विवादों में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के लेखक तारेक फतेह 1987 से कनाडा के टोरंटो के पास एजेक्स शहर में रहते हैं। सोशल मीडिया से लेकर न्यूज रूम तक सनसनी बने रहते हैं। उनका पसंदीदा वाक्य है- 'मुसलमान अपनी आत्मा का इस्लामीकरण करे, अपने देश का नहीं। वे अपने अहं पर हिजाब रखें, अपने सिर पर नहीं।'
तारेक की मशहूर किताब है The Tragic Illusion of an Islamic State. इसका पार्ट 3 शरिया है। मुख्य रूप से इसके 4 हिस्से हैं। शरिया, जिहाद, हिजाब और पश्चिम में इस्लामिक एजेंडा।
तारेक ने अपनी बात की पुष्टि के लिए किताब में ये उदाहरण भी दिए हैं...
1. शरिया में व्यभिचार करने वालों को पत्थर से मार-मार कर हत्या का विधान है। कुरान के अध्याय 24 की आयत 2, 3 और अध्याय 4 की आयत 15, 16 व 25 का यह उल्लंघन है। कुरान में व्यभिचारियों के लिए मौत की व्यवस्था नहीं, पश्चाताप को स्वीकार किया गया है।
2. शरिया में बलात्कार साबित करने के लिए पीड़ित महिला पर जिम्मेदारी दी गई है कि वह 4 चश्मदीद वयस्क पुरुष की गवाही अपने आरोप को सच साबित करने के लिए लाए। कुरान के अध्याय 24 के आयत 4 और 11-20 का यह उल्लंघन है। कुरान में यह जिम्मेदारी आरोपी पर है कि वह खुद को निर्दोष साबित करने के लिए 4 वयस्क चश्मदीद गवाह लाए।
3. शरिया में मनमर्जी बहुविवाह की अनुमति की बात कुरान के अध्याय 4 की आयत 3,4 और 127 के खिलाफ है। यह केवल कमजोर व अनाथों के मामले में स्वीकार्य कहा गया है।
4. इस्लाम छोड़ने वालों की हत्या की बात शरिया कानून में कही गई है। यह कुरान के अध्याय 4 की आयत 94, अध्याय 2 की आयत 256, अध्याय 3 की आयत 88-89 और पारा 16 की आयत 106 का उल्लंघन है। पैगंबर के जीवनकाल में 3 लोगों ने इस्लाम छोड़ा था, लेकिन किसी को मौत की सजा नहीं मिली।
5. शरिया कानून में तत्काल 3 तलाक की व्यवस्था पति के लिए है। कुरान के अध्याय 2 की आयत 228 व 229 के अलावा पारा 65 की आयत 1 व 2 का यह उल्लंघन है।
इसी हिस्से में शरिया बैंकिंग और इस्लामिक बैंकिंग के बारे में भी बताया गया है। एक किताब का रिफ्रेंस देते हुए दवा किया गया है कि इस्लामिक बैंकों की स्थापना का मूल उद्देश्य जिहाद के लिए धन जुटाना था। ब्याज को हराम बताने वाले इन बैंकों पर दूसरे माध्यमों से लोगों के धन लूटने के आरोपों का जिक्र है। यूरोप और अमेरिका में शरिया कानून लागू कराने की लामबंदी और विरोध-प्रदर्शन पर भी चर्चा हुई है।
एक इस्लामिक किताब का जिक्र किया गया है कि 'हो सकता है कि जो चीज आपके (मुसलमान) के लिए अच्छी हो, उसे आप नापंसद करें और जो आपके लिए बुरी हो उसे आप पसंद करें, लेकिन जिहाद आपके लिए एक फरमान है, भले ही आप इसे पसंद न करें।' जिहाद और छापामार लड़ाकों को खड़ा करने और उकसाने वाले कुछ नेताओं की बात भी इस हिस्से में दी गई है। पश्चिमी देशों में मुस्लिमों को नेता के तौर पर पहचान रखने वाले कुछ लोगों के विवादित बयानों को भी जिहाद से जोड़कर लिखा गया है।
