कुछ वक्त पर किसी का हक है, अदा कर लूं, फिर तो बस अपनी ही बारी है...

अजीब सी कश्मकश में हूं... खुद में उलझ सा गया हूं। झड़ी लगे सवालों में कभी खोने को मजबूर हो जाता हूं तो कभी अपने फर्ज की वफादारी निभाने में। दिनभर की कश्मकश के बाद, अंधेरी रात अपनी बाहों में छुपाने की राह देखने लगती है... उसे भी बस कुछ पल ठहरने की बात कहकर आगे बढ़ता हूं। बारी फिर आती है, अपना एक और फर्ज निभाने की। बिस्तर छोड़ने से पहले सुबह, जैसे वक्त ने चलना शुरू किया था... वैसे ही आधी रात में भी बढ़ रहा है, बस मैं ठहर गया हूं।
कुछ पल अकेले... अंधेरी रात के बीच... दुनिया से दूर... बस खुद के पास रहने की कोशिश कर रहा हूं... खुद से बातें करने की कोशिश में हूं, उलझे हुए सवालों की गुत्थी सुलझाने की कोशिश में हूं। मैं अभी भी जग रहा हूं... चिड़ियों की चहआहट होने लगी है... लग रहा जैसे अपने अंदाज में जिंदगी की एक नई दौड़ फिर शुरू करने का जोश भर रहीं हो। भोर की धुंध छाने लगी है, अंधेरा मानो मेरी तरह अब अकेले में जाने की कोशिश में है। मन में कश्मकश का दौर अभी भी वैसा ही है... जैसा था, लेकिन नींद ओवरडोज होकर अपनी बाहों में छुपा लेती है। कुछ घंटे, दुनिया से बेखबर... सवालों की फेहरिस्त से दूर... गुजारने के बाद वक्त ने फिर आवाज देकर जगा दिया। जिंदगी के एक नए दिन से फिर दो-दो हाथ करने को मजबूर कर दिया। 
अब बारी फर्ज निभाने की है, कुछ अपनों की, तो कुछ समाज की और न जाने किस-किस की। अपनों की हर फरमाइश फिर से दिमाग में घूमने लगती है, सवालों की गुत्थी फिर टकराने लगती है। खुद में उलझा हूं, लेकिन दुनिया को उस उलझन से दूर रखने की भी उलझन है। उलझनों की कश्मकश ने कब कर्मभूमि तक पहुंचा दिया, पता न चला। सच कहूं तो बस दो ही जगह अपने लिए जीता हूं... एक अपनी कर्मभूमि और दूसरी अंधेरी रात में बस खुद के बीच। दोनों समय किसी की न तो दखलअंदाजी चाहता हूं और न ही खुद को बांटना। सवालों की झड़ी तो अब दूर है, लेकिन अपनों की चाहत-अरमानों का पुलिंदा किसी न किसी बहाने ऊपर गिरता रहता है। यहां भी अब थक चुका हूं... काम से नहीं बस इस कश्मकश से... जो कर रहा हूं सही है या गलत, कब तक करूं, किसके लिए करूं, क्यों करूं, कितना करूं और फिर खुद के लिए कब करूं। 
अपने उलझे सवालों और कश्मकश के बीच गोते लगा रहा हूं, भूल गया हूं कि आसपास भी एक दुनिया है, जो सच है... जहां हूं वह तो आभाषी है। किसी का टोकना भी अब तो नागवार लगने लगा है। सवालों की झड़ी में एक नया तैयार हो गया। सामाजिकता का ह्वास तो नहीं हो रहा, कांप उठता हूं, बस इस प्रश्न से ही। सोचने लगता हूं, खुद में उलझे हुए को, लोगों ने नए-नए नाम भी देने तो शुरू नहीं कर दिए। गुरूरी, अभिमानी, स्वार्थी और न जाने क्या-क्या?  दो राहे पर हूं... एक पल को सोचता हूं, ठीक है... देने दो नाम, दूरी से ही मेरी दोस्ती, अकेलापन ही मेरी वास्तविकता है, लेकिन फिर वे भी सामने आते हैं, जिनके लिए बस मेरी हंसी ही सबसे बड़ी पूंजी है, मेरा अल्हड़पन ही पूरी दुनिया है। खुद को संभालता हूं, खोने की राह तलाश रहे दिल-दिमाग को फिर अल्हड़ता की ओर धकेलता हूं। कर्मभूमि से कुछ समय के लिए बिछड़ने का फिर वक्त आ गया है। 
खुद के बीच कुछ पल रहने का फिर मौका है... सवालों की पोटली खोलकर गुत्थी सुलझाने की फिर बारी है। अकेले रहने की कोशिशों के बीच, फिर अपनों की ठक-ठक। कहने को तो कुछ घंटे थे, लेकिन सवालों से लड़ते-लड़ते बीते ऐसे, जैसे अभी-अभी की बात हो। फिर कर्मभूमि तक पहुंचने की बेताबी ने प्रश्नों की पोटली बांध दी, कश्मकश के दौर को ठहरा दिया। फिर वही सिलसिला चलने लगा। अब बात रात की है, आधी रात के घने अंधेरे का इंतजार खत्म हो चुका है। अलविदा कर्मभूमि... अब खुद के बीच खोने की फिर बारी है... न तो बागी हूं और न ही डरपोक... सवालों की पोटली खोलकर हर सवाल का खुद को जवाब देने की तैयारी है... कुछ वक्त पर किसी का हक है, अदा कर लूं, फिर तो बस अपनी ही बारी है। 

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