कांग्रेस निधि या जनप्रतिनिधि
प्रदीप तिवारी: प्रणव मुखर्जी हमारे देश के 13वें राष्ट्रपति
बन गए। लगभग 4 दशक के राजनीतिक करियर और वरिष्ठ
कांग्रेसी होने का तोहफा मिला या कांग्रेस मुखिया द्वारा उन्हें किनारे कर
कांग्रेसी युवराज के लिए सियासी जमीन तैयार की गई। कारण जो भी हो लेकिन अब प्रणव
दा देश के सर्वोच्च पद पर विराजमान है, महामहिम बन चुके
हैं।
लेकिन अगर दादा के जनप्रतिनिधि के करियर पर नजर डाले तो निराशा के
अलावा और कुछ भी हमें दिखाई नहीं देता। कोलकाता के वीरभूमि जिले के छोटे से गांव
मिराटी में जन्मे प्रणव मुखर्जी जंगीपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे।
क्लर्क, शिक्षक, पत्रकार के बाद 1969 से अपनी राजनीतिक पारी की शुरूआत करने वाले प्रणव जी को कांग्रेस का
संकटमोचन भी कहा जाता था। लगभग 4 दशक तक अनेक
सम्मानित पदों पर रहने के बाद भी दादा ने वीरभूमि का न तो नसीब बदला और न ही उसके
दामन में लगा खून का दाग धुला। वीरभूमि को लाल सलाम का हब भी कहा जाता है। तेंदू केे
पत्ते, जिसका उपयोग बीड़ी बनाने में किया जाता है का
मुख्य क्षेत्र होने के साथ ही माओवादियों का मुख्यालय भी इसी क्षेत्र में है।
सुरक्षा विशेषज्ञों की माने तो यहां पर खून की होली का मुख्य कारण तेंदू के पत्ते
से होने वाली अथाह कमाई है। बावजूद इसके इस ओर अब तक किसी ने ध्यान नहीं दिया। अगर
2011 के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां पर लगभग 69 प्रतिशत साक्षरता है और 75 प्रतिशत लोग
कृषि पर निर्भर है। एक बार विश्व के सबसे अच्छे वित्तमंत्री और दो बार एशिया के
सबसे अच्छे वित्तमंत्री के खिताब से नवाजे जाने वाले पूर्व वित्तमंत्री ने अपने
जन्म स्थान को विकास के नाम पर केवल निराश ही किया। अगर महिला आयोग की रिपोर्ट 2011 पर ध्यान दिया जाय तो योजना आयोग के उपाध्यक्ष, विश्व बैंक में भारत के प्रतिनिधि जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहने वाले
दादा के ही राज्य से सबसे अधिक महिलाएं चंद पैसों की लालच के कारण या तो बेंची गईं
या फिर देह व्यापार की दुनिया में कदम रखने को मजबुर हुईं। क्षेत्र के विकास के
नाम पर मिलने वाली रकम को भी खर्च करने में प्रणव दा फिसड्डी साबित हुए। अब तक
उन्होंने अपनी संसद निधि का केवल 28 फिसदी ही खर्च
किया था।
ये तो बात हुई उनके क्षेत्र की, अब बात करते हैं
उनकी पार्टी की। अपने सटिक बयानबाजी और प्रतिउत्तर देने की अलौकिक क्षमता के कारण
प्रणव दा हमेशा से ही गांधी परिवार के साथ ही कांग्रेस के सबसे वफादार सिपाही रहे
हैं। सोनिया गांधी को राजनीति में दुबारा वापस लाने का श्रेय भी दादा को ही जाता
है। अगर दादा को राष्ट्रपति न बनाया जाता तो सभी जानकारों का मानना था कि अगले
प्रधानमंत्री बनने के वे प्रबल दावेदार थे। अगर ऐसा होता तो दलितों के यहां रात
गुजार कर उनके सबसे बड़े हितैसी बनने का ढोंग करने वाले राहुल का क्या होता? राहुल के लिए सियासी जमीन तलाश रहे सोनिया के वफादारों के लिए इससे
अच्छा और आसान रास्ता प्रणव दा को हटाने का शायद ही मिलता। अधिक की लालच न करते
हुए दादा ने भी सोचा बेइज्जद होकर हटने से अच्छा होगा कि इज्जत के साथ 4 दशक के करियर का द इंड किया जाए।
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