आप आगे पढ़ें, इससे पहले साफ कर देना चाहता हूं कि #जामिया की घटना का मैं बगैर किंतु-परन्तु के विरोध करता हूं। हिंसा किसी भी सूरत में समस्या का हल नहीं है। दोषी को ऐसी सजा मिले जो नज़ीर बन सके।
नागरिकता संशोधन कानून (#CAA) के विरोध में गुरुवार को जामिया से राजघाट तक कुछ लोग मार्च निकाल रहे थे। तभी 12वीं का एक छात्र इस मार्च में घुसता है। नारे लगाता है, जय श्रीराम, भारत माता की जय, दिल्ली पुलिस जिंदाबाद। यहां तक सब ठीक था। गड़बड़ी इसके आगे शुरू हुई।
17 साल 9 महीने का किशोर कट्टा निकाल कर मार्च में शामिल लोगों पर तान देता है। भीड़ हूटिंग करती है। लड़के के पीछे दिल्ली पुलिस और आगे मार्च में शामिल जामिया-जेएनयू के छात्र और मीडियाकर्मी थे। महज 30 सेकंड तक यह सीन चलता है। लड़के ने गोली चलाई और जामिया के छात्र शादाब के हाथ में बुलेट लगी। इसके बाद लड़के को दिल्ली पुलिस ने दबोच लिया। अब बस 3 बातें अपने दिमाग में रखिए... कट्टा, लड़के के पीछे दिल्ली पुलिस और आगे हूटिंग करती भीड़।
दिल्ली पुलिस ने समय रहते एक्शन क्यों नहीं लिया?
पुलिस को ऐसे मौकों पर एक स्टैंडर्ड फॉलो करना पड़ता है। 'रैपिड डिप्लॉयमेंट' जो हर पुलिस अफसर को इन हालातों से निपटने के लिए पढ़ाया जाता है। किसी भीड़, यूनिवर्सिटी, कॉलेज या मार्च में कोई एक्टिव शूटर घुस जाता है तो एक योजना के तहत ही उसे पकड़ा जाता है (लिंक देखें ज्यादा समझने के लिए shorturl.at/bnQT6)। दिल्ली पुलिस काफी हद तक वही कर रही थी। हूटिंग कर रही भीड़ को पीछे होने को कहा जा रहा था। कट्टा लहरा रहे किशोर का ध्यान बांटने की कोशिश हो रही थी।
लड़के पर अटैक क्यों न किया?
एक बार फिर याद कर लीजिए कट्टा लहरा रहा लड़का नाबालिग है। Human Rights Standards and Practice for the Police नाम की यूनाइटेड नेशन्स की बुक है, जो हर पुलिस अफसर ट्रेनिंग के दौरान कंठस्थ करता है। पेज नम्बर 23 से 42 तक ऐसे हालात से कैसे निपटना है, इसका वर्णन है। (किताब का लिंक shorturl.at/ixKNX)। दिल्ली पुलिस एक प्रोफेशनल फोर्स है, जिसने इस मौके पर संयमित होकर कानून के अनुसार इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के अनुरूप कार्य किया। नाबालिग कट्टे के दम पर इतना खतरनाक नहीं हो सकता था, जिसकी वजह से उस पर जानलेवा अटैक करने की जरूरत होती।
कट्टा जानलेवा क्यों नहीं हो सकता?
लड़के के हाथ में दिख रहा हथियार 315 बोर का कंट्री मेड वेपन है। हिंदी में बात करूं तो 315 बोर का कट्टा। इसकी मारक दूरी 12 से 18 मीटर के बीच होती है। लड़का कट्टा लहरा रहा है। पीछे से पुलिस भीड़ को सेफ्टी टिप्स दे रही है। सामने पढ़े-लिखे छात्रों का समूह खड़ा है। फिर भी वे पीछे क्यों न हट रहे थे। जितने वीडियो सामने आए हैं, सबमें लड़का छात्रों की तरफ़ नहीं, पुलिस की ओर जाता दिख रहा है। अगर हूटिंग कर रही भीड़ थोड़ा संयम दिखाती तो शायद अपने शादाब भाई अस्पताल में न होते।
'मानसिक तौर पर बीमार है लड़का'
लड़के के घरवालों का दावा है कि वह मानसिक तौर पर बीमार है। करीब 15 दिनों से अजीब सी हरकत कर रहा था। गरीब परिवार से ताल्लुक रखता है। गुरुवार को एक डॉक्टर से बच्चे के पिता ने दिखाने को लेकर बात भी की थी। सवाल ये भी है कि 15 दिन से फिर डॉक्टर को दिखाया क्यों नहीं? अरे भई ऐसे घरों में तो पहली बार तो इन बीमारियों को सीरियसली लेते नहीं। अब ले भी लिया किसी ने तो इसका खर्चीला इलाज उन्हें पीछे होने को मजबूर करने लगता है। अब एक बार बस इतना सोचकर देखिए क्या एक स्वस्थ व्यक्ति भीड़ के बीच ऐसी हिमाकत करेगा?
गुनहगार तो हमारा सिस्टम है
फेसबुक-ट्विटर पर अभी एक ट्रैफिक नियम तोड़ने की फ़ोटो-वीडियो डालिए, 1 मिनट में कार्रवाई करने का यूपी पुलिस रिप्लाई कर देगी। एक लड़का सुबह 8 बजे से फेसबुक पर आपराधिक पोस्ट कर रहा था, कई बार लाइव आकर अपना प्लान बताता रहा, लेकिन सोशल मीडिया पर चौकन्नी पुलिस सोती रही। संवेदना खो चुके लोग उसके पोस्ट लाइक करते रहे। कमेंट्स की बाढ़ लाकर उसमें हवा भरते रहे। लेकिन, किसी ने पुलिस को बताने की जिम्मेदारी नहीं समझी।
राम-रहमान में लड़ते रहिए, न गांधी रहे न गोडसे
कुछ पत्रकारों ने पूरे घटनाक्रम को गांधी बनाम गोडसे का रंग दे दिया। एक महाशय ने तो बिहार की लोक कलाकार के गीत प्राइम टाइम पर चला दिए। कई तरह के फोटो फ्रेम लगाकर। क्या यही पत्रकारिता है? एक गलती को दूसरी गलती से जोड़ने की यह प्रवृत्ति ही राम-रहमान के बीच की गहरी खाई है। अगर यही लड़का मुस्लिम होता तो सोचिए कैसे खबर परोसी जाती? क्या तब भी गांधी-गोडसे का राग अलापते? खैर अच्छा है ये लड़का हिन्दू है, वरना भगवा ब्रिगेड गोलियां चलवाने का सरेआम फिर हुक्म देने लगता।
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