हौसला देंगे... लेकिन जान नहीं देने देंगे

कहते हैं आईएएस-आईपीएस बनने के लिए कठोर तप करना पड़ता है। जवानी को किताबों में झोकना होता है। मां-बाप, रिश्तेदार, सुख-दुख, फैशन सबको भूल जाने वाली पढ़ाई की जरूरत होती है। बलिया जैसे छोटे से जिले से निकला युवक जब यह ओहदा पाता है तो अंदाजा लगा सकते हैं कि मेहनत की बुलंदी क्या होगी। मां-बाप ने कितनी कठिनाइयों से अपने लाडले को उस मुकाम तक पहुंचाया होगा। लेकिन, सब एक झटके में खत्म हो चुका है। आईपीएस सुरेंद्र कुमार दास अब नहीं रहे। आत्महत्या की जगह उनकी मौत एक हादसा होती तो शायद ज्यादा अच्छा था। 

बचपन से बताया गया है कि सर्वश्रेष्ठ कुछ नहीं होता, बनाना पड़ता है। सिविल सर्विसेज भी मेरी नजर में सर्वश्रेष्ठ नहीं है, लेकिन हजारों-लाखों लोगों के लिए यह सर्वश्रेष्ठ है। यहां का हर कैडेट उनका रोल मॉडल होता है। सुरेंद्र ने उन लोगों का विश्वास तोड़ा है। दोषी केवल सुरेंद्र नहीं हैं। असल गुनहगार तो हमारा सिस्टम है। हमारा एजुकेशन सिस्टम, जो दुनियाभर का ज्ञान बच्चों के दिमाग में तब से ठूंसने लगता है, जब से वह ठीक से खड़ा होना भी नहीं सीख पाता। 10वीं, 12वीं, ग्रैजुएशन, मास्टर्स, डॉक्टर्स और इन सबके बीच न जाने कितनी बार कोचिंग-ट्यूशन का भी मकड़जाल। इतनी पढ़ाई करता है एक नौजवान, फिर भी वह जीना नहीं सीख पाता। स्ट्रेस को झेलने की टेक्निक नहीं समझ पाता। विकास और विश्वास के बीच पिसने लगता है। अवसाद से अकेले लड़ता रहता है, बगैर किसी हथियार, बगैर किसी ट्रेनिंग, बगैर किसी को बताए। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार विश्व में हर साल करीब 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। मतलब हर 40 सेकंड में सुरेंद्र जैसा कोई अपनी जान दे देता है। अपने देश में खुदकुशी की दर सबसे ज्यादा है। इससे भी ज्यादा दुखद तो यह है कि आत्महत्या करने वाले सबसे ज्यादा 15 से 29 साल के बीच के होते हैं। मतलब वही उम्र जिसमें हम उनका माइंड वाश करते हैं कि तुम्हें भी 99 पर्सेंट लाना है। उस सड़े-गले और पुराने हो चुके सिलेबस को रट्टा मारना है। जिंदगी की परीक्षा में बच्चा भले फेल हो जाए, लेकिन लंगड़े हो चुके एजुकेशन सिस्टम का शब्द-शब्द रटा होना चाहिए।

गिनने बैठिए तो गिनतियां कम हो जाएंगी, लेकिन ऐसे रिसर्च की रिपोर्ट कम नहीं होंगी जिसमें साफ कहा गया कि भारत जैसे देशों में अब साइकॉलजी और सेक्स एजुकेशन की शिक्षा अनिवार्य की जानी चाहिए। जीवन में तनाव, रिश्ते का टूटना, बीमारी, संघर्ष, आपदा, दुर्व्यवहार, अलगाव अवसाद के प्रमुख कारणों में से हैं। हम तो ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहां अवसाद को सामान्य तौर पर कोई बीमारी ही मानने को तैयार नहीं होता।

एक दिन में कोई अवसाद की चपेट में नहीं आता। कई महीने, साल लग जाते हैं खुद के लिए जानलेवा होने में। हम फैसला कर लेते हैं खुद को खत्म करने का, लेकिन हमारे आसपास वालों को भनक तक नहीं लगती। अपनों की मनोस्थिति को समझने में बस हमसे यहीं चूक हो जाती है।

हम साक्षर हो या न हो, लेकिन इतना ज्ञान जरूर मिलना चाहिए कि अपनों की मनोस्थिति को समझ सके। उसकी अवसाद की बीमारी को जान सके। समय रहते उसे एक्सपर्ट तक पहुंचा कर अनंतलोक में जाने से रोक सके। शिक्षा में जिस दिन यह बदलाव आ जाएगा, यकीन मानिए उस दिन हमारा सुरेंद्र दास 25 ग्राम सल्फास खाकर जान नहीं देगा। हर हालात से लड़ेगा... थक जाएगा तो हम उसके साथ खड़े रहेंगे। हौसला देंगे, लेकिन जान नहीं देने देंगे। 

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