समझ नहीं सके आखिर किसानों की जरूरत क्या है...


#किसान... 3 अक्षर का एक शब्द नहीं पूरी किताब है। कड़ी मेहनत और मामूली संसाधनों में कैसे जीते हैं, इनसे बेहतर कौन सिखाएगा। जुताई, बीज, बुआई, पानी, खाद, मेहनत सब मिलाकर घाटे की फसल काटकर भी ये खुश रहते हैं। घर में फूटी कौड़ी न हो, फिर भी जमीन अपनी परती नहीं रखते। #राजनीति का तो ये ककहरा भी नहीं जानते।

हमने तो आज तक किसी किसान को गर्म पानी में नहाते नहीं देखा। न तो उनके पास इतना वक्त होता है और न ही संसाधन। गेहूं की बुआई का मौसम खत्म होने को है। आलू के मेड़ बनाने का समय है। गन्ना तैयार है। दूसरी फसलों और सब्जियों ने तो मेड़ के अंदर ही किसान को बांध लिया है। मेरे गांव और आसपास के करीब 40 गांवों के कई किसान संपर्क में हैं। एक हफ्ते के लिए घर बुलाकर देखिए... जवाब मिलेगा... ‘किसानी का वक्त है, 15 दिन बाद आऊं क्या?’ लेकिन, पगड़ी पहने धरने पर बैठे किसानों को उनके खेत नहीं बुला रहे हैं। खेत क्यों नहीं बुला रहे हैं? शाही खानपान और रहन-सहन का इंतजाम किसान कैसे कर रहे हैं? लग्जरी टेंट, खाना बनाने की आधुनिक मशीनों, राशन का इंतजाम करने वाले कौन हैं? इन्हीं प्रश्नों पर किसानों के तथाकथित नेता भड़क रहे हैं। मारपीट पर उतारू हो रहे हैं।


पहली बात तो साफ कर दूं कि केवल पगड़ी पहनने वाला ही किसान नहीं होता। पगड़ी ‘बांधने’ वाले भी किसान होते हैं। यूपी, एमपी, बिहार, पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में भी किसान हैं। असहमत होने पर तर्क दे सकते हैं कि पूरे देश के किसान जुटे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। #सिंघु बॉर्डर से लेकर यूपी बॉर्डर तक एक वर्ग का दबदबा है। आंकड़े गवाह हैं कि किसानी तो हमारी रग-रग में है। यूपी, बिहार, बंगाल ने देश का खाद्यान भंडार भरा है।

देश में गेहूं पैदावार में अकेले यूपी का शेयर 34.89 पर्सेंट है। पंजाब 21.55 पर्सेंट पर टिका है। कृषि मंत्रालय की ये पिछले साल की रिसर्च रिपोर्ट है। दूसरी बड़ी फसल गन्ना खेती की सबसे ज्यादा जमीन भी यूपी में ही है। दलहन, तिलहन में यूपी और एमपी ही अग्रणी हैं। बागानी फसलों के लिए तो असम, कर्नाटक, केरल और आंध्रप्रदेश का दबदबा है। मसाले केरल और आंध्रप्रदेश के सुगंध भरते हैं। मुंगफली का राजा गुजरात है। देश की प्रमुख फसल चावल है, जिसके उत्पादन में पश्चिम बंगाल आगे है। ये राज्य गवाह हैं कि यहां किसान खेती करते हैं, कठपुतली बनकर नाचते नहीं हैं। इन्हें कोई फाइनैंसर नहीं मिलता, तभी सूखा पड़ने पर फांसी पर लटक जाते हैं।

बात 100 पर्सेंट सच है कि किसानों के लिए किसी भी सरकार ने कुछ खास नहीं किया। कर्ज माफी, बिजली बिल माफी, किसान क्रेडिट कार्ड, किसान योजना के रुपये ये सब बस छलावा है। दरअसल हमारी सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर पूरा फोकस रखा। इंफॉर्मेशन टेक्नॉलजी, सैन्य सुरक्षा, इंडस्ट्री, हेल्थ आदि पर रिसर्च एंड डिवेलपमेंट में निवेश किया। लेकिन, उन्नत खेती क्या बला है, इस पर ध्यान नहीं दिया। वैज्ञानिक तरीके से कम लागत में खेती कैसे करें, यह सिखाने के लिए किसानों के खेत तक नहीं पहुंचे। सब्सिडी, कर्ज माफी, खाते में रुपये देना समस्या का हल नहीं है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (#एमएसपी) का झुनझुना भी बीमारी दूर नहीं करेगा।

आधी से ज्यादा आबादी किसान है। सरकार को इस सेक्टर में वैज्ञानिक रिसर्च को बढ़ावा देना चाहिए। किसानी को पाठ्यक्रम का जरूरी हिस्सा बनाना चाहिए। जैसे गांव-गांव तक सड़क पहुंची, मनरेगा में काम मिला, शौचालय बने वैसे ही रिसर्च सेंटर बनना चाहिए। हमारे गांव के 20 किमी की परिधि में ऐसा कोई रिसर्च सेंटर नहीं है। स्प्रिंकलर फार्मिंग से कैसे कम पानी में सिंचाई कर सकते हैं, बीमा योजना क्यों जरूरी है, खाद्यान को कैसे लंबे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं आदि बातें हमारा किसान अब भी नहीं जानता। गांव में पंचायत भवन तो बनवा दिए, लेकिन कोल्ड स्टोरेज और खाद्यान गोदाम नहीं बनवा सके। सरकार किसानों की जरूरत को तो अब तक नहीं समझ सकी है।

इंस्पेक्टर राज इतना है कि एमएसपी खरीद की हकीकत किसान का बच्चा भी बता देगा। पशुओं के कृत्रिम गर्भाधान पर सरकार करोड़ों खर्च करती है। सरकारी पशु चिकित्सालयों में फ्री में इसका नियम है, लेकिन बता दीजिए किसी किसान को इसका लाभ मिला हो। किसानों का झंडा उठाने वाले ही नहीं चाहते कि किसान यूरिया के जंजाल से निकले। उनके पशुओं के गोबर, पराली आदि से बनने वाली खाद के बारे में कभी बताने की जहमत नहीं उठाई गई। 

वजह साफ है कि किसान गोबर का महत्व समझ लेगा तो एलपीजी, #यूरिया, डाई अमोनियम फास्फेट, सुपर फास्फेट, पोटाश, जिंक सल्फेट की दुकानदारी बंद हो जाएगी। किसान अपने खेत की मिट्टी पहचान लेगा तो कारोबारी शटर गिरा लेंगे। कारोबार बन्द होने पर न तो चंदा मिलेगा और न चुनावी वादों की बारिश होगी। सरकार ही नहीं, धरने की फंडिंग करने वाले भी जानते हैं कि किसान वैज्ञानिक तरीके से किसानी सीख लेगा तो धरने पर बैठकर वक्त बरबाद नहीं करेगा। कानून पर चर्चा करने की जगह गेहूं उगाकर 8 रुपये किलो में भी मुनाफा वसूली कर लेगा।

#प्रदीप #FarmersProtest #SinghuBorder

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