एमजेएमसी के बाद आज मेरा पहला इंटव्यू है, दिन मंगलवार। मैं सोचता हूं कि मंगलवार मेरे लिए लकी होता है। सोमदत को किसी जरूरी काम से जाना था, इसलिए दैनिक जागरण के अॉफिस करीब पौने 11 बजे छोड़कर चला गया। ईश्वर पर बस इतना ही विश्वास करता हूं कि जब भी अधिक परेशान हो जाऊं तो उनसे अपनी बात कहकर दिल हल्का कर लूं... ज्यादा दुखी होने पर इलाहाबाद के बड़े हनुमान जी को याद करके रो लूं बस। रोज-रोज मंदिर जाने और प्रसाद चढ़ाने में भी विश्वास नहीं है... किसी को भीख में पैसे नहीं देता न ही पंडितों के हाथ में रुपये रखता हूं, लेकिन उस दिन ये सबकुछ किया था। बहुत डर रहा था, फिर भी अपने ईश्वर से बस एक चीज ही मांगी, इंटरव्यू के समय मैं नर्वस न होऊं। हद से ज्यादा मेहनत लोगों को अहंकारी बना देती है, मेरा भी उस वक्त वैसा ही हाल था। मुझे लग रहा था कि जो भी पूछा जाएगा उसे बता लूंगा...
पहुंच गया शेखर जी के पास
रिसेप्शन पर पहुंचकर शेखर त्रिपाठी जी से बात की और अपने बारे में बताने से पहले सदगुरु सर का रिफ्रेंस दिया। शायद सर ने उनसे बात की थी जो तुरंत ही उन्होंने केबिन में बुलाया। उन्होंने बस दो सवाल ही पूछा, पहला मेरा मोबाइल मल्टीमीडिया है या नहीं? दूसरा देश में कितने इंटरनेट यूजर हैं? शेखर जी के पास स्पाइस का क्वार्टी की बोर्ड मोबाइल फोन था, मैंने अपना उत्तर मल्टीमीडिया दिया। दूसरे प्रश्न में मैंने कहा सर करीब नौ फीसद। इसके बाद उन्होंने मुझे अॉनलाइन की चुनौतियों के बारे में बताया, पत्रकारिता में नौकरी-सैलरी का डर दिखाया, फिर भी मैं नहीं डिगा तो नेशनल एचआर हेड डॉ.उपेंद्र पांडेय जी के पास भेज दिया। सीढ़ी से नीचे डॉ.उपेंद्र जी का केबिन था, जिससे पूछता वो मुझे ऐसे घूरता जैसे एलियन हूं। इसी बीच चाय लेकर एक व्यक्ति जा रहा था तो उसने कहा चलिए मैं उनके पास ही चल रहा हूं। उनके केबिन में पहले से एक व्यक्ति मौजूद था तो मैं बाहर ही खड़ा रहा। शायद चपरासी ने बता दिया था कि बाहर खड़ा लड़का आपका इंतजार कर रहा है, इसलिए उन्होंने बुला लिया।
मन ही मन दे डाली सारी गालियां
क्या नाम है, सदगुरु जी को कैसे जानते हो, एमजेएमसी में कितने पैसे बर्बाद किए, पापा क्या करते हैं... इन प्रश्नों के उत्तर दे दिया तो उनका अगला प्रश्न मेरे कॉन्फिडेंस को झकझोर कर रख दिया। लडकियां दोस्त हैं, सकारात्मक उत्तर मिलते ही अगला प्रश्न बाप का कितना पैसा उन पर उड़ाते हो। मेरे पापा आरपीएफ (रेलवे प्रोटक्शन फोर्स) में हैं, बाकी चाचा और ताऊ भी यूपी पुलिस में हैं इसलिए तरह-तरह की गालियों को तो बचपन में ही सीख गया था। मैंने मन ही मन उनमे से अधिकतर उन्हें दे डाली। बुरी तरह से नर्वस हो चुका था, वापस रूम पर जाना चाहता था, लेकिन तभी शेखर जी आए और उनको बाहर लेकर चले गए। उनके केबिन में जो पहले से बैठे थे शायद सदगुरु सर को जानते थे, उनकी एक बात मेरे दिल को छू गई। बोले, आप इलाहाबाद सदगुरु जी के पास ही चले जाओ अगर पत्रकारिता करना चाहते हो और अगर पैसे कमाना चाहते हो तो