विकसित देशों की नकल कर मई 2006 में ई-गवर्नेंस लागू तो कर दिया गया, लेकिन ई-सुरक्षा की कोई तैयारी ही नहीं की गई। केंद्रीय और राज्य स्तर पर फिलहाल इस योजना का करीब 65 फीसद ही विस्तार हो सका है, लेकिन इन नौ सालों में हर रोज औसतन दस हजार के करीब छोटे-बड़े साइबर हमले हुए, जिनसे हमारी साइबर सुरक्षा की तैयारियों की पोल खुल गई।
ई-सुरक्षा में हम कितने लाचार है इसकी बानगी थोड़ा इस मुद्दे से हट कर देखने पर पता चलती है। दंतेवाड़ा के चिंतलनार जंगल में नक्सलियों के हमले में छह अप्रैल 2010 को सीआरपीएफ के 72 जवानों समेत 75 लोग मारे गए थे। शुरुआती जांच में बताया गया कि विभाग का वायरलेस सेट नक्सलियों के हाथ लगा था, जिसकी वजह से लोकेशन ट्रैस कर घटना को अंजाम दिया गया, लेकिन बाद में सच्चाई सामने आई, जिसमें नक्सलियों ने सीआरपीएफ के वायरलेस फ्रिक्वेंसी को हैक कर पूरे अभियान की जानकारी ली थी। देश में ये रेडियो फ्रिक्वेंसी हैकिंग का पहला मामला था... जिक्र इसलिए जरूरी समझा क्योंकि हमारे देश में अभी भी इससे बचने का कोई खास इंतजाम नहीं है।
हाल ही में हुई एक घटना तो पूरे ई-गवर्नेंस को ही कटघरे में खड़ा करती है। सेना की अति सुरक्षित मानी जाने वाली वेबसाइट दस अप्रैल को हैक कर ली गई थी। जवानों की सैलरी से संबंधित दस्तावेजों के साथ ही अन्य गोपनीय दस्तावेज भी हैकर्स के कब्जे में चले गए थे।
पिछले साल के सबसे बड़े साइबर हमलों में अगर देखा जाए तो आठ नवंबर को पाकिस्तान के हैकर्स ने आंध्रप्रदेश, तेलांगना और उड़ीसा की 22 सरकारी वेबसाइट्स को एक साथ हैक कर लिया था। टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल की वेबसाइट को भी हैक कर पाकिस्तानी झंडा फहराया गया था।
देश में ई-गवर्नेंस के झोल का हाल बताने के लिए इतने उदाहरण तो काफी है... योजना का मौजूदा हाल क्या है, इसकी भी जानकारी खूब होगी। अब बात करते हैं एम-गवर्नेंस की। विकसित देशों में 2012 से इसकी शुरुआत हो चुकी है और मौजूदा समय में करीब 40 फीसद के वित्त क्षेत्र में एम-गवर्नेंस का कब्जा भी है। एम-गवर्नेंस मतलब मोबाइल पर आर्थिक और अन्य सुविधाओं की उपलब्धता। लेकिन मोबाइल सुरक्षा में दुनिया में जो हलचल है वो हैरान करने वाली है...
अमेरिका में बायो हैकर (किसी अच्छे काम या सुरक्षा टेस्ट के लिए हैकिंग करने वालों को बायो हैकर कहते हैं) सेथ व्हाल ने एम-गवर्नेंस की जो कमी सामने लाई है... शायद उसको ध्यान में रखते हुए एम-गवर्नेंस के बारे में सोचना ही बंद कर देना चाहिए। (वैसे मोबाइल बैंकिंग के बारे में आपकी सोच एम-गवर्नेंस की हो सकती है, लेकिन इसमें मिलने वाली सुविधाएं बेहद सीमित हैं। हमारे देश में फिलहाल इस दिशा में सोचना शुरू किया गया है।)
अमेरिका में नेवी के पूर्व अधिकारी सेथ व्हाल ने Radio Frequency Identification (RFID) चिप को अपने अंगूठे और उसके बगल की उंगली के बीच टैटू आर्टिस्ट के जरिए इंप्लांट करवाया। इस चिप से Near field communication (NFC) तकनीक के जरिए हाथ में मोबाइल लेते ही आसानी से वायरस इंस्टॉल हो जाता है।
दरअसल मोबाइल फोन हाथ में लेने के बाद उंगलियों के बीच लगी RFID चिप छोटे एंटीने की सहायता से एनएफसी तकनीक के जरिए मोबाइल से कनेक्ट हो जाती है। इसके बाद मोबाइल से कनेक्टिंग परमिशन मिलते ही किसी भी विंडो के सुरक्षा कवच तोड़ते हुए पूरा डाटा संबंधित सर्वर पर भेजा जा सकता है। इस तकनीक से फोन के साथ ही क्रेडिट कार्ड सिस्टम, मोबाइल पेमेंट, एप्पल-पे, गूगल वैलेट, की-कार्ड और मेडिकल डिवाइस को आसानी से अब तक हैक किया जा चुका है।
फिलहाल इस तकनीक को और भी बेहतर बनाने के लिए सेथ अभी रिसर्च में जुटे हैं और हमारे देश के लोग अभी भी अपने एटीएम और अॉनलाइन ट्रांजेक्शन से हुई धोखाधड़ी की एफआइआर लिखवाने में थाने के चक्कर लगा रहे हैं। केवल नाम लिखने वालों को साक्षर बताने वाले देश में अगर एम-गवर्नेंस पूरी तरह लागू हो गया तो हैकर्स के जलवे कैसे होंगे मौजूदा हालात देख इसे बताने की जरूरत नहीं...
अज्ञानता के हालात तो ये है कि नॉर्टन एंटीवायरस सिक्योरिटी
के हाल के सर्वे रिपोर्ट में सामने आया कि देश के 20 फीसद लोग अपना पासवर्ड 0123456 रखते हैं। 86 फीसद लोग अॉनलाइन बैंकिंग का पासवर्ड न्यूमेरिक, स्पेशल कैरेक्टर और शब्दों के मेल के बगैर बनाते हैं। इतना ही नहीं देश में करीब 88 फीसद लोगों के व्यक्तिगत कंप्यूटर में या तो अच्छी कंपनी का एंटीवायरस सॉफ्टवेयर नहीं है या आउट-अॉफ डेट का है।
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