बात अफगानी जायके की...

 अफगानिस्तान का जिक्र आते ही दिमाग में सबसे पहले अफगानी चिकन, काबुली कबाब आता है। लेकिन, यहां के शाकाहारी व्यंजनों और मिठाइयों का भी कोई जोड़ नहीं है। काबूली चना, लंबे सुगंधित चावल, ड्राइफ्रूट्स की दीवानी तो पूरी दुनिया है। मसालों की बात चले और हींग की खुशबू न हो तो सबकुछ अधूरा रहेगा। अफगानिस्तान हींग की लाजवाब सुगंध के लिए भी जाना जाता है।
पंजाब और इसके आसपास के इलाकों पर अफगानी व्यंजनों का खूब प्रभाव है। हमने बस इनका थोड़ा रूप-रंग बदला है। अब लच्छा पराठा की ही बात कर लीजिए। अफगानी पराठे का बदला हुआ रूप है। ये अफगानी अपने व्यंजनों में प्याज और ड्राइफ्रूट्स का जमकर इस्तेमाल करते हैं। दूध-दही से तो इनकी दूरी हो ही नहीं सकती।

ज्यादा तामझाम वाला नहीं है ये अफगानी पराठा।


एक-एक कप आटा और मैदा लीजिए। एक चम्मच नमक डालकर गूंथ लीजिए। बिल्कुल नरम आटा। 30 मिनट के लिए ढंककर छोड़ दीजिए।
अब 3 प्याज लंबाई में बिल्कुल पतला-पतला काट लीजिए। एक उबला हुआ बड़ा आलू मिलाइए। मसालों में 2 चम्मच धनिया पाउडर, आधा चम्मच लाल मिर्च पाउडर और एक चम्मच जीरा पाउडर, आधा चम्मच अजवाइन, एक चम्मच कसूरी मेथी मिलाइए।
अब आटे को उठाइए, उसमें 2 चम्मच देसी घी मिलाकर फिर गूथिए। अब एक लोई लेकर रोटी की तरह बेलिए। फिर इस पर देसी घी लगा दीजिए। थोड़ा आटा छिड़किए, फिर प्याज-आलू वाला मिश्रण इस पर डालकर फैलाने के बाद आटा बुरक दीजिए। सर्कल से एक तरफ इसे काटिए और कोन आइसक्रीम की तरह मोड़ लीजिए। फिर ऊपर और नीचे से प्रेस करके लोई बनाइए और हाथ से ही रोटी जैसा बना लीजिए।
अब गर्म तवे पर इसे रख दीजिए। ध्यान रहे, आंच बिल्कुल धीमी हो। दोनों तरफ सेंकिए। मोटापे से ज्यादा जीभ की फिक्र हो तो देसी घी लगाइए, वर्ना लाल करके तवे से उतार लीजिए। गारंटी है, जब यह तवे से उतरेगा तो लच्छा पराठा से कम लच्छा नहीं होगा।

खाते समय भूलना मत, ये अफगानिस्तान हमारा हिस्सा था 😃😃

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बगैर कैसा अखंड भारत। अफगान पहले हिंदू राष्ट्र था। बाद में बौद्ध धर्म यहां आया, फिर इस्लामीकरण हुआ। 7वीं सदी तक यह अखंड भारत का भाग था। 26 मई 1739 को दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह अकबर ने ईरान के नादिर शाह से संधि कर अफगानिस्तान उसे सौंप दिया था।
1747-1773 के बीच अहमद शाह दुर्रानी के शासनकाल के दौरान इसका नाम अफगानिस्तान पड़ा। इससे पहले आर्याना, आर्यानुम्न, वीजू, पख्तिया, खुरासान, पश्तूनख्वाह और रोह आदि नाम से इसकी पहचान थी। गांधार, कंबोज, कुंभा, वर्णु, सुवास्तु आदि इसके क्षेत्र थे। बिल्कुल, महाभारत वाला गांधार इधर ही था।

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