चुनावी संगम में काले धन की धारा
प्रदीप तिवारी: उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव, इसी के मद्देनजर पुलिस प्रशासन का आपरेशन सघन जांच जवां हो चुका है। राज्य के लगभग हर क्षेत्र में व्यापक स्तर पर तलासी अभियान जोरो पर है। समाचार पत्र और समाचार चैनल्स के लिए भी रोज बिना किसी भागदौड़ के एक चटपटी खबर आसानी से मिल जा रही है। सभी खुश हैं पत्रकार भी, पाठक भी और प्रशासन भी। हर गली, हर चैराहे, हर कार्यालय यहां तक की पुलिस थानों से लेकर इनके बैरक तक में एक ही बात की चर्चा है की कहां पर कितनी रकम बरामद की गयी, किस नेता से झड़प हुई और किससे अच्छी जान-पहचान हुई।
लेकिन बात दीगर की तो यह है कि चुनाव आते ही धन की यह मैली गंगा बाढ़ का रूप क्यों ले लेती है? क्यो चुनाव के आते ही शराब, अवैध हथियार और धन का प्रवाह बढ़ जाता है? हर साल ऐसा होता है लेकिन क्या अब तक कोई बड़ी मछली जाल में फंसी? शायद नहीं। फंसे भी तो कैसे पकड़ने वाले भी तो वही होते है जो पांच वर्षों तक इन्हीं मछलियों की सेवा करते रहते है। लेकिन चुनाव आयोग से अपनी पीठ थपथपवाने की ललक कहे या नौकरी का डर, इसी लिए पैंदों की बली तो बनती है बाॅस। लेकिन मुद्दा यह है कि आखिर चुनाव में धन के चोरी-छुपे उपयोग की जरूरत क्यों होती है? इसके दो कारण सामने आते हैं। पहला यह कि चुनाव आयोग का लगाम दूसरा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। पहले कारण से तो सभी वाकिफ हैं लेकिन ध्यान देने वाला तो दूसरा कारण है। जब हमारे देश का संविधान बना तो उसमे कहीं भी इस बात की व्यवस्था नहीं की गई की जनप्रतिनिधि के सदन तक पहुंचने में लगने वाला खर्च कहां से आएगा। इस खामी की वजह थी बिना सोचे-समझे ब्रिटिश परंपरा का अनुकरण। ब्रिटेन में तो कोई भी उम्मीदवार आराम से दिन भर में अपने क्षेत्र में घूम सकता है लेकिन क्या हमारे देश में यह मुमकिन है? यहां पर किसी भी उम्मीदवार के क्षेत्र में औसतन 200-300 गांव तो आसानी से आते हैं। इन गांवों में लगभग 400-500 पोलिंग बूथ तो होंगे ही जहां 1000 लोगों को किसी भी उम्मीदवार को रखना पड़ेगा। इनका खर्चा कहां से आएगा। संविधान सभा यह क्यों नहीं समझ पाया कि निर्वाचन क्षेत्र के आकार में इतने विशाल फर्क के चलते यह माॅडल हमारे देश में विफल ही होगा। लेकिन इन खर्चों को पूरा करता था काॅरपोरेट वर्ग। लेकिन 1967 के चुनाव के कुछ समय पहले ही इंदिरा गांधी को अहसास हो गया था कि विपक्षी पार्टीयां उन पर हाबी हो रही है। इस लिए उन्होने राजनीतिक पार्टियों को दिए जाने वाले चंदे पर से आयकर की छूट हटा दी। आर्थिक रूप से विकलांग हो चुकी इन पार्टियों का दम निकलना तो तय था। क्यो कि अब उनके लिए कहीं से आय का कोई श्रोत नहीं था। अतः सभी छोटी पार्टियों का विलय हो गया। इसी समय को हम गठजोड़ की राजनीति का उदय भी मानते है। 1967 में सी राजगोपालचारी की स्वतंत्र पार्टी और भारतीय जनसंघ ने मिल कर चुनाव लड़ा और तीन राज्यों में कांग्रेस के सामने दमदार उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन कांग्रेस तो सत्ता में थी इस लिए इसे धन की कमी न थी लेकिन ये पार्टियां विपक्ष में थी जिसके कारण इनके आगे धन की घोर समस्या थी। इन्ही सब के कारण इन सब ने काॅरपोरेट चंदे को उल्टे हांथो लेना शुरु कर दिया। इससे सत्ता के गलियारों में काॅरपोरेट की पैठ बढ़ने लगी। इसी का बृहद स्वरूप आज हम देख रहे हैं। इन सब के कारण लोकतंत्र जनतंत्र न बन कर आज धनतंत्र बन गया। आम आदमी के लिए यहां के दरवाजे बंद हो गए और अपराधियों, धनकुबेरों के लिए यह शरणास्थली बन गए। यहां बात उठती है कि क्या 26 रुपये कमाने वाला व्यक्ति सदन में जाने की हिमाकत कर सकता है? अगर नहीं तो किस बात का लोकतंत्र है? इससे अच्छा तो राजतंत्र ही था जहां पर ऐसा स्वप्न तो नहीं दिखाया जा सकता है कि जनता राजा बनेगी। भ्रश्टाचार के बारे में बात करने वाले लोगों के जेहन में क्या यह सवाल नहीं आया होगा कि जो व्यक्ति दो से तीन करोड़ रुपये खर्च कर जनप्रतिनिधि का चोला ओढ़ सदन में जा रहा है वह कहां तक जनता की सेवा करेगा? आम आदमी के आवाज की राग अलापने वाली मीडिया भी इस मेले में साल भर के घाटे को पाटने में व्यस्त हो जाती है। शायद तभी तो चुनाव के समय समाचार पत्रों के पन्ने भी खास पार्टी के रंगों से सराबोर हो जाते है। चैनल्स भी परिणाम आने के पहले ही ओपनिग पोल की झड़ी लगा देते हैं और मझे हुए भविष्यवक्ता की तरह खास पार्टी के परिणामों की घोषणा कर देते हैं। अब समय आ गया है कि चुनाव के लिए लिए एक नई रणनीति बनाने का। शायद तभी काले धन का प्रभाव चुनाव के समय रुक सके। धनकुबेरों के साथ 26 रुपये वाला आम आदमी भी सदन के अंदर जा सके। लोकपाल और वोट टू री काॅल के लिए आंदोलन करने की तब शायद जरूरत भी न रहेगी। क्योकि तब आम आदमी की वकालत करने वाला आम जनप्रतिनिधि भी सदन के अंदर ही होगा। जब आम आदमी वहां पर होगा तो काला धन भी इनके गंगा समान पवित्र हृदय से धुल कर सफेद हो जाएगा।
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