- हाईकोर्ट ने 14 अगस्त 1989 के आदेश को गलत बताने वाली याचिका को रद्द करते हुए पुनः उसी आदेश को दुहराया।
6 दिसम्बर 1992- कार सेवकों ने विवादित स्थल को तोड़ डाला।
16 दिसम्बर 1992- ढांचे को ढहाये जाने की जाँच हेतु, लिब्राहन आयोग का गठन, 6 माह के अन्दर जाँच खत्म करने को कहा गया।
7 जनवरी 1993- केन्द्र सरकार की ओर से एक आर्डिनेंस जारी करके हाईकोर्ट में चल रहे सभी मुकदमों को निरस्त कर दिया गया और राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से इस सवाल का जवाब माँगा गया कि विवादित भवन की जगह पर कभी कोई दूसरा धार्मिक निर्माण या भवन था या नहीं।
24 अक्टूबर 1994- इस रिफरेंस को वापस करते हुए अयोध्या एक्वेजिशन एक्ट की धारा 4 (3) तहत, जिसके तहत हाईकोर्ट में चल रहे मुकदमों को निरस्त किया गया था को खारिज करते हुए मुकदमों की सुनवाई हाईकोर्ट में करवाने का निर्णय हुआ।
जनवरी 1995- सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार हाईकोर्ट में मुकदमों की सुनवाई शुरू हुई।
जुलाई 1996- हाईकोर्ट ने सभी दीवानी वादों पर एक साथ सुंनवाई करवाने को कहा।
17 मई 2002- मुसलमानो की तरफ से जबानी गवाही जारी रही।
5 मार्च 2003- कोर्ट ने विवादित स्थल व आस-पास खुदाई का आदेश दिया।
12 मार्च से 7 अगस्त 2003- खुदाई का कार्य ए0 एस0 आई0 ने किया।
22 अगस्त 2003- ए0 एस0 आई ने अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश किया।
जुलाई 2005- संदिग्ध आतंकवादी ने विवादित स्थल पर हमला किया। सुरक्षाबलों ने 5 आतंकवादियों को मार गिराया।
11 अगस्त 2006- मुस्लिम पक्ष की गवाही खत्म होने के बाद हिन्दू पक्ष की ओर से ए0एस0आई0 की रिपोर्ट के बाबत जबानी गवाही पेश करने के लिए कहा गया।
17 अगस्त से 4 दिसम्बर 2006- हिन्दू पक्ष की गवाही चली।
25 अपे्रल 2007- अदालत ने सभी चार मुकदमों को एक ही नुक्ते का मानते हुए उनकी सुनवाई एक साथ किए जाने का निर्णय लिया।
21 मई 2007- मुसलमानों की तरफ से जफरयाब जिलानी ने फिर बहस शुरू की। ग्रीष्मावकाश और बेंच के एक जज के जून 2007 में रिटायर होने और फिर उनकी बहाली अगस्त के आखिरी हफ्तें में होने के बाद यह सुनवाई 3 सितम्बर 2007 से शुरू हो सकी।
31 अगस्त 2008- बंेच के एक अन्य जज न्यायमूर्ति ओ0पी0 श्रीवास्तव रिटायर हुए और मुख्य न्यायाधीश ने न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल को नामजद किया।
29 सितम्बर 2008- मुकदमें की सुनवाई फिर शुरू हुई।
जनवरी 2009- हिन्दू पक्ष की ओर से निर्मोही अखाड़े के वकील रंजीत लाल वर्मा ने बहस शुरू की जो 24 अगस्त को खत्म हुई।
जून 2009- लिव्राहन आयोग ने 17 वर्ष बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस बीच आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया।
11 जनवरी 2010- सुनवाई दोबारा शुरू हुई क्योंकि बेंच के एक अन्य जज न्यायमूर्ति रफत आलम का स्थानान्तरण हो गया उनके स्थान पर न्यायमूर्ति एस0यू0 खान की तैनाती हुई।
26 जुलाई 2010- हिन्दू पक्ष की ओर से बहस पूरी होने के बाद न्यायमूर्ति एस0यू0 खान, सुधीर अग्रवाल और धर्मवीर शर्मा ने 60 वर्ष पुराने इस मुकदमें की सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया, फैसला सुनाने की तारीख 24 सितम्बर तय की गयी।
