पटना में रहने वाली मुन्नी (परिवर्तित नाम) का परिवार 20 दिन पहले तक उन 32 करोड़ भारतीयों की तरह खुशहाल जिंदगी जी रहा था, जिसे मध्यम वर्ग कहा जाता है। उसके घर का ठीक वैसा ही रूटीन था जैसा की हमारे-आपके घरों का होता है। कभी पिता के दुलार तो कभी मां के गुस्से वाली अावाज से मुन्नी के दिन की शुरुआत होती थी। मुन्नी के परिवार की प्रतिष्ठा पर कभी उंगली तक नहीं उठी थी, इसी कारण उसके पिता भी फक्र से सीना चौड़ाकर सबसे नजरे मिलाते थे। लेकिन एक दिन ऐसा भूचाल आया कि सबकुछ खत्म हो गया। मुन्नी का परिवार उजाले में बाहर निकलने से भी परहेज करने लगा।
मुन्नी शहर के नामी स्कूल की छात्रा है जो 11वीं में फेल हो गई। घरवालों की अपेक्षा इतनी थी कि डरी हुई मुन्नी ने घरवालों को यह बात नहीं बताई और स्कूल के बहुरूपिए शिक्षकों के चक्कर में पड़ गई। शिक्षकों ने पहले तो उसका आर्थिक शोषण किया, उसके बाद शारीरिक शोषण का दौर शुरू हो गया। शिक्षक का चोला ओढ़े दरिंदों ने ब्लैकमेल करते हुए लंबे समय तक उसका शोषण किया। बात जब काफी बढ़ गई तो मुन्नी ने घरवालों को सबकुछ बताने का फैसला किया, इसी बीच बेखौफ दरिंदों ने उसका अपहरण कर लिया।
19 दिनों तक खुद को समाज का चौथा स्तंभ कहने वाली मीडिया ने मुन्नी और उसके परिवार को सुर्खियों में ला दिया। पटना का बच्चा-बच्चा मुन्नी के नाम और उसकी पहचान से वाकिफ हो गया। विधानसभा में भी मुन्नी की गूंज सुनाई देने लगी। दबाव बढ़ा तो पुलिस ने भी सक्रियता दिखाई और मुन्नी को ढ़ूढ़ निकाला। मुन्नी दो दिन शहर के एक थाने में रखा गया, उसका परिवार भी साथ था। मां, बाप, बहन सबकी आंखों में नींद नहीं बस आंसू थे, लेकिन इस बीच भी बेदर्द मीडिया को उस दर्द का अहसास न था। कभी सूत्रों के हवाले से तो कभी अधिकारियों के हवाले से ऊल-जूलूल बातों को तड़का लगाकर परोसने में व्यस्त था।
दो दिन बाद पुलिस ने मुन्नी को जब कोर्ट में पेश किया तो उस मासूम ने देश की न्याय प्रक्रिया पर भरोसा जताया। कोर्ट में मुन्नी ने अपने साथ हुई ज्यादती की जो कहानी पेश की वह रूह कंपाने वाली थी। मुन्नी ने बताया कि उसके साथ गैंगरेप हुआ है। कई दिनों तक भूखा रखा गया, मारपीट की गई, पुलिस के डर से कभी खंडहर में छुपाया गया तो कभी नशे का इंजेक्शन देकर बेहोश किया गया। लापरवाह मीडिया की वजह से मुन्नी और उसका परिवार अब बदनाम हो चुका है। मीडिया ने भी अब उसका नाम छापना बंद कर दिया है, क्योंकि अब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का कवच उसे मिल गया।
- क्या ऐसे मामलो में मीडिया को पीड़ित परिवार की पहचान उजागर करनी चाहिए थी?
- ऐसे परिवार की पहचान सबके सामने लाने से पहले क्या रिपोर्टर को जरूरी पड़ताल नहीं करनी चाहिए?
- कानूनी रूप से मीडिया निर्दोष है... लेकिन क्या हमारे Ethics क्या इसकी इजाजत देते हैं?
अपनी गलती न मानने के हम कई बहाने दे सकते हैं, मसलन जानकारी नहीं थी, आभास न था... लेकिन क्या आप मान सकते हैं कि एक मंझा हुआ पत्रकार ऐसी घटना का अंजाम न भांप सके... अगर ऐसा ही था तो वह पत्रकार अबोध बालक की तरह निर्दोष है, लेकिन उसकी खबर जिन वरिष्टों के पास से गुजरी उनको इस अपराध के लिए जरूर प्रायश्चित करना चाहिए।
(मेरी बात से अगर किसी को ठेस पहुंची हो तो माफी चाहूंगा...)
लोगो क्रेडिटः राकेश शर्मा
लोगो क्रेडिटः राकेश शर्मा
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