सुबह और शाम कुछ घंटों तक पेड़ की ओट में छुप जाता। बाकी पूरी रातऔर दिन चलता रहता। रास्ते में लोग खाना बांटते थे। वहीं से पैकेट ले लेता। 28 दिन में 4 दिन नहाने को मिला। दिल्ली से करीब 700 किमी दूर प्रयागराज और मिर्जापुर की सीमा में लगते मेरे गांव पहुंचे एक मजदूर की यह कहानी है। कई जिलों की पुलिस से छुपते हुए शनिवार शाम वह घर पहुंचा था। करेजे के टुकड़े को देखे हुए मां को करीब एक बरस हो चुके थे। निहारने का वक्त बमुश्किल 15 मिनट का मिला, तभी ग्राम प्रधान पुलिस और डॉक्टर के साथ पहुंच गए। 22-23 साल के उस लड़के को गांव के बाहर बने क्वारंटीन सेंटर में बंद कर दिया। इसी तरह इंदौर में कंक्रीट मिक्सर के ट्रक में जान जोखिम में डालकर सफर करते 18 मजदूर पकड़े गए। सामने आया वीडियो मजबूरी और डर की कहानी बयां करने के लिए काफी है। आपके जेहन में लॉकडाउन 1.0 में दिल्ली, मुंबई में उमड़ी भीड़ की तस्वीर अब भी होगी। 2-3 महीने की बेटी को सीने से लगाकर भागती मां, विकलांग पत्नी को कंधे पर उठाकर निकले पति की वेदना भी याद होगी।
अब सोचिए, इतनी पीड़ा और जलालत झेलकर कोई अपने घर पहुंचा है तो क्या हाल-फिलहाल में लॉकडाउन खत्म होने पर लौटेगा? यूपी, एमपी, उत्तराखंड, बिहार लौट चुका मजदूर अब आसानी से दिल्ली, मुंबई का रुख नहीं करने वाला। उसके जेहन में कोरोना महामारी का दर्द नहीं, अव्यवस्था की टीस है। केवल दिल्ली को छोड़कर 1.25 लाख श्रमिक जाने वाले हैं। महाराष्ट्र से 1.5 लाख, हरियाणा-गुजरात से 71-71 लाख, तमिलनाडू से 40 हजार, पंजाब से 50 हजार मजदूर निकलने की तैयारी में हैं। यह आंकड़ा श्रम विभाग का है। लॉकडाउन 3.0 में घर जाने की तैयारी में इतने मजदूर बैठे हैं। इससे कहीं ज्यादा ऐसे भी हैं जो श्रम विभाग तक नहीं पहुंच सके हैं, लेकिन वे भी घर निकलेंगे। कई गुना ज्यादा संख्या उनकी भी है जो सैकड़ों किमी की दूरी पैरोंं से नापकर अपने गांव पहुंच चुके हैं।
केंद्र सरकार के साथ ही राज्य सरकारों ने भी श्रमिकों की मदद की घोषणा की है। पीएम मोदी ने हर जनधन खाते में 500 रुपये डालने की घोषणा की। उज्जवला योजना के तहत 3 महीने तक मुफ्त गैस सिलिंडर का भी पैसा दिया गया। राशन कार्ड धारकों को मुफ्त राशन भी दिया जा रहा। यूपी, एमपी समेत कई राज्य सरकारों ने भी 1000 रुपये श्रमिकों को देने की घोषणा की। विपक्ष ने सवाल उठाया कि 500 रुपये देकर गरीबों का मजाक उड़ाया गया। कई नेताओं ने यहां तक कहा कि 500 रुपये के आज के वक्त में मायने क्या है, मिलता क्या है इतने में? ऐसे सवाल उठाने वालों के लिए एक खबर जवाब बनकर आज सामने आई।
टूंडडा के पचोखरा थाना एरिया में एक गांव है हिम्मतपुर। हिम्मतपुर की 72 साल की राधा लॉकडाउन से पहले आगरा के रामबाग में मजदूरी करती थीं। पचोखरा से रामबाग की दूरी करीब 50 किमी है। राधा को शुक्रवार को पता चला कि मोदी ने 500 रुपये सभी के खाते में डाले हैं। बस यही रुपये निकालने वे घर से पैदल ही निकल पड़ीं। शनिवार सुबह 50 किमी पैदल चलकर रामबाग के बैंक में पहुंची तो पता चला उनके खाते में अभी रुपये नहीं आए हैं। मायूस राधा फिर 50 किमी पैदल चलकर अपने घर लौट आईं। 500 रुपये को कमतरआंकने वाले राधा जैसों के बारे में कभी सोचने की भी हिम्मत नहीं जुटा सकेंगे।