28 सितम्बर 2010- सुप्रीम कोर्ट ने सेवानिवृत्त नौकर शाह रमेश चन्द्र त्रिपाठी की याचिका खारिज कर दिया, जिसमें लखनऊ पीठ के फैसले को चुनौती देते हुए मामले का फैसला टालने का आग्रह किया गया था।
30 सितम्बर 2010- दुनिया के सबसे पुराने मुकदमें का पटापेक्ष शाम 4ः30 पर कर दिया गया, कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विवादित भूमि का एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड, दूसरा हिस्सा राम जन्मभूमि ट्रस्ट और अन्तिम तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को समान रूप से दे दिया जाय।
इन्हीं दावों-प्रतिदावों के दौर के बीच हिन्दुओं के अन्दर का ज्वालामुखी फट गया और मार्च 1934 में एक भीषण दंगा हुआ जिसमें मस्जिद की एक दीवार को तोड़ कर गुम्बदों को नुकसान पहुँचाया गया। परन्तु तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने स्थित को संम्भाल लिया और पुनः इसका निर्माण करवाकर, पूरा मामला शान्त कर दिया गया।
15 अगस्त 1947 को जब देश स्वतंत्र हुआ, लोकतंत्र की स्थापना के साथ दो बड़ी राजनैतिक पार्टीयाँ उभर कर सामने आई - कांग्रेस (अब यू0पी0ए0 (यूनाइटेड प्रोग्रेसीव एलाइन्स)) और जनता पार्टी।
कांग्रेस (यू0पी0ए0) उस दौर की मजबूत मुद्दो के साथ एक संमृद्ध पार्टी थी। परन्तु जनता पार्टी दौर बाल्यावस्था में था। जनता पार्टी को उस समय अयोध्या मुद्दा आग में घी की तरह काम करने वाला दिखा और पार्टी ने भी वोट बैंक व जनता तक पहुँच के लिए इस मुद्दे को खूब भूनाया।
90 के दशक में भाजपा एक शक्तिशाली पार्टी बन चुकी थी। लालकृष्ण आडवानी, उमाभारती, विजय राजे ंिसधिया और मुरली मनोहर जोशी आदि इस पार्टी के चमकते सितारे थे। इसी दशक में आडवानी की सोमनाथ से शुरू रथ यात्रा और बिहार में उनकी गिरफ्तारी ने लोकतांत्रिक देश में राजनीति को एक नई परिभाषा दी। उनके इस कृत्य से भड़के दंगे में कई लोगों की जान चली गयी।
मामला काफी संवेदनशील होने के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश कल्याण सिंह ने वहाँ की 2.77 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया और सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया कि “अधिग्रहण का उद्देश्य पर्यटन का विकास है और अदालत के अगले आदेश तक विवादित संम्पत्ति का स्वरूप जैसा की आज विद्यमान है बदला नहीं जाएगा।”
1992 में जब विवादित ढांचा ध्वस्त हुआ तब कानून का ही उल्लंघन हुआ था। सर्वोच्च न्यायालय के यथापूर्व स्थिति बनाए रखने के निर्देश की अनदेखी हुई थी। उ0प्र0 की तत्कालीन सरकार ने ढांचे को गिराने का षड्यंत्र रचने में कोई संकोच नहीं किया था। अगर हम समय की बात करते है तो सुबह 10ः40 से शाम 4ः30 तक वहाँ इंसानियत का नंगा नाच होता रहा और किसी तरह की कोई सुरक्षा देखने को नहीं मिली। यहाँ सवाल उठता है कि उस समय विवादित स्थल के सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी, गृह राज्य मंत्री एस0बी0 चैहान स्वयं भी एक मंँझे हुए सुरक्षा विशेषज्ञ थे, फिर ऐसी भूल क्यों हुई?
