आपकी वजह से तो तड़प कर मर रहीं हैं गाय और बात करते हैं बीफ पर प्रतिबंध की...

सोशल मीडिया पर आजकल एक बड़ी बहस चल रही है... बीफ को लेकर। सभी की अपनी-अपनी राय है, हो भी क्यों न। हम ऐसे देश में रहते हैं, जो अपने खानपान को लेकर भी दुनिया में मशहूर है। वैसे तो मैं शाकाहारी हूं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से बीफ पर प्रतिबंध के खिलाफ हूं। जिस धर्म-जाति से हूं शायद उसके ठेकेदारों को मेरी बात बुरी लगे, लेकिन मुझे उसकी परवाह नहीं। बीफ पर बात करने से पहले खिलाफत करने वाले उन ठेकेदारों से पूछना चाहूंगा कि उन्होंने अंतिम बार किसी बूढ़ी गाय या बैल को कब पेट भर भोजन कराया था...घायल  कराह रही गाय को कब अस्पताल पहुंचाया था... मंदिर तो शायद रोज जाते होंगे लेकिन क्या कभी गौशाला में भी जाने के लिए टाइम निकाला? यकीन है मुझे टीवी और अखबारों में रोज बड़े-बड़े बयान देने वाले धर्म के ठेकेदारों ने कभी ऐसा नहीं किया होगा।
पशु पालन केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं, शहरी क्षेत्रों में भी खूब क्रेज है। सड़क पर घूमते गौ वंशियों से आपका भी सामना हुआ होगा... कई बार इनकी वजह से चोटिल भी हुए होंगे। फिर भी कभी इनके बारे में सोचने की जहमत नहीं उठाई। दरअसल जब तक गाय दूध देती है तब तक ही वो हमारी गौ माता होती है... जब तक बैल जवान होता है तब तक ही वो हमारे लिए नंदी के समान होता है... लेकिन बूढ़ा होने पर उन्हें अावारा छोड़ देते हैं। हमारी गौ माता और नंदी समान बैल कूड़े के ढेर से पॉलिथीन खाने को मजबूर हो जाते हैं... छूधा (भूख) शांत करने के लिए रेहड़ी वालों के सामानों में मुह मारता है, जिसकी कीमत उसे मार खाकर चुकानी पड़ती है। उसकी वजह से ट्रैफिक जाम लगता है तो आप भी झुंझलाते हैं, लेकिन उस समय आपको गौ माता या नंदी की याद नहीं आती। वो दिन भी आता है जब पेट में जमा पॉलिथीन के कारण असहनीय पीड़ा सहकर आपकी गौ माता या नंदी दम तोड़ देते हैं। सड़क किनारे पड़े उनके शव को देखकर भी आपका कलेजा कभी नहीं पसीजा होगा... बेरहमी की हद पार करते हुए आप साइड से चले गए होंगे। आपके तो एक मिनट या चंद पैसे उस कॉल पर भी बर्बाद नहीं हुए होंगे जिससे नगर निगम को सूचना मिल जाती और गौ माता के शव को बीच सड़क से हटाया जा सकता। फिर किस हक से आप बीफ पर प्रतिबंध लगाने की आवाज बुलंद कर रहे हैं? आपके पास पनीर, मशरूम, लाजवाब मीट, चिकन का स्वाद लेने के लिए पैसे हैं, लेकिन दिनभर रिक्शा खींचकर लाजवाब खाने का शौक पूरा करने वाले मंगतराम के पास तो इतने पैसे नहीं है। तो क्या वो चंद रुपये में मिलने वाले बीफ के स्वाद से भी वो मरहूम हो जाए? आपकी गौ माता या नंदी को तो उसने उतना दर्द नहीं दिया, जितना आपने दिया। 
चलिए आपकी बात को ही मैं बुलंद करता हूं... बीफ पर प्रतिबंध लगवाने के लिए मैं भी आपके साथ खड़ा हो जाऊंगा, लेकिन इसके लिए मेरी कुछ शर्तें हैं। बीफ पर प्रतिबंध लगाने से पहले वो कानून भी लाना होगा, जिसमें गाय, बैल या सांड़ को आवारा घूमते देखने वाले को अपने घर में शरण देनी होगी... बूढ़ी हो चुकी गाय को उसके अंतिम समय तक घर में रखना होगा और ठीक से देखभाल करनी होगी... मंदिर जाने से पहले सबको गौशाला जाना जरूरी होगा... रेहड़ी वालों के सामानों में मुह मारने पर इनकी पिटाई नहीं बल्कि आदर से पेट भर खिलाना होगा... अगर गौ माता ने पॉलिथीन खा लिया तो फौरन अस्पताल ले जाएंगे और उनके पेट से उसे निकलवाएंगे। अगर ऐसा कानून आ जाता है तो मैं भी उस जमात का हिस्सा हूं, जो बीफ पर प्रतिबंध की आवाज बुलंद कर रहा है... नहीं तो नौटंकी करना बंद कीजिए और गरीबों का निवाला मच छीनिए... 

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