कहीं भी कर लो, नौकरी की कमी नहीं है इस फिल्ड में। इसी बीच डॉ. उपेंद्र जी आ गए और उस समय पीटीआइ और दूरदर्शन में जॉब निकली थी उसमें अप्लाई करने की सलाह दी। कहा अगर वहां न हो तो सरकारी नौकरी की तैयारी कर लेना। बोले, कहां फंसना जाहते हो, बेटा दैनिक जागरण है ये यहां तो पूरी लाइफ ही बर्बाद हो जाएगी, वैसे भी अब यहां ऐसे नौकरी नहीं मिलती, ट्रेनी की परीक्षा होती है उसके जरिए सीट भरी जाती है। अब तक मैं समझ चुका था कि यहां मुझे नौकरी नहीं मिलने वाली, इसलिए बगैर किसी रिस्पॉन्स के उनके केबिन से बाहर आ गया।
बुरा अनुभव लेकर बाहर आया
दैनिक जागरण नोएडा अॉफिस के बाहर थोड़ी दूर पर सिगरेट की दुकान है, सोमदत को वहां दो बजे तक आने को कहा। इस बीच करीब दो घंटों के बीच मैंने सिगरेट की पूरी डिब्बी खत्म कर दी। मैंने मन ही मन निश्चय किया कि अब खुद से ही प्रयास करूंगा। सोमदत से मैं अपनी लगभग सभी बातें शेयर करता था, लेकिन उसे बस इतना बताया कि बहुत अच्छा गया है इंटरव्यू। हमने चाय पी, अपने कॉलेज के सामने सड़क के सामने उसी दुकान पर, जहां कॉलेज के समय पीते थे। सोमदत ने मुझे घर से कुछ दूर पहले मेरे दोस्त के अपार्टमेंट के नीचे छोड़कर वापस चला गया। इसके बाद हम दोनों काफी देर तक बात करते रहे। अपने चेहरे पर जरा सी भी परेशानी नहीं उभरने दी। उसे दिलासा दिया कि जल्द ही जागरण में मेरा हो जाएगा। झूठ इसलिए क्योंकि मेरी जॉब मेरे उस दोस्त के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी, उसकी आधी टेंशन दूर हो सकती थी। हम रात करीब साढ़े आठ बजे तक बाहर बैठकर बात करते रहे। इसके बाद मैंने ज्यादा समय होने का बहाना बनाकर घर जाने की बात कही. ऐसा इसलिए क्योंकि इतनी देर बैठने से थकावट उस पर हावी थी। जिद करने पर मुझे गुस्सा आ गया और मैंने उसे डाट दिया, जिसके बाद रोते हुए वो अपने पीजी में चली गई। मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वहां से वापस लौटने के बाद मैं सीधे साइबर कैफे गया और रेज्यूम की 30 कॉपी प्रिंट करवाई। पैसे देकर चलने लगा तो साइबर कैफे वाले ने पूछा रेज्यूम के इतने प्रिंट क्या करोग? बगैर कुछ बोले मैं वापस घर आ गया। मंगलवार को व्रत में उस समय मैं रात में दूध और केला खाता था, लेकिन मैंने कुछ नहीं खरीदा। रूममेट विनीत ने पूछा तो बता दिया बाहर से जूस और शेक पीकर आया हूं। उस रात मेरी उस दोस्त से बात नहीं हुई। मैंने इंटरनेट से दैनिक भाष्कर, अमर उजाला और हिंदुस्तान के कार्यालय का एड्रेस निकाला और कुछ और जानकारियां। फेसबुक और लिंक्डइन से भी वहां के संपादकीय प्रभारी के बारे में जानकारी जुटाई।
पहले गया दैनिक भाष्कर
