अभी #लोकतंत्र पर बड़ी बहस चल रही हैं। कुछ लोग बता रहे हैं कि लोकतंत्र खतरे में है। ब्रिटेन के प्रकाशन समूह द इकोनॉमिस्ट ग्रुप ने द इंटेलिजेंस यूनिट की मदद से इस बार भी #डेमोक्रेसी इंडेक्स जारी किया है। 165 देशों में अपना देश 51वें नम्बर पर है। 10 पायदान नीचे लुढ़क गया है। इतना नीचे क्या हम पहली बार आए हैं? बस यही सवाल पूछने पर भक्त का सरनेम मिल जाएगा।
लोकतंत्र की हत्या के जिम्मेदार मोदी हैं। मोदी की हिटलरशाही है। विपक्ष की जुबान काटने की प्रवृत्ति है। सीबीआई-ईडी का डर है। विपक्ष के ये आरोप चर्चा के लिए सही हैं। अब बात शुरू हुई है तो चर्चा दोनों पहलुओं पर होगी।
देश का इतिहास गवाह है, किस तरह लोकतंत्र को सरे बाजार नचाया गया था। तब हाथों में बेला की माला पहने पूज्यनीय भी वाह-वाह किए थे। विरोध करने वाले जेल में थे। आज इतना तो हक़ है कि आपकी जुबान बेरोकटोक चल रही है। बेखौफ होकर आज़ादी मांग रहे हैं। हज़ारों लोगों की लाइफलाइन #कालिंदी कुंज मार्ग 49 दिनों से बन्द कर रखें हैं।
गांधी जी ने क्यों घोंटा था लोकतंत्र का गला?
साल 1939 की बात है। कांग्रेस में 2 शीर्ष नेताओं के बीच अध्यक्ष पद के लिए घमासान चल रहा था। वर्षों बाद यह शुभ घड़ी आई थी कि सर्वसम्मति नहीं, चुनाव से पार्टी अध्यक्ष चुने जाएंगे। नेताजी #सुभाषचंद्र बोस से 'राष्ट्रपिता' महात्मा गांधी खुश नहीं थे। उन्होंने पट्टाभी सितारमैय्या को उनके सामने खड़ा कर दिया। अब आगे ध्यान से पढ़ना, क्योंकि लोकतंत्र का असली मुजरा यहीं से शुरू होगा।
सितारमैय्या को 1377 वोट मिले और नेताजी को 1580। गांधी जी ने सभा को सम्बोधित किया, बोले यह सितारमैय्या की नहीं, मेरी हार है। जो बोस के काम से संतुष्ट नहीं हैं, कांग्रेस छोड़ सकते हैं। सुझाव के लहजे में ये गांधी जी का आदेश था। लोकतंत्र की कसम हम आज उन्हीं गांधी जी के नाम पर खाते हैं। लेकिन, तब एक पार्टी के अध्यक्ष पद के चुनाव में वे खुद लोकतंत्र भूल गए थे।
गांधी जी की बस इतनी बात पर कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। कुछ दिन खींचतान चली फिर नेताजी ने बड़प्पन दिखाते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद को त्यागकर अपना फॉरवर्ड ब्लॉक बना लिया।
किसने मानी संधि कि नेताजी मित्र देशों के दुश्मन थे?
आज़ादी मिली फिर सुभाषचंद्र बोस को मित्र राष्ट्रों का दुश्मन बताने वाले कागज पर भी हस्ताक्षर हुए। हस्ताक्षर करने वाले अपने चाचा नेहरू ही थे। विरोध की किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई, क्योंकि उस वक्त लोकतंत्र मजबूत था। एक भी हिंदुस्तानी बता सकते हैं, जो नेताजी के बलिदान पर संदेह करता हो। आज़ादी की लड़ाई नेताजी, भगत सिंह, सुखदेव, मंगल पांडेय सबने लड़ी, लेकिन भुनाने वाला बस एक सरनेम पूरे देश में बचा है। आज लोकतंत्र का नारा बुलंद करने वाले जवाब दे सकते हैं कि संसद के केंद्रीय कक्ष में 23 जनवरी 1978 से पहले नेताजी का चित्र क्यों नहीं लगाया गया था?
इंदिरा गांधी के वक्त कहां था लोकतंत्र?
25 जून 1975 की तारीख में तो इतनी कालिख है कि लोकतंत्र का रोना रोने वालों के चेहरे अब तक साफ न हो सके हैं। उस वक्त ईवीएम नहीं थी, जो हैक होती। बैलट पेपर था। रायबरेली से सांसद बनीं इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरियों का इस्तेमाल कर चुनाव जीता था। ये हम नहीं हाई कोर्ट ने 13 जून 1975 के अपने आदेश में कहा था। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने 6 साल तक इंदिरा के चुनाव लड़ने पर रोक भी लगाई थी। अब इंदिरा गांधी के पास राज्यसभा में जाने का रास्ता भी नहीं बचा था। बस इसी खुन्नस में 25 जून 1975 की आधी रात से आपातकाल लगा दिया। विपक्ष जेल में ठूंस दिया गया। विरोधी आवाज कुचल दी गई। अखबारों के दफ्तर में प्रशासन का पहरा बैठ गया। तब लोकतंत्र जिंदा था क्या?
कोर्ट के आदेश को दरकिनार करने वालीं, चुनाव में गड़बड़ी की एक अपराधी की जीवनी हमारे सिलेबस का हिस्सा रही। हम इसे पढ़ते रहे। एक अपराधी का गुणगान करते रहे। कार्यालयों में उनके चित्र टांगे रहे। क्या यही लोकतंत्र होता है?

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