पाकिस्तान में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में 2007 में हुई सैन्य कार्रवाई का एक जगह जिक्र किया गया है। लड़ाई खत्म होने के बाद 15 जुलाई को द संडे टाइम्स ने एक 15 साल की लड़की का इंटरव्यू छापा था। आसमा हयात ने उस सैन्य कार्रवाई को देखा था। हयात ने बताया था कि वह मस्जिद के मुख्य द्वार पर आंसू गैस के गोले से प्रभावित बच्चों को पानी पिला रही थी। तभी उसकी 17 साल की दोस्त नसमीन को गोली लगी। नसमीन की मदद के लिए वह गई तो उसने धकेल दिया। नसमीन ने कहा, 'अच्छा लग रहा है। यह शहादत है।' तारेक फतेह ने लिखा है कि यह मौत उस संप्रदाय का नतीज है, जिसे कोई चुनौती नहीं दे रहा है और जिसकी बातों को निजी इस्लामी स्कूलों में मुस्लिम बच्चों के दिमाग में भरा जा रहा है। मौत से पहले नसमीन के इस बर्ताव का कोई उदाहरण कुरान या पैगंबर की कही बातों में नहीं है।
पूरी किताब में इस हिस्से की शुरुआत मुझे सबसे बेहतरीन लगी। खालेद होसैनी के उपन्यास A Thousand Splendid Suns के एक घटनाक्रम से हुई है। नाना नाम की गरीब अविवाहित मां 5 साल की अपनी बेटी मरियम से कहती है, 'मेरी बेटी, यह बात जान लो और अच्छी तरह गांठ बांध लो: जिस तरह कंपास की सूई उत्तर दिशा बताती है, उसी तरह मर्द की आरोप में लगने वाली अंगुली हमेशा औरत की ओर उठती है।' हुसैनी के इस उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है। अफगानिस्तान में जनजीवन के बारे में यह उपन्यास है।
हिजाब को लेकर एक जगह तारेक फतेह सवाल उठते हैं। 'किसी महिला के बाल उसके शरीर के सबसे बेजान हिस्सा होते हैं। आखिर महिला के बाल में ऐसा क्या है जो मुसलमान मर्दों में इतना आवेग पैदा हो जाता है?'
2007 में क्यूबेक में ताइक्वांडो में 12 साल की लड़कियां हिस्सा लेने गई थीं। मुसलमान लड़कियों को इसमें हिस्सा नहीं लेने दिया गया था। प्रतियोगिता में नियम के अनुसार, केवल हेलमेट पहनने की छूट थी। हेलमेट से लड़कियों के बाल हिजाब के मुकाबले ज्यादा ढक रहे थे। प्रतियोगिता के आयोजकों ने कहा, चूंकी पैरों से ताइक्वांडो में प्रहार होता है। ऐसे में हिजाब का हिस्सा ढीला होकर अलग हो सकता है और खिलाड़ी चोटिल हो सकते हैं। लड़कियों के अभिभावक बगैर हिजाब नहीं खेलने पर अड़े रहे और प्रतियोगिता में बच्चों को हिस्सा नहीं लेने दिया गया। बच्चियों की यह टीम मॉन्ट्रियल मुस्लिम कम्युनिटी सेंटर की मस्जिद की तरफ से बनी थी। मस्जिद की वेबसाइट पर हिजाब न पहनने के नुकसान गिनाए गए थे। तलाक, व्यभिचार, बलात्कार, नजायज बच्चे, तनाव, असुरक्षा, पतियों के मन में शक, पारिवारिक सद्भाव में खलल, युवाओं को वासना व अनैतिकता की ओर जाने के लिए उकसाना। बच्चियों को ये नुकसान गिनाने के साथ ही कहा गया था कि अगर हिजाब उतारा तो मुस्लिम नहीं रह जाएंगी।
हिजाब को लेकर इस्लामिक विद्वान की एक कहानी का भी किताब में जिक्र है। एक मासूम युवक ने आकर्षक महिला का चित्र देखा और उसके शारीरिक आकर्षण में बंध गया। युवक के पास धन-दौलत या ओहदा नहीं था कि उस औरत तक पहुंच पाता। उसने बड़ा आदमी बनने के लिए लूटपाट, कत्ल, चोरी शुरू कर दी। आखिरकार एक दिन पकड़ा गया और उसे जेल हो गई। अब इसमें किसे कसूरवार ठहराया जाए? अगर उस औरत न हिजाब पहना होता और अपना हुस्न दिखाने से परहेज करता तो वह मासूम युवक इतने अपराध नहीं करता।
किताब के इस हिस्से के अंत में हिजाब का अर्थ भी बताया गया है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि देशों में नमाज के वक्त या बड़े-बूढ़ों के सामने पड़ने पर दुपट्टा या साड़ी से पल्लू डालने का रिवाज था। सोमालिया व अफ्रीका में हिजाब का वजूद नहीं था। इस्लामवादी भी मानते हैं कि नकाब या हिजाब का चलन इस्लाम के शुरुआत में नहीं था।
