इन मुसलमानों का तो खुदा भी दूसरा है...

श्रीनगर में भारत विरोधी नारे लगाता मसरत आलम। 
छोटा था तो पापा एक कहानी सुनाते थे... कानपुर में उनकी पोस्टिंग के दौरान भीषण दंगा हुआ था। बाकरगंज मुहल्ले में एक मुस्लिम परिवार को हिंदू ने शरण दी थी। दंगा जब कुछ शांत हुआ तो मुस्लिम परिवार ने उस (जिसने शरण दी थी) पर हमला कर दिया, लेकिन हिंदू परिवार के मुखिया ने समय रहते उसे और उसके परिवार को गोली मारकर खत्म कर दिया। कहानी सच थी या झूठ पता नहीं लेकिन इतना आज भी यकीन है कि पापा के दिल में यह बात बैठ गई। वे हमेशा मुझसे कहा करते थे मुसलमानों से दूर रहना, ये कभी दोस्त नहीं हो सकते, वगैरह... वगैरह... लेकिन मैंने उनकी इस बात को कभी नहीं माना। 
मेरे अच्छे दोस्त हैं... अतीक खान, वली मोहम्मद, जावेद, रहमान, नावेद, मोहम्मद वसीम आदि। दर्जनों ऐसे नाम हैं, जिनके साथ एक थाली में खाना खाया है। भगवान भी आकर कहे कि ये मसरत आलम, आसिया अंद्राबी जैसे हैं तो यकीन नहीं करूंगा और भगवान बदल दूंगा। करीब से देखा है इन मुसलमानों को... कुछ भी कर सकते हैं लेकिन देश के साथ गद्दारी नहीं। मसरत आलम, आसिया अंद्राबी जैसे लोग खुद को किस हक से मुसलमान कहते हैं मुझे पता नहीं... शायद इनका तो खुदा भी दूसरा है। मेरे दोस्तों ने तो बताया है कि मुसल्लम हो ईमान जिसका वही सच्चा मुसलमान होता है। पाक कुरान में तो इंसानियत वास्ते जो नियम बनाए गए हैं उतना कड़ा तो हमारा कानून भी नहीं है।
मसरत की गिरफ्तारी के बाद श्रीनगर में राष्ट्रीय ध्वज जलाती भीड़। 
#मसरत जैसे देशद्रोही इन्हीं मुसलमानों के नाम पर जिंदा है। इनकी औकात इतनी भौंकने की केवल इसीलिए हुई क्योंकि हमारी राजनीति और न्यायपालिका में ही गंदगी है। किसी भी नेता ने इस पर कड़ी कार्रवाई की मांग के लिए अनशन नहीं किया... सड़क पर उतरने की जहमत नहीं उठाई... क्योंकि देशद्रोही मसर्रत मुसलमान है। सोच हो गई है मुसलमानों के खिलाफ बोलेंगे तो देश के 33 फीसद वोट बैंक में सेंध लग जाएगी। कश्मीर में मसरत की इन हरकतों को अगर अलगाववादी का रंग देकर अनदेखा नहीं करेंगे तो हमें सत्ता का सुख नहीं मिलेगा। 
दिल्ली में महज 20-25 हजार रुपये कमाने वाला ट्रैफिक सिपाही अगर सरेआम किसी से सौ रुपये ले ले तो सर्वोच्च न्यायालय भी स्वतः संज्ञान लेकर ऐसे कमेंट करते हैं कि भाई वाह... सीना 56 इंच फूल जाता है। जज साहब की गाड़ी कहीं खड़ी हो और street vender दिख जाए तो तय है दूसरे दिन उनको हटाने वाला स्वतः संज्ञान वाला आदेश आ जाएगा छपास वाले कमेंट के साथ । लेकिन इनकी कान तक ऐसे देशद्रोहियों की आवाज न जाने क्यूं नहीं पहुंच पाती। किस बात की न्यायपालिका... आप बेशक अंधे हैं, लेकिन कान तो खुले हैं, आवाज भी अगर न जा रही हो तो राष्ट्रपति को चाहिए कि दुनिया के कोने-कोने में फैले रॉ के देवतुल्य एजेंट्स को भारत बुलाकर इनकी जेब टटोलवाना चाहिए। घंटे का लोकतंत्र है ये... कहने को ये माननीय तनख्वाह हमारी जेब से लेते हैं और हम इनके कामकाज पर उंगली भी न उठाएं। 
मसरत की गिरफ्तार की बाद सुरक्षाबलों पर पथराव करते मुसलमान।

हमारे फेसबुक के एक मित्र ने मसरत की इस हरकत को उस घटना का उत्तर बताया जिसमें सेना ने एक निर्दोष युवक को एनकाउंटर में मार गिराया। माफ कीजिएगा... आप मुझसे सीनियर हैं... अनुभव अधिक है... लेकिन आपकी बात से सहमत नहीं हूं। सेना ने गलती की है तो उसका ये तरीका तो नहीं हो सकता। फिर भी अगर आपकी बात ठीक है तो पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार और अन्य कई राज्य जो नक्सलवाद और माओवाद का दंश झेल रहे हैं वहां से सुरक्षा बलों को बुला लो। नक्सली, माओवादी भी तो अपने ही हैं... विकास नहीं कराया सरकार ने तो हथियार उठा लिया... जमींदारों ने जुल्म ढाया तो हथियार उठा लिया... आपकी नजर में ये भी तो सरकार की भूल का उत्तर कहा जा सकता है। विचाराधीन कैदी अगर जेल से पांच साल बाद निर्दोष साबित होकर रिहा होता है तो क्या उसे अपने घर की छत पर पाकिस्तानी झंडा फहराना चाहिए? 
मैं देश के विकास के लिए इंटरनेशल मार्केट में 20 रुपये में बिकने वाला पेट्रोल 60 रुपये में खरीदता हूं... अच्छी सड़क, सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधा के लिए अपनी गाढ़ी कमाई से टैक्स देता हूं, लेकिन मुझे इनका लाभ नहीं मिला तो पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाना चाहिए... हथियार उठा लेना चाहिए... सेना पर पत्थर बरसाने चाहिए... हिंदूओं के घरों में आग लगा देनी चाहिए। 


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