खैर जो हुआ वह मानवता, धार्मिकता व न्यायिक प्रक्रिया की दृष्टि से बेहद गलत हुआ। इंसान तो मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी थे अतः उन्होंने मानवता के नाते अपने पद से त्याग पत्र दे दिया। लेकिन इस दुर्घटना का उन्हें खेद नहीं था। यह चर्चा का विषय हो सकता है। भाजपा के नेता मस्जिद का अंन्तिम पत्थर हटाए जाने तक घटना क्रम पर बारीक नजर रखे हुए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी0वी0 नरसिंहाराव ने भी इस विध्वंस को रोकने का कोई सार्थक उपाय नहीं किया। यह आरोप भी लगा कि उनका इस विध्वंस में हाथ था। राजनीति की इस लड़ाई में दोनों तरफ से केवल मानवता की ही हत्या हुई।
विध्वंश के परिणाम से मानवता चित्कार उठी। अपराध का जो नंगा नाच हुआ उसे देख कर खुदा और भगवान भी लज्जित हो गए। बची कसर को लापरवाह पत्रकार वर्ग अपने तथ्य रहित रिपोर्टिंग से पूरा कर दिए। शायद उस समय पत्रकारिता भावना में बहकर दिशा विहीन हो गयी थी।
7 दिसम्बर 1992
राजस्थानी पात्रिका के गोपाल संेगर ने अपने लेख में लिखा कि “जर्मनी की महिला पत्रकार के कपड़े फाड़ दिये गये थे, छायाकारों का कैमरा तोड़ा जा रहा था। लगभग सारे पत्रकार लहुलुहान थे। हमारे भी सिर से खून गिर रहा था। वह मंजर अतिविचित्र ओर भयावक था ....................................।”
8 दिसम्बर 1992-
“देशब्यापी हिंसा में 120 से अधिक मारे गये।” नवभारत टाइम्स
“देशब्यापी हिंसा में 150 मारे गये।”राष्ट्रीय सहारा
“मस्जिद के साथ 270 की कब्र”। आज
8 दिसम्बर 1992
जनसत्ता के मिश्रीलाल जयसवाल ने लिखा “राम भक्तों का बड़ा ही ऊंँचा काम है, पिछली बार राम को अयोध्या बदर किया इस बार देश बदर का प्रोग्राम है।”
20 दिसम्बर 1992-
जनसत्त के बालेन्दु दाधीच ने लिखा- “मेरी नजर में आडवानी, सिंघल, जोशी विजय राजे सिंघिया, ऋतम्भरा, उमा, डालमीया और कटियार जैसे तमाम लोग प्रथम श्रेणी अपराधी है। उन पर कानून सम्मत मुकदमें चले, पर उनका राजनीतिक, सामाजिक बहिष्कार हो, यह इससे भी ज्यादा जरूरी है।”
27 दिसम्बर 1992-
“जरूरत है आन्दोलन की” में क्रान्ति सप्ताहिक ने लिखा- “अयोध्या में एक काण्ड हुआ, अपराधी मनोवृत्ती भी सामने आ गई, वें पार्टीयाँ और संगठन भी सामने आ गए जिसने ऐसी स्थित पैदा की और ऐसा करने पर उकसाया। प्रतिक्रिया हुई और पूरी दुनियां चीख पड़ी।”
आस्था की यह लड़ाई बदस्तुर इसी तरह जारी रही और फैसला विज्ञान के बैसाखी की राह देखने लगा। कोर्ट ने ऐतिहासिक जानकारी हेतु विवादित स्थल के आसपास की खुदाई का आदेश आर्किलोजीकल सर्वे आॅफ इण्डिया (ए0एस0आई0) को दिया।
ए0एस0आई0 ने सबसे पहले ग्राउन्ड पेनिटेªडिंग रडार (जे0पी0आर0) और भुगर्भीय रेडियोलाॅजी की मदद से सर्वेक्षण किया। जी0पी0आर0 से पता लगा कि विवादित स्थल के भीतर की संरचना में असंगतियाँ हैं। 5 महीने में 90 जगह ए0एस0आई0 ने खुदाई किया।
ए0एस0आई0 की मुख्य जाँच रिपोर्ट-