एक प्रफेसर की रिसर्च का जिक्र है कि इस्लाम के आने से पहले के दौर में अरब महिलाएं मर्दों को युद्ध के लिए विदा करते वक्त अपनी छाती से वस्त्र हटा देती थीं, ताकि लड़ाई के लिए वे उत्साहित हो सकें। इस्लाम आने के बाद पैगंबर को कुरान की इस बात का इलहाम हुआ, जिसमें महिलाओं से कहा गया कि वे अपनी छातियां कपड़े से ढके। इस कपड़े को कुरान में खिमर कहा गया, जिसे अरब में महिलाएं सिर ढकने के लिए पहनती थीं। कनाडा की नारीवादी फरजाना हसन की बात का भी जिक्र है। फरजाना ने कहा है कि कुरान में हिजाब के बारे में आदेश मुख्य तौर पर शालीनता के लिहाज से है, लेकिन यह सोच से ज्यादा जु़ड़ गया।
किताब का पटाक्षेप अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे चुके हुसैन हक्कानी ने किया है।
तारेक की मशहूर किताब है The Tragic Illusion of an Islamic State. इसका पार्ट 3 शरिया है। मुख्य रूप से इसके 4 हिस्से हैं। शरिया, जिहाद, हिजाब और पश्चिम में इस्लामिक एजेंडा।
पहला हिस्साः शरिया
इसमें तारेक फतेह ने इस्लामिक कानून को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। कई जगह विवादित कोट भी दिए हैं, जैसे- 'अगर पति के पूरे बदन पर खून और मवाद हो और उसकी बीवी उन्हें चाटे व पी जाए तो भी अपने पति के प्रति उसके दायित्व पूरे नहीं होते।' शरिया को लेकर कई देशों में महिलाओं के समूह के विरोध को भी बखूबी रखा है। कुरान शरीफ में कुल 3 जगह शरिया शब्द के जिक्र की बात लिखी है। किताब में 5 तरह के शरिया का जिक्र कर उसकी सत्यता पर सवाल उठाया गया है। पैगंबर के जीवन से लिए गए उदाहरणों को दर्ज करने वाली हदीसों में हजरत मुहम्मद ने कहीं भी इस्लामी राज्य की संरचना, शासन और उत्तराधिकार के नियम के बारे में कोई बात नहीं कही है।तारेक ने अपनी बात की पुष्टि के लिए किताब में ये उदाहरण भी दिए हैं...
1. शरिया में व्यभिचार करने वालों को पत्थर से मार-मार कर हत्या का विधान है। कुरान के अध्याय 24 की आयत 2, 3 और अध्याय 4 की आयत 15, 16 व 25 का यह उल्लंघन है। कुरान में व्यभिचारियों के लिए मौत की व्यवस्था नहीं, पश्चाताप को स्वीकार किया गया है।2. शरिया में बलात्कार साबित करने के लिए पीड़ित महिला पर जिम्मेदारी दी गई है कि वह 4 चश्मदीद वयस्क पुरुष की गवाही अपने आरोप को सच साबित करने के लिए लाए। कुरान के अध्याय 24 के आयत 4 और 11-20 का यह उल्लंघन है। कुरान में यह जिम्मेदारी आरोपी पर है कि वह खुद को निर्दोष साबित करने के लिए 4 वयस्क चश्मदीद गवाह लाए।
3. शरिया में मनमर्जी बहुविवाह की अनुमति की बात कुरान के अध्याय 4 की आयत 3,4 और 127 के खिलाफ है। यह केवल कमजोर व अनाथों के मामले में स्वीकार्य कहा गया है।
4. इस्लाम छोड़ने वालों की हत्या की बात शरिया कानून में कही गई है। यह कुरान के अध्याय 4 की आयत 94, अध्याय 2 की आयत 256, अध्याय 3 की आयत 88-89 और पारा 16 की आयत 106 का उल्लंघन है। पैगंबर के जीवनकाल में 3 लोगों ने इस्लाम छोड़ा था, लेकिन किसी को मौत की सजा नहीं मिली।
5. शरिया कानून में तत्काल 3 तलाक की व्यवस्था पति के लिए है। कुरान के अध्याय 2 की आयत 228 व 229 के अलावा पारा 65 की आयत 1 व 2 का यह उल्लंघन है।