हर फैक्ट्री में करीब 15 दिन का न्यूनतम कच्चे माल का स्टॉक होता है। प्रॉडक्शन के बाद लगभग इतना ही माल रिजर्व में तैयार रखा जाता है। कई फैक्ट्रियों में बफर स्टॉक 45 से 60 दिनों तक का होता है। अचानक हुए लॉकडाउन से फैक्ट्रियों का कच्चा माल लगभग खराब हो चुका है। मशीनें लगातार इतने दिनों से बंद होने की वजह से खराब होने की कगार पर होंगी। आय का सबसे बड़ा हिस्सा लगभग 40 पर्सेंट तक मजदूरी पर खर्च होता है। यह खर्च प्रशासन की सख्ती की वजह से लगातार दूसरे महीने भी बना हुआ है। दोहरी मार बिजली और बाकी चार्जेस देने की पड़ रही है। अब अगर हाल-फिलहाल में लॉकडाउन खुलता है तो मजदूर कहां से मिलेंगे?
कैसे संभाल सकते हैं यह आपदा
1. एक्सपर्ट के अनुसार आर्थिक आपदा संभालने का सबसे अहम कार्य मजदूरों के स्तर पर होना चाहिए। उनमें जो अविश्वास पनपा है उसे दूर करना होगा। किसी को जबरदस्ती नहीं रोका जा सकता, लेकिन उन्हें मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाना पड़ेगा। सरकारों को सोचना होगा कि पलायन समस्या का हल नहीं है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पलायन रोकना होगा। बसों और ट्रेनों से मजदूरों को उनके घर भेजने के वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठना होगा। जहां हैं, वहीं पर उनके रहने और खाने की व्यवस्था करनी होगी।
2. लॉकडाउन 3.0 में ट्रांसपोर्टेशन की ढील देनी होगी। नियमों की सख्ती समाप्त करनी होगी। ट्रकों के पहिए दौड़ेंगे तभी मशीनों की आवाज आएगी।
3. न्यूनतम स्टाफ के साथ काम करने वाली कंपनियों, फैक्ट्रियों, दुकानों को खोलना होगा। शटर उठेंगे तभी विश्वास बढ़ेगा और पलायन का मन बना चुके श्रमिक रुकने की सोचेंगे।
4. बिजली बिल, टैक्स, ईएमआई और दूसरे टैक्स से व्यापारियों, उद्यमियों को राहत देनी होगी। अगर उद्यमियों और व्यापारियों को राहत नहीं मिली तो इसका असर श्रमिकों पर पड़ेगा। उद्यमी दिवालिया हुए तो नौकरियां जाने का दौर शुरू होगा, जिसे संभाल पाना मुश्किल होगा।
5. राहत पैकेज के साथ ही सरकारों को फ्यूल, रोड टैक्स, टोल टैक्स और बाकी अन्य सभी टैक्स की भी रियायत देनी होगी। यह राहत कम से कम एक साल की मिले, तभी बेपटरी हुई अर्थव्यवस्था की चमक लौटने की उम्मीद की जा सकती है।
6. रेवेन्यू बराबर करने के लिए शराब, सिगरेट, गुटखा, पानमसाला, तंबाकू, सैलून, कपड़े, कॉस्मेटिक्स, महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट पर टैक्स की दरें बढ़ा सकते हैं।
6. रेवेन्यू बराबर करने के लिए शराब, सिगरेट, गुटखा, पानमसाला, तंबाकू, सैलून, कपड़े, कॉस्मेटिक्स, महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट पर टैक्स की दरें बढ़ा सकते हैं।


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