FDI भारत में प्रत्यक्ष निवेश

भारत में प्रत्यक्ष निवेश
प्रदीप तिवारी: एफडीआई अर्थात खुदरा बाजार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश। एक ऐसा जिन्न जिसने संसद की कार्यवाही को दो सप्ताह तक के लिए ठप कर दिया। देश की आर्थिक स्थिति सुधारने की बात करने वाले देश के नुमाइंदो को ख्याल भी न रहा की संसद की कार्यवाही को ठप करने से आम जनता यानी हमारा-आपका ही धन पानी की तरह बह गया। हद तो तब हो गई जब 8 दिसम्बर को एफडीआई की राजनीति में ये नुमाइंदे ऐसे मशगुल हो गए कि इन्हे ख्याल न रहा कि लोकसभा में आज का दिन ऐतिहासिक है। खैर भाजपा के संसदीय दल के नेता लालकृश्ण आडवाणी ने लाज बजाते हुए लोकसभा के पहले स्पीकर जी. वी. मावलंकर के जन्मदिन पर श्रद्धांजलि देने की बात याद दिलाई।
अब बात यह उठती है कि एफडीआई पर सरकार इतना जोर क्यों दे रही है? इस मुद्दे पर अमेरिका जैसे विकसित देशों से तुलना क्यों कर रही है? जब कि यह सभी जानते है कि भारत और अमेरिका की अर्थव्यवस्था में जमीन-आसमान का अंतर है। जहां एक ओर भारत में उत्पादन और उपभोग बराबर है वहीं अमेरिका जैसे देशों में उपभोग की तुलना में उत्पादन अधिक है। खैर हमे इस मसले पर थोड़ा दूर तक जाकर सोचना होगा। याद करना होगा की कैसे 80 के दशक में पूरा विष्व भयंकर आर्थिक मंदी के आगोश में आया था। विश्व के अधिकतर देशों की आर्थिक नीतियां चरमरा गई थी। लेकिन भारत पर इसका प्रभाव न के बराबर था। अगर हम इसके कारणों की बात आम आदमी की जुबान में करे तो पता लगता है कि हमने जितना उत्पादन किया उतने की जरुरत हमे थी। यानी घर की पूंजी घर में ही रही। वहीं दूसरी ओर मंदी की चपेट में आए देशों में उत्पादन की तुलना में उपभोग नहीं हो पाया और कंपनियों को घाटा हुआ। इसका असर मंदी के रूप में पूरी दुनिया ने देखा। जैसा कि कहना है कि समय अपने आपको दोहराता है। ठीक ऐसा ही वक्त आया 2008 में। पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया। कई बैक दिवालिया हो गए। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था अपनी पटरी पर चलती रही।
हमारे देश के वित्तमंत्री इन सब बातों से रूबरू होते हुए भी बयान देते है कि अमेरिका जैसे देशों में एफडीआई है जिससे उन्हे कोई नुकसान नहीं है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या हमारी अर्थव्यवस्था भी उनके जैसी है। अगर नुकसान नहीं है तो क्यों न देश को चलाने के लिए उन्हे न्योता दे दिया जाए। शायद इसी बात से देश को महंगाई से मुक्ति भी मिल जाए। इनको इतनी भी सुध नहीं है कि दुनिया के सबसे युवा व्यक्तियों के देश में इससे कितनी बेरोजगारी बढ़ेगी। सफाई दी जा रही है कि एफडीआई के आने से बिचैलियों का धंधा बंद हो जाएगा और किसानों को फसल का पूरा मुल्य मिलेगा। कंपनी सीधे किसानों से माल खरीदेगी। लेकिन यह कार्य सरकार भी तो कर सकती है। खैर इसका दूसरा पहलू यह भी है कि अगर ये कंपनियां आपस में सांठ-गांठ करके किसानों का शोषण करने लगी तो किसान कहां जाएगा। दूसरा तर्क यह दिया जा रहा है कि एफडीआई से देश में पैसा आएगा। लेकिन जो मुनाफा होगा वह कहां जाएगा। इस ओर क्यो नहीं ध्यान दिया जा रहा है।
खैर फिलहाल सरकार ने अपने सहयोगी दलों की बेरुखी के कारण इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया है । इन सब कवायदों को देख कर कहावत याद आती है कि आधी छोड़ संम्मी को धावै, आधी रहै न सम्मी पावै। इस बात को ध्यान में रख कर सरकार को एफडीआई के बारे में सोचना होगा।

टिप्पणियाँ

cynideword ने कहा…
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