इसी हिस्से में शरिया बैंकिंग और इस्लामिक बैंकिंग के बारे में भी बताया गया है। एक किताब का रिफ्रेंस देते हुए दवा किया गया है कि इस्लामिक बैंकों की स्थापना का मूल उद्देश्य जिहाद के लिए धन जुटाना था। ब्याज को हराम बताने वाले इन बैंकों पर दूसरे माध्यमों से लोगों के धन लूटने के आरोपों का जिक्र है। यूरोप और अमेरिका में शरिया कानून लागू कराने की लामबंदी और विरोध-प्रदर्शन पर भी चर्चा हुई है।
दूसरा हिस्साः जिहाद
इस पाठ के शुरुआत में ही जिक्र है कि खलीफा और सुल्तान मानते थे कि उनको शासन का अधिकार खुदा से मिला है। उनकी जिम्मेदारी है कि पहले दावा (इस्लाम स्वीकर करने का निमंत्रण) करें, फिर जिहाद। एक किताब का रिफ्रेंस देकर लिखा है कि अगर धर्म अपनाने से कोई मना करे तो उस पर गैर मुस्लिम कर यानी जजिया लगाएं। जजिया का अर्थ हुआ कि केवल कर नहीं दे रहे, बल्कि अपने धर्म में रहते हुए इस्लाम स्वीकार कर रहे हैं। जिहाद के बारे में तारेक ने कई तथ्य देते हुए लिखा है कि 'जिहाद का मतलब धर्म युद्ध नहीं है। जिहाद एक अरबी शब्द है, जिसका मतलब है संघर्ष या प्रयास करना।'एक इस्लामिक किताब का जिक्र किया गया है कि 'हो सकता है कि जो चीज आपके (मुसलमान) के लिए अच्छी हो, उसे आप नापंसद करें और जो आपके लिए बुरी हो उसे आप पसंद करें, लेकिन जिहाद आपके लिए एक फरमान है, भले ही आप इसे पसंद न करें।' जिहाद और छापामार लड़ाकों को खड़ा करने और उकसाने वाले कुछ नेताओं की बात भी इस हिस्से में दी गई है। पश्चिमी देशों में मुस्लिमों को नेता के तौर पर पहचान रखने वाले कुछ लोगों के विवादित बयानों को भी जिहाद से जोड़कर लिखा गया है।
पाकिस्तान में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में 2007 में हुई सैन्य कार्रवाई का एक जगह जिक्र किया गया है। लड़ाई खत्म होने के बाद 15 जुलाई को द संडे टाइम्स ने एक 15 साल की लड़की का इंटरव्यू छापा था। आसमा हयात ने उस सैन्य कार्रवाई को देखा था। हयात ने बताया था कि वह मस्जिद के मुख्य द्वार पर आंसू गैस के गोले से प्रभावित बच्चों को पानी पिला रही थी। तभी उसकी 17 साल की दोस्त नसमीन को गोली लगी। नसमीन की मदद के लिए वह गई तो उसने धकेल दिया। नसमीन ने कहा, 'अच्छा लग रहा है। यह शहादत है।' तारेक फतेह ने लिखा है कि यह मौत उस संप्रदाय का नतीज है, जिसे कोई चुनौती नहीं दे रहा है और जिसकी बातों को निजी इस्लामी स्कूलों में मुस्लिम बच्चों के दिमाग में भरा जा रहा है। मौत से पहले नसमीन के इस बर्ताव का कोई उदाहरण कुरान या पैगंबर की कही बातों में नहीं है।
तीसरा हिस्साः हिजाब
पूरी किताब में इस हिस्से की शुरुआत मुझे सबसे बेहतरीन लगी। खालेद होसैनी के उपन्यास A Thousand Splendid Suns के एक घटनाक्रम से हुई है। नाना नाम की गरीब अविवाहित मां 5 साल की अपनी बेटी मरियम से कहती है, 'मेरी बेटी, यह बात जान लो और अच्छी तरह गांठ बांध लो: जिस तरह कंपास की सूई उत्तर दिशा बताती है, उसी तरह मर्द की आरोप में लगने वाली अंगुली हमेशा औरत की ओर उठती है।' हुसैनी के इस उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है। अफगानिस्तान में जनजीवन के बारे में यह उपन्यास है।हिजाब को लेकर एक जगह तारेक फतेह सवाल उठते हैं। 'किसी महिला के बाल उसके शरीर के सबसे बेजान हिस्सा होते हैं। आखिर महिला के बाल में ऐसा क्या है जो मुसलमान मर्दों में इतना आवेग पैदा हो जाता है?'
