#VikasDubey के बेटे और पत्नी की यह तस्वीर देखी। ऑफिस के काम से थक चुका था। लैपटॉप बंद कर लेट गया। लेकिन, नींद नहीं आई। बार-बार डरे हुए बच्चे की हाथ उठाए फोटो सामने आ रही थी। फिर सोचा अगर आज नहीं लिखूंगा तो खुद से सुबह नजरें मिलाने में और कष्ट होगा।
डीजीपी हितेश चंद्र अवस्थी जी आप भी बच्चे के पिता हैं। विकास दुबे के बेटे को इस हालत में खड़ा करके तस्वीर लेने वाला आपका बहादुर पुलिसकर्मी भी किसी बेटे का बाप होगा। हमने तो #ISIS में ही ऐसा फोटोसेशन देखा था। मानवता तो छोड़िए, कानून के लिहाज से क्या यह उचित है? बाप की गलती की सजा उसके बेटे को क्यों? वैसे ये सजा नहीं, उससे बढ़कर है। मासूम के दिमाग में आपने आजीवन के लिए पुलिस से नफरत भर दी।
8 पुलिसवालों की जान लेने वाले आतंकवादी विकास दुबे को बीच चौराहे पर खड़ा करके भून डालिए। लेकिन, किसी बच्चे के साथ ऐसा सलूक करना कहां का इंसाफ है? यही अन्याय है, यही भ्रष्टाचार है। संविधान के प्रति निष्ठा और वफादारी को किसी नेता की गोद में रखना इसी कृत्य को कहते हैं। याद रखिए, इतिहास गवाह रहा है, आपकी खाकी की वफादारी का। उसमें एक अध्याय आज आपने और लिख दिया।
आपके बहादुर अफसरों की तत्परता हमें याद है, जब आजम खां की 7 भैंसें चोरी हुईं थीं। 31 जनवरी 2014 का दिन था। 24 घंटे के अंदर भैंसें मिल गईं थीं। चौकी इंचार्ज समेत 2 पुलिसवाले लाइन हाजिर किए गए थे। 23 मई तक कई लोगों को डकैती की धाराओं में जेल भेजा था। वफादारी बदली तो उसी आजम खां को पायल चोरी, बकरी चोरी में सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। बच्चा-बच्चा भी आपकी यह बहादुरी जानता है।
साल 2006 की घटना भी हमें खूब याद है। गवाह थी हमारी संसद। फूट-फूटकर रोये थे हमारे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। लोकसभा अध्यक्ष से आपकी बहादुरी की शिकायत की थी। इतने व्यथित थे कि कई मिनटों तक तो जुबान से शब्द नहीं निकले थे। योगी ने तब नियम याद दिलाया था। देश को बताया था कि जिस केस में महज 12 घंटे तक बंद रखा जा सकता है, उसमें आपने कैसे 11 दिन जेल में रखा। लेकिन, दुख है कि आज वे खुद इस पाप पर मौन हैं।
पिछले साल योग दिवस पर शाहजहांपुर में आपकी पुलिस का शौर्य भी हमने देखा था। मंत्री लक्ष्मी नारायण को जूता पहनाते आपके मातहत की फोटो ने कई जवानों को शर्मसार किया था। मथुरा में रामगोपाल यादव के पैरों में पड़े उस वक्त के सीओ सिटी राकेश सिंह यादव की तस्वीर भी हमारे जेहन में है। दर्ज प्राप्त राज्यमंत्री रहे आबिद रजा खां को जूते पहनाते या शिवपाल यादव की सैंडल लेकर पीछे-पीछे भागते आपके जवानों का शौर्य भी हमें याद है। पुलिस मैनुअल को कूड़े में फेंककर वर्दी में घुटनों पर बैठकर सिर पर रुमाल डाले महंत जी से टीका लगवाते अफसर को भी हम नहीं भूले हैं। डीएसपी पदम सिंह भी हमें याद हैं। हेलिकॉप्टर से उतरीं मायावती की जूतियों में लगे कीचड़ को अपने पॉकेट रुमाल से साफ किए थे।
मथुरा में 2016 में जवाहर बाग कांड की राजनीति भी हम नहीं भूले हैं। जाबांज, बहादुर अफसर मुकुल द्विवेदी किस तरह से राजनीति का मोहरा बन गए थे। इन नेताओं के चरणों में पड़ी आपकी वफादारी की कीमत उन्होंने शहीद होकर चुकाई थी। आपकी वफादारी हमने बलात्कारी कुलदीप सेंगर के आगे-पीछे भी देखी थी। Amitabh Thakur जैसे अफसरों का किस तरह सम्मान किया, यह भी याद है। थाने में कैसे एक अदने से इंस्पेक्टर ने उनका केस दर्ज करने से मना कर दिया था।
ददुआ, ठोकिया, श्रीप्रकाश शुक्ला, अतिक अहमद, मुख्तार अंसारी का गुरूर मिट्टी में मिलाने की कहानी आपकी वर्दी पर आज भी सुनहरे अक्षरों में लिखी दिख रही है। शौर्य से भरपूर रहा है आपका इतिहास। फिर, ऐसी क्या मजबूरी आ गई कि कानून को गिरवी रख दिया? बाल छूकर गोली निकल गई, एनकाउंटर में एक तमंचा 2 कारतूस मिले, पुलिसकर्मी की पिस्टल छीनकर भागते समय जवाबी कार्रवाई में मारा गया, ये बच्चों जैसे बहाने हैं। अब ऐसे बहाने बनाने की जरूरत क्यों पड़ने लगी? हमारी निडर और बहादुर पुलिस को कार्रवाई के लिए अब ऐसे बहाने क्यों बनाने पड़ रहे हैं?
और भी बहुत कुछ लिखने को मन कर रहा। आपके इस कृत्य पर जी करता है कि की-बोर्ड पर उंगलियां तब तक नचाता रहूं, जब तक शरीर का एक-एक बूंद खून उनसे न निकल जाए। मानवता के नियम को सबसे बड़ा मानता हूं। मैं आस्तिक हूं। बस इसी विश्वास पर बात खत्म कर रहा कि जिस पुलिसवाले ने यह तस्वीर ली है, उसे इसकी सजा कभी न कभी तो जरूर मिलेगी।
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