मैं ईमानदार, बाकी सब बेईमान वाला फंडा तो विद्रोह का



सूबे के अफसर लॉबी के बीच देखने लायक नौटंकी चल रही है। एक वीडियो वायरल हुआ है। इससे जुड़े मसले पर अशोक स्तम्भ का भार उठाने वाले कंधे लचक रहे हैं। होड़ लगी है ईमानदारी की। बेशक आप ईमानदार हैं, लेकिन आपके अलावा सब बेईमान है, यही सोच विद्रोह है। विद्रोह यूं ही नहीं लिख दिया, इसकी भी वजह है। वजह वो लक्ष्मण रेखा है, जिसे लांघी गयी है। वजह वो अफसरशाही है, वो नेतागीरी है, जिसने आपको ऐसी जुर्रत करने की हिम्मत दी।
खुद के दामन पर दाग लगा तो हंगामा मचा दिया। ईमानदारी का कम्बल ओढ़ने लगे। कुछ साल पीछे जाइए। एक और अफसर का ऐसा ही वीडियो और ऑडियो लीक हुआ था। चटकारे लेकर एक लॉबी ने मौज ली थी। अब खुद पर कहर बरपा तो सबको भ्रष्ट बताने लगे। बड़े ब्रांड के जिस पत्रकार ने मेरठ में उस कथित वीडियो को आईजी को भेजा, उसे ही बदमाशों की तरह गिरफ्तार कराने टीम भेज दी। भई क्या चाहते हैं, हम खिलाफ में कुछ न लिखे, कुछ न बोले। कलम आपके जूते तले दबा दे। आभार जताइए मेरठ के उस पत्रकार का, जिसने समय रहते वीडियो आईजी को भेज दिया, वरना अब तक वायरल होने के हालात और खराब होते।
एक आईपीएस की सैलरी रेलवे के ड्राइवर (TA+DA मिलाकर) से भी कम होती है। कोई ऐसा ड्राइवर है क्या, जिसका बच्चा 20-30 हजार रुपये महीने की फीस वाले स्कूल में पढ़ता हो। 90-95 हज़ार तो अदनी सी कंपनी का एग्जिक्यूटिव सैलरी पाता है। उसकी भी लाइफस्टाइल कभी देख लीजिए। EMI और बच्चों की फीस में ही बलटुट हो जाता है। पूरी जिंदगी खच्चर बनकर काम करता है, फिर 2 कमरों का एक मकान खरीद पाता है।
अब इसी चश्मे से आईपीएस नहीं, किसी थानेदार को देखिए। ईमानदारी के तरानों का भ्रम टूट जाएगा। किसी आईपीएस के ऑफिस और कैम्प ऑफिस में खिदमत पर होने वाले खर्च को देख लीजिए, ईमानदारी की सूरत दिख जाएगी। इतनी दूर भी न जाइए। घर के बाहर निकलिए, पूछिए पानवाले से खोखा लगाने के एवज में पुलिसवाला महीने के कितने ले जाता है, अंदाजा लगा लेंगे। एक भी थानेदार बता दीजिए, जिसे उसकी योग्यता पर थानेदारी मिली हो। उस थाने पर कारखास न हो, वसूली न होती हो। हर फरियादी की कानून के अनुसार फौरन FIR दर्ज होती हो।
देखिए साहब, सवाल तो उठेंगे ही। जिम्मेदार पद पर हैं। लोकतंत्र है, जवाब तो देना पड़ेगा। जवाब तो उस पुलिसिंग सिस्टम को भी देना होगा, जिसके कप्तान का आपत्तिजनक वीडियो उसी की नाक के नीचे वायरल हो गया और पूरा अमला हाथ मलता रहा। जब जिले का टॉप पुलिस अफसर अपना आपत्तिजनक कथित वीडियो वायरल होने से नहीं रोक सका तो आम लोगों की ऐसे केस में क्या मदद करेगा?
ईमानदारी के चोले पर सवाल ये भी उठेंगे...
1. सीनियर अधिकारी की जांच कोई जूनियर कैसे कर सकता है? जांच का यह फैसला ही विवेचना एथिक्स के खिलाफ है।
2. ईमानदारी पर संदेह नहीं, फिर सीबीआई जांच से परहेज क्यों?
3. वीडियो की जांच किसी दूसरे राज्य में क्यों नहीं कराई जा रही?
4. किसके पीठ थापथपाने एक आईपीएस की इतनी जुर्रत हुई कि सर्विस मैनुअल को साइडलाइन कर वरिष्ठ अफसरों के खिलाफ भेजी गयी रिपोर्ट वायरल करवा दी?
5. अगर गलत हुआ था तो अपने अफसरों पर यकीन करने से ज्यादा सीएम ऑफिस पर क्यों भरोसा जताया?
6. एनकाउन्टर में गोली मारकर पकड़े गए बदमाशों को 15 दिन के अंदर जमानत किसकी मदद से मिली, इसकी जांच क्यों नहीं हुई?

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