2007 में क्यूबेक में ताइक्वांडो में 12 साल की लड़कियां हिस्सा लेने गई थीं। मुसलमान लड़कियों को इसमें हिस्सा नहीं लेने दिया गया था। प्रतियोगिता में नियम के अनुसार, केवल हेलमेट पहनने की छूट थी। हेलमेट से लड़कियों के बाल हिजाब के मुकाबले ज्यादा ढक रहे थे। प्रतियोगिता के आयोजकों ने कहा, चूंकी पैरों से ताइक्वांडो में प्रहार होता है। ऐसे में हिजाब का हिस्सा ढीला होकर अलग हो सकता है और खिलाड़ी चोटिल हो सकते हैं। लड़कियों के अभिभावक बगैर हिजाब नहीं खेलने पर अड़े रहे और प्रतियोगिता में बच्चों को हिस्सा नहीं लेने दिया गया। बच्चियों की यह टीम मॉन्ट्रियल मुस्लिम कम्युनिटी सेंटर की मस्जिद की तरफ से बनी थी। मस्जिद की वेबसाइट पर हिजाब न पहनने के नुकसान गिनाए गए थे। तलाक, व्यभिचार, बलात्कार, नजायज बच्चे, तनाव, असुरक्षा, पतियों के मन में शक, पारिवारिक सद्भाव में खलल, युवाओं को वासना व अनैतिकता की ओर जाने के लिए उकसाना। बच्चियों को ये नुकसान गिनाने के साथ ही कहा गया था कि अगर हिजाब उतारा तो मुस्लिम नहीं रह जाएंगी।
हिजाब को लेकर इस्लामिक विद्वान की एक कहानी का भी किताब में जिक्र है। एक मासूम युवक ने आकर्षक महिला का चित्र देखा और उसके शारीरिक आकर्षण में बंध गया। युवक के पास धन-दौलत या ओहदा नहीं था कि उस औरत तक पहुंच पाता। उसने बड़ा आदमी बनने के लिए लूटपाट, कत्ल, चोरी शुरू कर दी। आखिरकार एक दिन पकड़ा गया और उसे जेल हो गई। अब इसमें किसे कसूरवार ठहराया जाए? अगर उस औरत न हिजाब पहना होता और अपना हुस्न दिखाने से परहेज करता तो वह मासूम युवक इतने अपराध नहीं करता।
किताब के इस हिस्से के अंत में हिजाब का अर्थ भी बताया गया है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि देशों में नमाज के वक्त या बड़े-बूढ़ों के सामने पड़ने पर दुपट्टा या साड़ी से पल्लू डालने का रिवाज था। सोमालिया व अफ्रीका में हिजाब का वजूद नहीं था। इस्लामवादी भी मानते हैं कि नकाब या हिजाब का चलन इस्लाम के शुरुआत में नहीं था।
एक प्रफेसर की रिसर्च का जिक्र है कि इस्लाम के आने से पहले के दौर में अरब महिलाएं मर्दों को युद्ध के लिए विदा करते वक्त अपनी छाती से वस्त्र हटा देती थीं, ताकि लड़ाई के लिए वे उत्साहित हो सकें। इस्लाम आने के बाद पैगंबर को कुरान की इस बात का इलहाम हुआ, जिसमें महिलाओं से कहा गया कि वे अपनी छातियां कपड़े से ढके। इस कपड़े को कुरान में खिमर कहा गया, जिसे अरब में महिलाएं सिर ढकने के लिए पहनती थीं। कनाडा की नारीवादी फरजाना हसन की बात का भी जिक्र है। फरजाना ने कहा है कि कुरान में हिजाब के बारे में आदेश मुख्य तौर पर शालीनता के लिहाज से है, लेकिन यह सोच से ज्यादा जु़ड़ गया।
चौथा हिस्साः पश्चिम में इस्लामिक एजेंडा
मेरे हिसाब से किताब का यह सबसे बोझिल हिसा है। पश्चिम में इस्लामिक उग्रपंथ और मुसलमान नेताओं की राजनीति को इसमें रेखांकित किया गया है। अमेरिका की राजनीतिक चालाकी का भी जिक्र है। पाकिस्तान और कुछ दूसरे इस्लामिक देशों को मदद देकर उग्रवाद की पौध को किस तरह तैयार किया गया, इशारों में इसे बताने की कोशिश की गई है। 9/11 हमले में कूटनीति और इसमें इस्लामिक चरमपंथियों, उपदेशकों के हाल का विवरण है। तुर्की, इराक, ईरान और सीरिया में अशांति की वजह आदि पर कई लेखकों की बातों और समाचारों पर आधारित टिप्पणी की गई है।किताब का पटाक्षेप अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे चुके हुसैन हक्कानी ने किया है।


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