विवादित ढांँचे के नीचे विशाल ढाँचा था।
विवादित ढाँचा 3 पहले से बने ढाँचा संख्या 4 पर टिका था (पिलर 33-34), जो पश्चिम में 50 मीटर की दीवार 16 के सहारे टिका हुआ था।
उत्तर-दक्षिण दिशा में स्तम्भों की 17 पंक्तियाँ थी और प्रत्येक पंक्ति में 5 स्तम्भ थे।
ढाँचे का केन्द्रिय भाग महत्वपूर्ण था और वस्तुशिल्पीय योजना में इसे विशेष स्थान दिया गया था।
ईसवी पूर्व तीसरी शताब्दी के मन्दिरों के धार्मिक अवशेष मिले।
नौवीं शताब्दी के शिव मंन्दिर के अवशेष मिले।
10 वीं शताब्दी का वैष्णों मन्दिर मिला। जो कि सरयू नदी में बह गया था। जिसे 1228 में गहरवार राजाओं ने पुनः बनवाया था। जिसे मीरबांकी ने गिरवा दिया था। जिसका परीक्षण बीरबल साहनी इस्टीट्यूट आॅफ पाॅलियो बाॅँटनी में किया गया।
मन्दिर के द्वार पर विष्णु खण्डित मूर्तियाँ थी।
हिन्दू, देवी-देवताओं की खण्डित मूर्तियों के साथ में चुडि़यों के टुकड़े मिले।
12वीं सदी का 20 पंक्तियों का नागरी और संस्कृत लिपी का विष्णु हरि शिला लेख मिला।
एक शिला पटल मिला, जिस पर गंधर्म और गंधर्भीया माला लेकर जाते हुए बने थे।
राम, लक्ष्मण, सीता की खंण्डित मूर्तियाँ मिली।
कई दशकों से चर्चा का विषय रहा यह मुकदमा अब अपनी अंन्तिम साँसे ले रहा था।
26 जुलाई 2010 को फैसला सुरक्षित रखकर 24 सितम्बर को सुनाने की तारीख मुकर्रर की गई। लेकिन एक व्यक्ति ने सर्वोच्च न्यायालय में फैसले पर रोक लगाने के लिए अर्जी दी। न्यायालय ने 28 सितम्बर तक फैसले पर रोक लगा दिया। वादी ने कोर्ट में दलील दिया कि ”यह एक भावनात्मक धार्मिक मामला है, अतः इसका निर्णय कोर्ट के बाहर आपसी बातचीत से ही होना चाहिए।” कोर्ट ने अर्जी खारिज करते हुए, 30 सितम्बर को फैसला सुनाने का आदेश दिया और कहा कि “60 वर्ष से जिस मामले का हल बातचीत से नहीं हो सका वह अब नहीं हो सकता है। यह काफी संवेदनशील मसला हैै.......................................।”
30 सितम्बर 2010 को शाम 4ः30 पर न्यायमूर्ति एस0यू0 खान, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने इस मामले का फैसला सुनाया। फैसले में उन्होंने कहा कि विवादित भूमि को बराबर-बराबर 3 हिस्सों में बाँट कर एक-एक हिस्सा प्रत्येक वादी को दे दिया जाय।
फैसले का मुख्य बिन्दु निम्नवत है-
1- जहाँ मूर्तियाँ हैं वह भूमि हिन्दुओं को दें। राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को व एक तिहाई हिस्सा मुस्लिमों को दें।
2- बाबर द्वारा मंन्दिर तोड़ कर मस्जिद बनाने का प्रमाण नहीं, पर यह मन्दिर के भग्नावशेषों पर बना।
3- राम चबूतरा तथा सीता रसोई के अस्तित्व में आने से पूर्व 1885 में हिन्दू यहाँ पूजा करते थे।
तीनो जजों के बीच इन बातों का मतभेद था-
न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल-
जहाँ राम लला विद्यमान है, वह हिन्दू आस्था के मुताबिक राम जन्म स्थान है। उनका प्रतिनिधित्व करने वाले वादकारियों का उस पर अधिकार है। चारदीवारी के बीच का हिस्सा हिन्दुओं व मुस्लिमों में बाँटा जाय।
