सेवायोजन में खोया युवा भारत का सपना

सेवायोजन में खोया युवा भारत का सपना
हाल ही में प्रदेश में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में सेवायोजन कार्यालय के नाम की चर्चा आम हो गई। युवा से बुजुर्ग तक की धमक प्रदेश के विभिन्न सेवायोजन कार्यालयों में देखी जाने लगी। हर कोई कहीं न कहीं से चुनावी शिगूफे की मकड़जाल में फंस चुका था। किसी को लैपटाॅप, किसी को टैबलेट तो किसी को बेरोजगारी भत्ते की आस लगने लगी। हर वर्ग जल्द से जल्द किसी भी कीमत पर रजिस्ट्रेशन कराने को बेचैन दिखा। हालात बेकाबू हुए तो सेवायोजन कर्मियों को सुरक्षा बलों की मदद लेनी पड़ी। जर्जर इमारत की गोदी में जब बेरोजगारों के सपनों ने जन्म लिया तो सेवायोजन की भी तकदीर बदल गई। वर्षों से अपडेशन की आस में उम्मीद छोड़ चुकी वेबसाइट भी अपडेट होने के साथ ही आॅनलाइन रजिस्ट्रेशन की सुविधा से लैश हो गई। इन सब के बीच इस बात की जानकारी होना बेहद जरूरी है कि आखिर सेवायोजन है क्या व इसकी स्थापना क्यों की गई?
    द्वितीय विश्व के समाप्ति के बाद सैनिकों को सेवायोजित कराने के उद्देश्य से सन् 1945 सेवायोजन कार्यालयों की स्थापना देश के विभिन्न भागों में की गई। स्वतंत्रा के बाद सन् 1959 में ‘सेवायोजन अधिनियम 1959’ को संसद की मंजूरी मिली, जिसे मई 1960 में जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर पूरे देश में लागु किया गया। सेवायोजन अधिनियम के अनुसार इसका मुख्य कार्य लोगों को सरकारी व 25 कर्मियों से अधिक की संख्या वाले व्यक्तिगत संस्थाओं में रोजगार उपलब्ध कराना, लोगों को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना और प्रशिक्षण प्रदान करना व रोजगार के क्षेत्र में सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना है। अधिनियम में इस बाद का उल्लेख किया गया कि इस प्रकार की सभी संस्थाओं को रिक्तियों के बारे में कार्यालय को सूचना देना अनिवार्य होगा, जिससे कार्यालय में पंजीकृत बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध हो सके। कार्यालय में पंजीकरण कराने वाले बेरोजगारों का पंजीकरण तीन सालों के लिए सक्रिय होता है। इस अवधि के बाद भी रोजगार न पाने वालों को पंजीकरण का नवीनीकरण कराना होता है। यहां पर पंजीकरण कराने वालों का पूरा ब्यौरा अंतरर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के माध्यम से निर्धारित स्वयं सेवा समूह ‘राष्ट्रीय व्यवसायिक वर्गीकरण’ द्वारा सुरक्षित रखा जाता है। समय-समय पर सेवायोजन अधिनियम में अनेक बदलाव किए गए। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा कामकाजी महिलाओं के यौन शोषण व मानसिक प्रताड़ना के संबंध सेवायोजन निदेशालय के अंतर्गत शिकायत प्रकोष्ठ का गठन किया। सेवायोजन कर्मियों द्वारा बेरोजगारों को समय-समय पर रोजगार व स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण देने का भी प्रावधान किया गया। इन सब के बीच वर्षों से सूचना क्रांति से मरहुम सेवायोजन कार्यालय में जब बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए बेरोजगारों की भीड़ बढ़ी तब यहां पर आॅनलाइन पंजीकरण की व्यवस्था लागु की गई। लोगों को रोजगार व प्रशिक्षण उपलब्ध कराने वाला सेवायोजन स्वयं ही कर्मचारियों की कमी के चलते विकास की दौड़ में लगड़ा हो गया। व्यक्तिगत कंपनियां तो दूर की बात सरकारी विभागों के रिक्तियों की भी जानकारी अब इनके पास नहीं रहती। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो उत्तर प्रदेश में वर्ष 2011 में केवल तीन फीसदी बेरोजगारों का प्लेसमेंट विभाग द्वारा कराया गया। ऋण की अगर बात की जाए तो शायद ही किसी बेरोजगार को यह ज्ञात हो कि सेवायोजन की सहायता से स्वरोजगार हेतु ऋण की सुविधा भी उपलब्ध करवायी जाती है।
समय के साथ ही राजनीतिक दलों ने सेवायोजन की कार्यप्रणाली को भी बदल दिया। अब यहां पर उपस्थित कर्मचारियों की स्थिति केवल एक लिपिक की होकर रह गई। सुबह होने के पहले प्रदेश के सभी सेवायोजन कार्यालयों में भत्ता पाने वाले बेरोजगारों की लंबी कतार लग जाती है, जो शाम होने तक बदस्तूर लगी ही रहती है। लाइन में लगे कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो बृद्धावस्था पेंशन या अन्य किसी सरकारी सहायता का लाभ ले रहे हैं। इनके द्वारा दिया गया तर्क भी ऐसा है, जिसे सुनकर योजना आयोग की सारी योजनाएं भी दम तोड़ दें। बुजुर्गों का तर्क सुनकर अपने महान संस्कृति की दशा पर ही अफसोस होता है। उनके अनुसार अगर भत्ता व पेंशन मिला कर 1600 रुपये मिलेंगे तो खर्चों के लिए बच्चों की तरफ मुंह नहीं फैलाना पड़ेगा। अब तो भत्ता पाने के लिए लगी भीड़ के बीच ‘युवा भारत, संमृद्ध भारत’ के साकार होने की किरण भी बुझती नजर आने लगी है। लोगों के अनुसार सरकार को बेरोजगारी भत्ते के स्थान पर खादी, लघु व गृह उद्योगों को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाना चाहिए। इससे इनकी स्थिति में सुधार के साथ ही रोजगार के नए अवसरों का भी सृजन होगा। 
   




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