कांग्रेस ने दी है ढाल, सुप्रीम कोर्ट नहीं बदल सकेगा कृषि कानून

केंद्र सरकार के कृषि कानून पर कल आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले की चर्चा गरम है। लेकिन, यह मामला सुप्रीम कोर्ट की परिधि से बाहर का है। सुप्रीम कोर्ट की राह से दूर करने में योगदान कांग्रेस का ही है। 

1954 के पहले तक प्रॉडक्शन, सप्लाई, डिस्ट्रिब्यूशन, ट्रेड और कॉमर्स राज्यों के विषय थे। इन पर कानून बनाने, लागू करने का अधिकार राज्यों को था। इन्हीं 5 पॉइंट पर हाल ही में आए केंद्र के तीनों कृषि कानून भी हैं। जवाहरलाल नेहरू ने 1954 में बड़ा कृषि सुधार किया था। संविधान में संशोधन कर एंट्री नंबर 33 में इसका जिक्र किया। एंट्री नंबर 33 में पांचों पॉइंट पर कानून बनाने, संशोधन करने की शक्ति केंद्र को भी मिल गई। टकराव से बचाने के लिए राज्यों के लिए एंट्री नंबर 26 और 27 में साफ लिखा है कि संविधान की एंट्री नंबर 33 के अंदर रहते हुए काम करना होगा। 

सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक मजबूरी रहेगी। कोर्ट मानकर चलेगा कि तीनों कानून संवैधानिक हैं। कोर्ट में पहुंचने वालों को साबित करना होगा कि कैसे ये कानून असंवैधिक है? 

किसी कानून को असंवैधानिक बताने के भी कुछ पहलू हैं। इनमें से मुख्य पॉइंट है कि...

- यह हमारे मूल अधिकारों का हनन न कर रहा हो

- सदन से नियमानुसार पास किया गया हो

सुप्रीम कोर्ट पहुंचे लोग दूसरे पॉइंट पर फोकस कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह कानून सदन में नियमानुसार पास नहीं हुआ है। आर्टिकल 123 के तहत केंद्र सरकार तीनों कृषि कानूनों का अध्यादेश लाई थी। नियम है कि 6 सप्ताह में इसे सदन में पास कराना था। कोरोना संक्रमण के बीच सरकार ने इसी मजबूरी की वजह से 14 सितंबर से एक अक्टूबर के बीच मॉनसून सत्र बुलाया।

आपदा में तलाशा अवसर

बिल पास कराने में बड़ी चुनौती राज्यसभा में थी। सरकार ने आपदा को अवसर में बदला। रविवार छुट्टी का दिन था। फिर भी 20 सितंबर को इसे राज्यसभा में पेश किया गया। उच्च सदन में तब 243 सदस्य थे। बिल पास कराने के लिए 122 मतों की जरूरत थी। लेकिन, एनडीए के पास सभी कोशिशों के बावजूद करीब 105 सदस्य ही थे। सरकार बहुमत में नहीं थी, इसका ये मतलब नहीं कि विपक्ष बहुमत में था। विपक्ष के 15 सांसद उस दिन सदन से अनुपस्थित थे। कोरोना संक्रमित होने की वजह से 10 संसद भी कार्यवाही में हिस्सा नहीं ले रहे थे। लोकसभा में चूंकि शिवसेना ने इस बिल का समर्थन किया था, ऐसे में उसका पीछे हटना मजबूरी थी। एनसीपी ने महाराष्ट्र में यही कानून लागू किया है, ऐसे में उन्हें भी हटना लाजमी था। विपक्ष कुल मिलाकर कमजोर स्थिति में था। उसने मांग रखी कि इस बिल को सिलेक्शन कमिटी के पास भेजा जाए। विपक्ष की मांग को ठुकराते हुए वोटिंग का फैसला हुआ। 