न्यायमूर्ति एस0यू0 खान-(सिब्बत उल्ला खान)
तीनो गुंबदो वाले ढाँचे के बीच के गंुबद के नीचे जहाँ रामलला विराजमान हैं, वह हिन्दुओं को दिया जाय। विवादित स्थल पर दोनों पक्षों का साझा हक है, मगर रामलला के अस्थायी मंन्दिर वाला हिस्सा हिन्दुओं को ही मिले।
न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा -
मन्दिर गिराकर मस्जिद बनाई गई। यहाँ राम लला की पूजा होती रही है। विवादित ढाँचा मस्जिद नहंी थी। विवादित स्थल पर नमाज नहीं पढ़ी जा सकती, क्योंकि यह इस्लाम के सिद्धांतो के विपरीत है।
एक नजर पूरे मुकदमें पर-
जज : न्यायमूर्ति सिब्बत उल्ला खान, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल, न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा।
फैसला: 8189 पृष्ठों में दर्ज हुआ। न्यायमूर्ति अग्रवाल ने 21 खण्डो 5238 पृष्ठों में, न्यायमूर्ति शर्मा ने 2666 पृष्ठों में और न्यायमूर्ति खान ने 285 पृष्ठों में फैसला सुनाया।
गवाह : 82 गवाह पेश हुए। जिनमे 54 हिन्दू पक्ष से और 28 मुस्लिम पक्ष से पेश हुए।
गवाही: 10471 पृष्ठों में कुल गवाही दर्ज हुई। जिनमें 7128 पृष्ठ हिन्दू और 3343 पृष्ठ मुस्लिम पक्ष की गवाही थी।
साक्ष्य : 20 पुस्तकों का इस्तेमाल हुआ साक्ष्य के रूप में, कुल 33 ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत किये गये।
पीठ : 13 पूर्ण पीठ कर चुकि है इस मामले की सुनवाई।
न्यायमूर्ति: 18 न्यायमूर्ति शामिल हो चुके है।
वकील: 17 वकील मुस्लिम पक्ष और 2 वकील हिन्दू पक्ष पेश कर चुके है।
1986 : से सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड की तरफ जफरयाब जिलानी पैरोकारी कर रहे थे।
1961 : से रणजीत लाल वर्मा हिन्दू पक्ष से पैराकारी कर रहे थे।
4 प्रमुख मुकदमें-
भगवान श्री राम विराजमान बनाम राजेन्द्र सिंह।
वाद-गोपाल सिंह विशारद बनाम जहूर अहमद।
वाद-निर्मोही अखाड़ा बनाम बाबू प्रिय दत्त व अन्य।
सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड बनाम गोपाल सिंह विशारद व अन्य।
पक्षकार
क्र सुन्नी सेंन्ट्रल वक्फ बोर्ड, यूपी (सूट नं0 4)
क्र गोपाल सिंह विशारद द्वारा राजेन्द्र सिंह (सूट नं0 2)
क्र भगवान श्री राम विराजमान (सूट नं0 5)
क्र निर्मोही अखाड़ा (सूट नं 3)
दावे
अ मुस्लिम पक्ष - यह भूमि बाबरी मस्जिद की है। इसे मुस्लिमों को वापस किया जाए, और हिन्दु देवी - देवताओं की मूर्तियाँ हटाई जाएँ।
अ हिन्दू पक्ष - मस्जिद से पहले वहाँ राम जन्म भूमि थी। इसे राम जन्मभूमि परिसर घोषित किया जाय। हिन्दुओं को पूजा - दर्शन की अनुमति दी जाय और मंदिर बनाने पर आपत्तियाँ खारिज हों।
फैसले पर प्रमुख व्यक्तियों के बयान -
‘‘भारतीय संस्कृति की महान परंपराओं के अनुरूप सभी धम्र एवं धार्मिक मान्यताओं के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया जाए।’’ - मनमोहन सिंह, प्रधानमंत्री (01.10.10)