सुबह दस बजे नहाकर तैयार हुआ और इंटरव्यू के लिए निकल गया। भाष्कर का अॉफिस गूगल मैप पर देखा था तो फोर्टिस के पास दिखा सेक्टर 63 नोएडा में। मैं वहीं उतर गया। पैदल करीब दो किमी चलने पर गलती का अहसास हुआ और करीब 12 बजे पहुंच गया भाष्कर अॉफिस। पता था जॉब के लिए बताया तो गार्ड अंदर जाने ही नहीं देगा और टरका देगा... इसलिए सीधे संपादकीय प्रभारी का नाम लेकर बोला और कहा उन्होंने बुलाया है काम से। पहली बाधा पार कर उनके संपादकीय प्रभारी के पास पहुंचा। मेरा रेज्यूम लेकर बोले अभी #fresher हो? मैंने हां बोला तो बाकी कोई प्रश्न ही नहीं किया इधर-उधर की बात करके जवाब दिया अभी तो जगह नहीं है जैसे ही जगह खाली होगी आपको जरूर बुलाएंगे।
अमर उजाला के संपादक ने भगा दिया
अमर उजाला में भी भाष्कर की ही तरह झूठ बोलकर अंदर तो चला गया, लेकिन वहां के संपादकीय प्रभारी मुझ पर भड़क गए। मुझ जैसे तुच्छ की जो अभी पत्रकारिता में खड़ा होने की कोशिश ही कर रहा था औकात बताने लगे। मैं चुपचाप सुनता रहा। उनका गुस्सा हद से बाहर हुआ तो गार्ड को बुलाया और मेरे सामने ही उसे भी खूब सुनाया। इस बीच बेचारा गार्ड मुझसे धीरे-धीरे बोलता रहा चलिए बाहर... मैंने कहा जी और उनके केबिन से बाहर निकल गया। गार्ड आगे-आगे मैं पीछे-पीछे, तभी याद आया कि यहां का रेज्यूम खराब जाएगा। सोचा ये मुझे अब कभी लेंगे तो हैं नहीं इसलिए थोड़ा और ब्लड प्रेशर बढ़ाता चलूं। मैं दौड़कर उनके केबिन में फिर गया और अपना रेज्यूम उनके टेबल पर रखकर बोला गुस्सा शांत हो तो देख लीजिएगा, मुझे जॉब की बहुत जरूरत है। संपादकीय का सारा कार्य कर लेता हूं, इस बीच गार्ड भी आ गया और मेरा हाथ पकड़कर बाहर ले आया। केबिन से निकलते ही गार्ड को सुनाया हाथ छोड़ काम हो गया अब मैं खुद चला जाउंगा। बाहर निकला तो मेरा सिर दर्द हो रहा था। मंगलवार को तो व्रत ही था कुछ खाया नहीं था और आज (बुधवार) को मौका नहीं मिला था। शाम के चार बज रहे थे। अमर उजाला से एचसीएल कॉल सेंटर के पास बने फूड सेंटर पर आया और आलू के दो पराठे खाए। टाइम ज्यादा हो रहा था ऐसे में चाय नहीं पी और गाजियाबाद वैशाली सेक्टर तीन के लिए निकल गया।
हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ ने खड़े किए हाथ
हिंदुस्तान के अॉफिस पहुंचने में काफी देर हो गई। शाम का अंधेरा होने वाला था। दो कमरों के ब्यूरो कार्यालय को देखकर थोड़ा अजीब लगा, फिर भी मैं एक रिपोर्टर से पूछते हुए ब्यूरो चीफ के पास पहुंच गया। अपना रेज्यूम दिया और बात शुरू की। शाम का समय था अब समझ में आता है कि अपकंट्री के ब्यूरो चीफ पर कितना प्रेशर होता है उस वक्त। दस मिनट के बीच कई बार फोन और मोबाइल की घंटी बज चुकी थी और हर बार बस एक ही बात बोल रहे थे, 'जी सर... बस पांच मिनट में...।' हाहाहाहाहा... मैं समझ गया कि गलत जगह आ गया हूं, खाली होते ही इनका भी नकारात्मक उत्तर मिलने वाला है। अपने काम से कुछ वक्त निकालकर उन्होंने मुझसे बात की और खरा सच बोला। ब्यूरो चीफ ने कहा दोस्त मैं यहां पर तुम्हें बस स्ट्रींगर ही रख सकता हूं, इसके बाद भी सेलरी के लिए हर माह की गारंटी नहीं ले सकता। उन्होंने मुझे सुझाव दिया अपने हेड अॉफिस जाने का। फिर मैं उनके अॉफिस से बाहर आ गया।
किसी को जानकारी देना ठीक नहीं समझा
हिंदुस्तान के ब्यूरो अॉफिस में पहुंचते ही मेरी दोस्त ने फोन किया और बगैर मेरी बात सुने अपनी दिनभर की भड़ास निकाल
