कहानी 'जेएनयू' की...

पोस्ट पढ़ें, उससे पहले ही माफी मांग ले रहा 🙏। उपधिया जी के लौंडों की कहानी लिखने की भारी डिमांड मिल रही थी, इसलिए यह पाप करना पड़ा...
इंद्रप्रस्थ के एक गांव में रहते थे जवाहर नंद उपाध्याय। गांव वाले उन्हें प्यार से जेएनयू बुलाते थे। जेएनयू चचा के 2 लौंडे थे। एक था लेफ्ट, दूजा था राइट।
लेफ्ट जेएनयू चचा का दुलारा था। लेकिन था बहुत चिबिल्ला। पूरा गांव उससे दुखी था। जो राइट था, वो बड़ा सीधा था बेचारा। गलती लेफ्ट करता और चाय वाली अदरक राइट बनता।
एक दिन चचा कहीं चले गए। बच्चों की देखरेख का जिम्मा पड़ोसी पर था। दुलरुआ लेफ्ट ने अपनी हरकतें वैसी ही रखीं। कभी इन्हें ज्ञान देना, कभी उन्हें ज्ञान देना, कभी देवी जी की अश्लील फोटो बनाना तो कभी गांव के महापुरुषों की प्रतिमाओं का अपमान करना नित्य कर्म था। मनबढ़
थे ही, बेचारा भाई समझाता तो उसे भी हौंक देते।
दोनों की देखरेख का जो जिम्मा सम्भाल रहे थे, एक दिन लफंडरयी पर उन्होंने तबीयत से लेफ्ट को सूता। पहली बार की सुताई थी, इसलिए पूरे गांव में हवा थोड़ी टाइट हो गयी। लेकिन, लेफ्ट पुराने चिबिल्ला थे। एक बार की कुटाई से जन्मजात बीमारी गयी नहीं।
2-4 दिन बीते थे कि फिर गांव में किसी से लपट लिए। चूंकि अन्नप्रासन हो चुका था तो गांववाले भी भोजन कराने आ गए। उस रात भरपेट खिलाया। भाई राइट से मदद मांगी तो उसने 50-51 साल के शोषण की पिक्चर दिखा दी।
कहीं से मदद न मिली तो लेफ्ट ब्रो सुथनी जैसा मुंह लेकर विक्टिम कार्ड खेलने लगे। गांव में एक-एक जन से रोते, बाप नहीं है तो जीने नहीं दे रहे। गांव से भगाना चाहते हैं। नक्सली बोल रहे। गरीबी की गाली दे रहे। 2-4 लोग समर्थन में आये भी। लेकिन, गांव के अधिकांश लोग जेएनयू के दुलरुआ बेटवा का धोबी के कुकुर जैसा हाल देखकर बड़े खुश हुए।
(नोट: ओक्ष-परोक्ष रूप से हाल-फिलहाल में हुई किसी भी घटना से इस पोस्ट की कोई समानता या उससे जरा भी मेल-मिलाप महज संयोग होगा)

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