‘‘फसले के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी केन्द्र की है। प्रदेश में कानून व्यवस्थ बिगड़ती है तो केन्द्र जिम्मेदार होगा।’’ - मायावती, मुख्यमंत्री उ0प्र0 (01.10.10)
‘‘फैसले को स्वीकार किया जाना चाहिए।’’- कांग्रेस (01.10.10)
‘‘अयोध्या पर फैसला सकारात्मक है। पार्टी का कोर ग्रुप इस पर विचार -विमर्श के बाद भविष्य का रास्ता तय करेगा।’’ - भाारतीय जनता पार्टी (01.10.10)
‘‘फैसला सुन कर लगा कि मेरा जीवन सार्थक हो गया है। अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण पर आपसी सहमति बननी चाहिए।’’ - उमाभारती पूर्व केेन्द्रिय मंत्री (01.10.10)
‘‘फैसला उम्मीद के अनुरूप नही रहा।’’ - आॅल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड (01.10.10)
‘‘न्यायालय ने भावना और आस्था की पूर्ति की है और हिन्दुओं को हठ करने की जरूरत नहीं है।’’ - महन्त नृत्य गोपालदास अध्यक्ष श्री राम जन्म भूमि न्यास (01.10.10)
‘‘मन्दिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। लेकिन इसे किसी की जीत या हार के रूप में न देखा जाए।’’ - मोहन भागवत, संध प्रमुख (01.10.10)
‘‘देश आस्था से नही, संविधान और कानून से चलता है। इस फैसले से देश का मुसलमान ठगा हुआ महसूस कर रहा है।’’ - मुलायम सिंह यादव, अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी (01.10.10)
‘‘एक तिहाई हमें मंजूर नही।’’- जफरयाव जिलानी, अध्यक्ष, सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड (01.10.10)
‘‘फैसला गर्भगृह में मंदिर निर्माण के हिंन्दुओं के अधिकार की पुष्टि है।’’ - लाल कृष्ण आडवाणी, पूर्व उप प्रधानमंत्री (01.10.10)
‘‘अयोध्या में राम लला का मंदिर बनाने का रास्ता साफ हो गया है।’’ - कल्याण सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री, उ0प्र0 (01.10.10)
‘‘मेरी नजर में इससे अच्छा निर्णय नहीं हो सकता।’’ - वी0एन0खरे, पूर्व मुख्य न्यायाधीश, (01.10.10)
‘‘हम चाहते हैं कि मामला यहीं खत्म हो जाय।’’ - मो0 हसीम अंसारी, वादी मंन्दिर मस्जिद विवाद (01.10.10)
‘‘फैसला हमारे हित के खिलाफ है, लेकिन हम मायूस नही है। सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा अभी भी खुला है। - अहमद बुखारी, शाही इमाम जामा मस्जिद
यह बुरा सपना देखते - देखते नींद से जाग गये देश की प्रतिक्रिया थी। उसके सीने में 1992 मे धंसा नस्तर रह-रह कर टीस मारता था। दिल कहता था इस बार बुरा न होगा, लेकिन दिमाग पर उस बुरे सपने का खौफ था। इसके पहले कि और जख्म पड़ते, उस नस्तर को निकाल फेंका। घाव पुराना है इलाज ताजा, सो कभी-कभी दर्द भी होगा। लेकिन जख्म ऐसे ही भरतें है। देश के हर वर्ग ने बताया अब वह नीम-हकीमों से इलाज कराने वाला नहीं है।
‘‘हम इश्क के बन्दे है,
मजहब से नहीं वाकिफ।
गर काबा हुआ तो क्या,
बुतखाना हुआ तो क्या?’’