डाली। मैं भी शांत होकर उसकी भड़ास सुनता रहा। कुछ शांत होने के बाद पूछा
कहां हो, दिनभर क्या किया? बगैर देर किए मैंने 'कॉन्फिडेंस वाला झूठ' बोला,
मैंने कहा संजय-सागर के साथ वैशाली आया हूं। इसके बाद उसने फिर सुनाया,
तुम्हें कोई फिक्र नहीं, कौन परेशान है तुम्हें इससे क्या लेना आदि... ।
मैंने केवल इसलिए झूठ बोला क्योंकि अपनी इन बातों को मैं जाहिर नहीं होने
देना चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि मेरे दोस्तों को जॉब सर्च के बारे में
पता चले। जब वापस लौटा तो बहुत थक चुका था। मेरे चेहरे पर थकावट साफ झलक रही थी, इसलिए अपने दोस्त संजय के अॉफिस में मुह धुला और उससे मिलने चला गय। करीब एक घंटे तक बात की, चाय पीया फिर रूम पर वापस आ गया। कंप्यूटर अॉन किया और इस बीच सर्च करने पर #cricket today की सहायक पत्रिका में उप संपादक के लिए अगले दिन से इंटरव्यू पता चला। मैंने अपने दोस्त को भी इसकी जानकारी दी और अगले दिन सुबह दस बजे तैयार रहने के लिए कहा।
मौका मिला, तसल्ली के साथ फेस किया इंटरव्यू
हम दोनों करीब 12 बजे मैंगजीन का पता ढ़ूढते हुए पहुंच गए। इंटरव्यू में हमें एक-एक कर बुलाया गया। बाकी सारे लेवल हमारे अच्छे गए थे। अंत में मैगजीन के एडीटर ने कुछ लोगों को इंटरव्यू के लिए बुलाया बाकी जो फेल हो गए थे उनको जाने के लिए बोल दिया गया। मैं और मेरी दोस्त उन लोगों में शामिल थे जिनको इंटरव्यू के लिए रोका गया था। दो बज चुके थे, लेकिन अब तक मैंने केवल पानी ही पीया था। मेरी दोस्त ने भी केवल चाय पी थी। एडीटर ने हमसे चार शब्द पूछे- श्मशान, आशीर्वाद, अंतर्राष्ट्रीय और कॉरपोरेट तीनों शब्दों को मैंने ऐसा ही लिखा। इसके बाद सेलरी पूछा तो मैंने कहा पहली जॉब है, आपकी नजर में जो मेरी कीमत हो उतना फिक्स कर दीजिए। मेरी दोस्त से भी शायद यहीं प्रश्न पूछा गया था। इंटरव्यू के बाद कहा गया कि आपको कॉल करके सूचना दी जाएगी। मैं खुश था कि अब तो जॉब मिल ही जाएगी। दिल्ली में कालका जी के पास औद्योगिक क्षेत्र में इंटरव्यू था, वहां आसपास कुछ खाने के लिए नहीं मिला। मेरी दोस्त मुझे कुछ खाने के लिए जिद कर रही थी, जिस पर कॉलेज के सामने स्ट्रीट स्टॉल लगाने वाले गुप्ता जी के यहां पराठे खाने की बात कहकर चल दिया। गुप्ता जी के यहां पराठे खाए फिर उसके घर छोड़ते हुए अपने रूम पर आ गया।
इंडिया टुडे में मार्केटिंग की शिक्षा
रूम पर बगैर देर किए मैंने रेज्यूम की कॉपी उठाई और नोएडा के सेक्टर 57 स्थित कार्यालय पहुंच गया। जल्दबाजी में मैंने इंडिया टुडे के संपादकीय कार्यालय की जगह प्रसार और मार्केटिंग कार्यालय का एड्रेस निकाल लिया था, इसकी जानकारी वहां पहुंचने पर हुई। शाम करीब चार बजे अॉफिस का नजारा पिकनिक स्पॉट की तरह था। मैं गया तो मार्केटिंग मैनेजर ने बात की। खुद से ही मेरा रेज्यूम लेने के लिए हाथ बढ़ा दिया तो मैंने भी दे दिया। हॉल टाइप कमरा था जहां उनके स्टाफ के करीब एक दर्जन लोग गप्पे हांक रहे थे और नाश्ता कर रहे थे। फिर उन्होंने एडिटोरियल पर लेक्चर देना शुरू कर दिया, अपनी बात बेहतर बताने के लिए अपने जूनियर्स से भी हामी भरवाते रहते।