ध्वनि मत से पारित कानून कैसे है संवैधानिक

विपक्ष का तर्क है कि तीनों कृषि कानूनों पर वोटिंग हो सकती थी, लेकिन सरकार ने नहीं कराई। नियम यह है कि वोटिंग के समय सदन के सदस्य अपनी सीट पर मौजूद रहेंगे। कोरोना संक्रमण की वजह से 2 गज की दूरी का पालन करते हुए सांसदों को बैठाया गया था। ऐसे में कई सांसद अपनी सीट पर नहीं थे। बस इसी नियम का फायदा उठाते हुए उपसभापति ने ध्वनि मत से कानून को पास करने की संस्तुति की। 

संप्रभु है हमारी संसद

संविधान का आर्टिकल 122 कहता है कि संसद के अंदर की कार्यवाही का कोई विषय सुप्रीम कोर्ट में नहीं जाएगा। संसद की कार्यवाही के मामले में हमारा उच्च सदन संप्रभु है। जो भी प्रक्रिया यहां अपनाई गई, उसकी जूडिशियल स्क्रूटनी नहीं हो सकती है। ऐसे में कृषि कानूनों के असंवैधानिक होने का ध्वनि मत वाला पॉइंट भी कमजोर ही रहने वाला है। 

संयुक्त बैठक का विकल्प भी सरकार के पास

सरकार अगर अपने मूंछ का ही प्रश्न इस कानून को बना ले तो उसके पास संयुक्त बैठक बुलाने का भी विकल्प है। अब तक के इतिहास में 3 बार इसका इस्तेमाल हुआ है। 1961  में दहेज निषेध विधेयक, 1978 में बैंकिंग सेवा आयोग (निरसन) विधेयक और 2002  में आतंकवाद निरोधक विधेयक को पास कराने के लिए तत्कालीन सरकारों ने इसका इस्तेमाल किया था। लेकिन, संयुक्त बैठक में भी विपक्ष कमजोर ही रहेगा। 

दरअसल लोकसभा में अभी 543 सदस्य हैं। राज्यसभा में अभी 241 सदस्य हैं। संयुक्त बैठक बुलाई गई तो कुल 785 सदस्य मत डालेंगे। कानून पास होने के लिए फिर 393 मतों की जरूर होगी। लोकसभा में एनडीए के 353 सदस्य हैं। शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल को हटा दें तब भी 233 सदस्य बचेंगे। राज्यसभा में एनडीए 100 प्लस में है। ऐसे में आसानी से इस तरीके से भी कानून पास होने से कोई नहीं रोक पाएगा। स्पीकर फौरन इसकी संस्तुति करेंगे और उपसभापति व राष्ट्रपति बिल्कुल भी रोकने की जहमत नहीं उठाएंगे। 

सरकार से भी कई लोग कृषि कानून के विरोध में राग अलाप रहे हैं। इनकी आवाज दबाने के लिए एक कानून है दल बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law)। जब मतदान का वक्त आएगा तो सरकार के समर्थन वाले दल व्हिप जारी करेंगे। सरकार के समर्थन वाली पार्टी के हर संसद को व्हिप के तहत ही मत देना होगा। विरोध करने पर उनकी सदस्यता खत्म करने की कार्रवाई तक हो सकती है। कांग्रेस ने संविधान के 52वें संशोधन से इस कानून को बनाया था। 

निष्कर्ष

कुल मिलाकर कांग्रेस ने ही मौजूदा सरकार के हाथ में लाठी दी है। अब उसी लाठी का इस्तेमाल सरकार कर रही है तो कांग्रेस को परेशान होने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट सदन की कार्यवाही पर तो बात ही नहीं करेगा। राज्य के अधिकारों पर अतिक्रमण का रास्ता नेहरू जी ने पहले ही बंद कर दिया था। ऐसे में 100 प्रतिशत तय है कि सुप्रीम कोर्ट कानून को बदलने, रद्द करने पर कोई फैसला नहीं ले सकेगा। 

#supremecourt #farmersprotest #Pradeep


टिप्पणियाँ