पत्रकार वर्ग भी पूरी ईमानदारी, भावनारहित कर्तव्यनिष्ठा एवं राष्ट्रभक्त के रूप में खुद को अपनी रिपोर्टींग में प्रचारित किया। शायद उन्होंने 7 दिसम्बर 1992 में पत्रकारिता पर लगे भावनात्मक एवं अविवेक पूर्ण रिपोर्टींग रूपी मेल को पूरी तरह धुल दिया।
जनसत्ता (01.10.10)
‘‘तीन बराबर हिस्सों में बटे विवादित भूमि।‘‘
हिन्दुस्तान (01.10.10)
‘‘मूर्तियाँ नहीं हटेंगी, जमीन बटेगी।’’
दैनिक जागरण (01.10.10)
‘‘विराजमान रहेंगें रामलला।’’
अमर उजाला (01.10.10)
‘‘राम लला विराजमान रहेंगे।‘‘
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साहित्य के साथ उठता सवाल -
क्र दस्तावेजों के बारे में अहम सवाल यही उठाया जा सकता है कि बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में छोटी-छोटी बातों को भी लिखा है, फिर इतने महत्वपूर्ण बात को लिखना क्यों भूल गया ?
क्र बाबर की हुँमायुं के लिए छोड़ी गयी वसीहत से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जो व्यक्ति अपने वसीहत नामें में मंदिरों और मस्जिदो की सुरक्षा की बात करता हो, वह अयोध्या को तोड़ने का आदेश कैसे दे सकता है?
क्र अयाध्या विवाद के संम्बन्ध में एक बात यह भी विचारणीय है कि तुलसीदास ने बाबर की मृत्यु के बाद अपना साहित्य रचा। उन्होंने अपने किसी भी ग्रंथ में बाबर के अत्याचारों का वर्णन नहीं किया।
क्र पाँचजन्य सप्ताहिक के 24 मई 1992 के अंक में प्रकाशित ‘‘अयोध्या में मंदिर के मलबे से मस्जिद का निर्माण किया गया, यह कथन गले नहीं उतरता।’’
क्र कमलेश्वर जी ने ‘सुलगते शहर का सफरनामा’ में लिखा - ‘‘बाबर की राजधानी आगरा थी। मथुरा आगरा से 50 मील दूर है, जब कि बाबर के समय कृष्ण भक्ति चरम पर थी , फिर भी बाबर या उसके सेनापति ने कृष्ण जन्मभूमि मंदिर तोड़ने के बजाय, अयोध्या तक जाने का कष्ट क्यों किया?’’
अयोध्या विवाद एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जिस पर जितने भी हल निकालें जाए, उतने हलो पर पुनः एक नया विवाद उत्पन्न होगा। हमें यह विवाद यही समाप्त कर देना चाहिए। क्योंकि शायद इससे अच्छा फैंसला नही आ सकता है।
मेरा विचार है कि सारा स्थल साफ कर उसे एक खाली भूमि के रूप में छोड़ दिया जाय, जैसा की हिरोसीमा और नागासाकी में उस स्थान को छोड़ दिया गया है जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान परमाणु बम गिरा था। लोग उस स्थान पर दर्शनार्थ जातें हैं, और वहाँ मारे गये हजारो लागों के स्मरण में आँसू बहाते हैं। क्योंकि भगवान या अल्ला को ऐसी मानवता की कर्बगाह पसन्द नहीं है। अयोध्या का रिक्त स्थान भी एक ऐसा स्थान हो जाएगा जहाँ लोगो को जाना चाहिए और सेक्युलरवाद के 6 दिसम्बर 1992 के निधन पर विलाप करना चाहिए।
यह फैंसला हिन्दुओं और मुस्लिमों में व्याप्त मतभेदों पर एक ठहराव है। यह आत्ममंथन और चिंतन का समय प्रदान करता है।
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