उन्होंने मुझे मार्केटिंग में जॉब की सलाह दी और सेलरी भी बता दी कमीशन के साथ। मैंने उनकी सारी बात सुनने के बाद कहा एडिटोरियल की वजह से ही आप लोग भी है... इस इंडस्ट्री की पहचान ही वे हैं। आपकी बात ठीक है, लेकिन मैं दूसरी फिल्ड में नहीं जा सकता। मेरी बात उनको शायद बहुत बुरी लगी, बोले- बेटा तुम्हारे जैसे रोज सैकड़ों लोग संपादक बनने का ख्वाब लेकर आते हैं। जब तक जेब में बाप के पैसे होते हैं ऐसी ऐंठ दिखाते हैं औॅर जेब खाली होने पर स्नैचिंग करने लगते हैं और भी बातें कहते रहें, लेकिन तब तक मैं बाहर निकल आया।
पढ़ाई नहीं उनको किसी और की चाहिए थी जानकारी
एक सप्ताह तक यही सिलसिला चलता रहा, सुबह नौ से दस बजे के बीच जॉब की तलाश में निकलता और देर शाम तक गाजियाबाद के इंदिरापुरम स्थित अपने कमरे पर पहुंचता। इस दौरान मैंने फिल्म सिटी नोएडा, विडियोकॉन टावर इंडिया टुडे ग्रुप दिल्ली की खाक छानी। इंडिया टुडे ग्रुप के सिवाय अन्य कहीं भी मेरा रेज्यूम नहीं लिया गया, लेकिन हर जगह मैंने बहुत कुछ सीखा। कुछ लोगों से बेरूखी से बोलकर ज्यादा बिजी होने का दिखावा करने की कला तो कुछ को काम के लिए पागल कैसे हुआ जाता है इसकी कुशलता। कुछ लोगों ने ऐसे झिड़क दिया जैसे वो कभी फ्रेशर नहीं थे या उनका बच्चा कभी फ्रेशर नहीं होगा, लेकिन कुछ लोगों ने बड़े प्यार से समझाया भी।
एबीपी न्यूज में गया तो वहां के गार्ड एक सज्जन के पास भेजा, पहले उन्होंने मेरे सेक्स टेस्ट, पिछला अनुभव आदि पर आधारित इंटरव्यू लिया। एनडीटीवी में शानदार स्वागत के बाद अॉक्टोपस पर कार्य सीखने के बाद आने का अॉफर दिया गया। जी न्यूज में रेज्यूम फाड़कर मेरे मुंह पर फेंक दिया, बोले यहां फ्रेशर्स नॉट एलाउ है...दोबारा मत आना। आइबीएन-7 में वेब के लिए जगह खाली थी, लेकिन अंग्रेजी कमजोर होने की वजह से उन्होंने मनाकर दिया।
एक दिन मैं नेहरू प्लेस गया, चूंकि नेट पर अॉक्टोपस सॉफ्टवेयर का डेमो वर्जन नहीं मिला तो वहां से खरीदने के लिए, लेकिन दिनभर खोजने के बाद भी सॉफ्टवेयर नहीं मिला। इस दौरान मेरा सोमदत और मेरी दोस्त से बातचीत भी बेहद कम हो रही थी। रविवार को सोमदत आया और हम दोनों अपने कॉलेज में पार्ट टाइम पढ़ाने वाले एक सर से बात करके नोएडा के स्थानीय अखबार में सोमवार को गए, लेकिन वहां कार्यालय बंद था। उसके अगले दिन सोमदत के साथ पंजाब केसरी के नोएडा ब्यूरों में गया, अखबार कार्यालय से ज्यादा अय्याशी का अड्डा लग रहा था। सोमदत भी जॉब के लिए बहुत परेशान था, लेकिन उसने भी वहां जॉब से मनाकर दिया। इस बीच सोमदत ने राष्ट्रीय सहारा समाचार पत्र का दामन थाम लिया, लेकिन मैं और मेरी दोस्त अभी भी जॉब की तलाश में लगे हुए थे।
अगले हिस्से में पढ़ें- मेरी पहली जॉब और अॉफिस का माहौल
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