रायबरेली के बछरांवा रेलवे स्टेशन पर हुए ट्रेन हादसे पर तरह-तरह की बातें सामने आ रही हैं। कुछ रिपोर्ट्स की माने तो रेल इंजन का ब्रेक फेल हो गया था तो कुछ ड्राइवर पर सिग्नल की अनदेखी करने की बात कह रही हैं। इस बीच एक बार फिर काकोडकर समिति की सिफारिश के पालन की बात उठने लगी है। काफी करीब से रेलवे से जुड़ा हूं, इसलिए जो जानकारी है उसे साझा करना चाहता हूं... अगर कुछ गलत हो तो जरूर सुझाव दें...ब्रेक फेल होने की रिपोर्ट तो एक नजर में ही डेस्क रिपोर्टिंग वाली बात है। ट्रेन का ब्रेक कभी फेल नहीं हो सकता... चार लेयर से ब्रेक प्रणाली को व्यवस्थित किया जाता है। इनमे से वैक्यूम सिस्टम तो काफी सशक्त होता है। मैंने खुद इसे अजमाया है, किसी भी परिस्थिति में बैक्यूम ब्रेक लगाने पर गाड़ी महज 100-150 मीटर की दूरी पर रुक सकती है। आपातकाल के दौरान ड्राइवर सामान्यतः इसी ब्रेक सिस्टम पर यकीन भी करते हैं। बाकी तीन में से दो सामान्य है जबकि तीसरा रिवर्स सिस्टम है जो काफी खतरनाक होता है, इसे बेहद जरूरी होने पर ही प्रयोग किया जाता है, जो ट्रेन को 100 मीटर के अंदर रोक देता है।
सिग्नल को नजरअंदाज करने वाली बात पर भी यकीन नहीं किया जा सकता। दरअसल सिग्नल लाल होने की स्थिति में कैंची (लूप लाइन या सेंटिंग लाइन में गाड़ी प्लेस करने वाली पटरी को जोड़ने वाला जोड़) लॉक हो जाता है, ऐसे में ट्रेन उस लाइन तक तो पहुंच ही नहीं सकती जहां हादसा हुआ। अगर सिग्नल नजरअंदाज किया गया था तो ट्रेन कैंची लाइन के पास ही पलट जाती जैसा नहीं हुआ।
इस ट्रेन हादसे की कहानी कुछ और ही है... रेलवे इंजीनियरिंग और सिग्नल विभाग के कुछ लोगों को बचाने के लिए मनगढ़ंत बयानबाजी कर रहा है, जिसे मीडिया नमक-मिर्च लगाकर परोस रहा है। अब तक किसी मीडिया रिपोर्ट में लोको इंजन के इंजीनियर से बातचीत सामने नहीं आई है। छोटी सी दुर्घटना में तुरंत विशेषज्ञ से चर्चा शुरू हो जाती है, तो इतने बड़े मामले में चुप्पी क्यों भाई।
अब अंतिम बात लिंक हॉफमैन बुश (एलएचबी) कोच की, जिसका सुझाव रेलवे संरक्षा समिति काकोडकर की ओर से दिया गया था। एलएचबी सिस्टम से लैस कोच एक-दूसरे पर चढ़ते नहीं है और न ही मुड़ते है। ऐसे में दुर्घटना होने पर जान-माल की क्षति कम होती है। जर्मन से आयातित इस technology के कोच सबसे पहले नई दिल्ली से लखनऊ के बीच चलने वाली शताब्दी सुपरफास्ट एक्सप्रेस में लगाए गए थे। एलएचबी कोच काफी मंहगा होने के साथ ही केवल ए ग्रेड की रेलवे लाइनों के लिए ही उपयुक्त है। बी या सी ग्रेड की लाइनों पर इनमें कपलिंग टूटने की शिकायत आती है। मतलब एलएचबी कोच से पहले लखनऊ-वाराणसी रेलवे ट्रैक का Modernization किया जाय फिर ऐसी पैसेंजर ट्रेनों में अरबों रुपये के कोच लगाए जाए। भाई क्यों मजाक कर रहे हो... 72 सीटों वाले जनरल कोच की हालत आपने नहीं देखी है क्या? रेलवे की माली हालत अभी ऐसी नहीं है कि 72 सीट वाले कोच में ठूस-ठूस कर भरे 500 लोगों को आरामदायक सफर उपलब्ध करा सके। ऐसे में मुंगेरी लाल के सपने न ही दिखाएं तो बेहतर है...।
ट्रेन हादसों को रोकने के लिए जवाबदेही तय होने के साथ ही समय-समय पर कर्मचारियों का मेडिकल टेस्ट और और अन्य जांच भी होनी चाहिए। दो पैग लगाकर छोटी सी बाइक चलाओगे तो हजारों का चालान होगा और जेल भी जाना पड़ सकता है... बगैर बताए कहीं भी आपको चेक किया जा सकता है, लेकिन ट्रेन को ड्राइवरों के लिए ऐसा होता देखा है क्या आपने? मेरा इशारा तो समझ गए होंगे... अब देखते रहिए सच्चाई बाहर आती है या नहीं...
टिप्पणियाँ