इतिहास बनने को आतुर 2011


इतिहास बनने को आतुर 2011
प्रदीप तिवारी: अपने अंतिम पड़ाव पर खड़ा 2011 अंतिम सांसे ले रहा है। कुछ खट्टी कुछ मीठी यादों को हमारे-आपके बीच छोड़कर जाने को बेताब है। किसी के लिए आशाओं का साल तो किसी के लिए निराशाओं का, किसी के लिए खुशी का तो किसी के लिए दुख का, किसी के लिए सब कुछ लुटने का तो किसी के लिए सब कुछ लुटाने का साल रहा 2011। लेकिन समय का पहिया बदस्तुर जारी है आज यह साल हम सबके बीच से जाने की तैयारी में है। जाने वाले को कोई रोक तो नहीं सका है लेकिन जाने वालों की यादों को लोग जरूर समेट कर रखते हैं। कुछ ऐसी ही यादों को हम सभी लेकर नए वर्ष के स्वागत के लिए तैयार है।
2011 को अगर पूरी तरह से भ्रष्टाचार का वर्ष कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगा। 2 जी घोटाले के सामने आने के बाद देश सम्भल ही पाया था कि काॅमनवेल्थ गेम्स का घोटाला। जहां इन सबके बीच केंद्र सरकार उलझी थी वहीं राज्यों का भी कारनामा कम नहीं रहा। देश की आर्थिक राजधानी महाराष्ट्र जहां आदर्श सोसाइटी की मकड़ जाल में उलझी रही वहीं कर्नाटक सरकार भूमि घोटालों के भंवर जाल में फंस गयी। खैर अब इन सबके आरोपी अब कानून के शिकंजे में है। इन्ही सब के बीच सुशासन की आवाज बुलंद करने वाले राज्य राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकार के नुमाइंदें पूरी तरह से सुशासन का चीरहरण करने में स्वयं को मशगुल किए रहे। एक ओर जहां राजस्थान के नेता भंवरी देवी के भंवर में फंसे रहे वहीं उत्तर प्रदेश में भी हुए कई वाकयों ने नेताओं के सफेद दामन को काला कर दिया। इन सब मामलों को तो नज़र अंदाज तो नहीं किया जा सकता है लेकिन इन्हे काले दुःश्वप्न की तरह छोड़ कर आगे के मामलात पर नजर डालते हैं। वर्ष में दो बड़े आंदोलन हुए। एक को राजनीति ने अपने आगोश में ले लिया तो एक ने जनता की ताकत, सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को चलाने वाले आकाओं को दिखा दिया। जहां इस वर्ष, एक ओर देश को गांधी का नया अवतार देखने को मिला वहीं दूसरी ओर सबसे जुनुनी खेल क्रिकेट की चमचमाती ट्राॅफी का भी दर्शन हुआ। भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता का भव्य संगम जब अन्ना हजारे के समर्थन में लगा तो दुनिया के अनेक देशों की मीडिया भी इसमें नहा कर अपने को धन्य समझने लगी। इन सबके बीच मानों अमृत के घड़े की तरह जब क्रिकेट का वल्र्ड कप देश में आया तो लगा कि जैसे लोगों में नई जान सी आ गई हो। लेकिन हद तो तब हो गई जब क्रिकेट की पिच पर माया की काली छाया पड़ गई। फिक्सिग में शामिल पाकिस्तान के तीन खिलाडि़यों को जब लन्दन की अदालत ने हवालात की सैर कराई तो क्रिकेट के दीवानों को राहत की सांस आई। इन सबके बीच एक और जिन्न कई वर्षो के बाद बाहर आने की कोशिश करने लगा। महंगाई से त्रस्त आम जनता को जब सरकार ने एफडीआई नाम की दवा पिलानी चाही तो व्यापारी वर्ग सचेत होकर कहने लगा कि असली बोतल में नकली दवा है, जिससे सरकार आम जनता को गुमराह कर रही है। अपनों के भारी विरोध के कारण सरकार ने इसे डीप फ्रिज करने में ही अपनी भलाई समझी। लेकिन यूपीए सरकार के उपर मानों यह साल घोर ग्रहण लेकर आया हो, इन सबसे सरकार उबरने की कोशिश ही कर रही थी कि तभी लोकपाल नाम की गोली दूबारा सरकार को टार्गेट में लेने लगी। सरकार भी अनेक बहाने बना कर इसे टालने के लिए रेत की दीवार बनने लगी। गोली जिस बंदूक में भरी थी वह भी सत्तर का बसंत देख चुका था। इतनी आसानी से उसकी दिशा बदलना शायद आसान काम नहीं था। इन्ही सब को देखते हुए सरकार ने बिल पास कराने का बुलेट प्रुफ पहन लिया।
इन्ही कुछ खट्टी कुछ मीठी यादों को अपने दामन से लपेटे हुए 2011 इतिहास बनने के सफर को चल दिया। अब आगे 2012 एक नई उमंग, नई आशा के साथ हमारा-आपका स्वागत करने के लिए नव वधू की तरह तैयार है। नए उम्मीदों के साथ की यह वर्ष सभी के लिए खुशहाली लेकर आएगा। आओ हम-सभी नव वर्श 2012 के स्वागत के लिए अपनी बांहे फैला ले, और एक समृद्ध, भ्रष्टाचार मुक्त देश के निर्माण की शपथ लेकर 2012 को अपना बना ले।

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