वित्त मंत्री जी, हेल्थ, इंफ्रा और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को दीजिए ज्यादा पैसा

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक फरवरी को देश का #बजट पेश करेंगी। कई तरह के आंकड़ें सामने आएंगे। लाखों करोड़ों में बातें होंगी। लेकिन, हमें इन आंकड़ों से नहीं मतलब। बात बस इतनी है कि अगर जेब में 100 रुपये है तो जरूरी और जरूरत को समझते हुए खर्च किए जाए। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के लिए इन पॉइंट्स पर केंद्रीत हो हमारा बजट...

1. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर

सरकार को #मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर खास फोकस करना चाहिए। लगातार घाटे में जा रही बैलेंसशीट को सुधारने में यह सेक्टर संजीवनी बन सकता है। जो सामान हमारे देश में आसानी से तैयार हो रहा है, उसके आयात की राह भारी टैक्स से रोक दीजिए। सरकार को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ को 20 पर्सेंट तक लाने का प्रयास करना होगा। अधिकतर पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग कंपनियां लगातार घाटे में चल रही हैं। सबकुछ गंवाने से बेहतर होगा कि इन्हें एक्सपर्ट हाथों में देकर लाभ कमाने का प्रयास हो। सैल, एमटीएनएल, एचपीसीएल, यूनाइडेट इंडिया इंश्योरेंस कंपनी, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी, राष्ट्रीय इस्पात उद्योग जैसे 19 बड़े प्लेयर हैं। इन्हीं सेक्टरों में काम करने वालीं निजी कंपनियां फायदे में हैं, लेकिन ये घाटे में चल रही हैं। ऐसे में इन कंपनियों को निजी हाथों में देकर रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ ही लाभ कमाने की कोशिश हो सकती है। हर साल सरकार करीब 30 हजार करोड़ से ज्यादा इन पर खर्च कर रही है।

 2. स्वास्थ्य

कोविड-19 के बाद हमें अपने देश के #हेल्थ सेक्टर का ख्याल आया। अमेरिका, इटली, स्पेन, फ्रांस, जर्मन, इरान जैसे हालात अपने देश में होते तो लाशें सड़कों पर बिछने लगतीं। हमारे देश का हेल्थ सेक्टर लगभग पूरी तरह से प्राइवेट हाथों में है। बजट में हेल्थ सेक्टर को दूसरे नंबर पर रखना चाहिए। सरकारी अस्पतालों के निर्माण से ज्यादा डॉक्टरों की कमी की टेंशन है। कई डॉक्टर ऐसे हैं, जो इंफ्रास्ट्रक्चर न होने और रुपयों की कमी की वजह से निजी अस्पतालों में चंद तनख्वाह पर काम करते हैं। निजी अस्पतालों में फीस इतनी कि गरीब वहां तक पहुंच नहीं सकता। सरकारी अस्पतालों में इन्हें प्रैक्टिस करने की अनुमति मिलनी चाहिए। नियम बनें कि तय मरीजों की संख्या या तय समय के बाद कोई भी डॉक्टर सरकारी अस्पताल में अपनी फीस लेकर मरीज देख सकता है। इससे सरकारी अस्पताल की तरफ हर वर्ग के कदम बढ़ेंगे और लोगों को बेहतर इलाज भी मिलेगा। सरकार की भी आमदनी यहां से मिले टैक्स से होगी। दवा कंपनियों के आरएंडडी में भी सरकार को अपनी पहुंच बढ़ानी चाहिए। निजी कंपनियों की बेहतर रिसर्च को टैक्स छूट, इंफ्रास्ट्रक्चर या दूसरी तरह के लाभ देकर सभी तक पहुंचाने की पहल करनी चाहिए।

3. इंश्योरेंस सेक्टर

किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था की पहचान में #इंश्योरेंस सेक्टर का अहम रोल होता है। सब्सिडी, लोन माफी और दूसरी ऐसी खजाना खाली करने वाली योजनाओं की जगह बीमा पर ध्यान केंद्रीत करना चाहिए। अटल बीमा योजना बेहतर प्रयास था। लेकिन, हर व्यक्ति तक हेल्थ, टर्म, एक्सिडेंट इंश्योरेंस की पहुंच होनी चाहिए। देश का बड़ा वर्ग बीमा लाभ से अभी वंचित है। छोटी सी बीमारी में जीवनभर की पूंजी लुटाना उसकी नियति बन चुकी है। प्राकृतिक आपदा में फसल ही नहीं, कारोबार बर्बाद होने का घाटा सहना मजबूरी है। इंश्योरेंस सेक्टर को टैक्स से राहत देते हुए सब्सिडी मिलनी चाहिए। न्यूनतम मूल्य पर हर व्यक्ति तक बीमा की पहुंच हो। स्वास्थ्य और एक्सिडेंट बीमा को वाहन बीमा की तरह अनिवार्य करना चाहिए। 

4. इंफ्रास्ट्रक्चर 

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ वहां का #इंफ्रास्ट्रक्चर होता है। आवागमन के बेहतर साधन होने पर ही देश रफ्तार भर सकता है। पिछली बार 100 करोड़ रुपये इस सेक्टर पर खर्च करने की बात कही गई थी। परिवहन
इंफ्रास्ट्रक्चर पर 1.70 लाख करोड़ खर्च करने की योजना थी। मॉडर्न रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, बस स्टेशन, लॉजिस्टिक सेंटर बनाने की योजना थी। दिल्ली मुंबई एक्सप्रेसवे, चेन्नै बेंगलुरु एक्सप्रेसवे, रेल फ्रेट कॉरिडोर, लॉजिस्टिक सेंटर्स बढ़ाने का काम सराहनीय है। लेकिन, इस सेक्टर में इस बार के बजट में 25 पर्सेंट की बढ़ोतरी होनी चाहिए। हवाई रूट से कटे शहरों को जोड़ना, नदियों में परिवहन के विकल्प तैयार करने पर काम होना चाहिए। अगर प्राइवेट कंपनी खुद के खर्च पर इन्हें डिवेलप करना चाहे तो सरकार को दरवाजे खोलने चाहिए। इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार और रोजगार के लिए यह जरूरी है। लेकिन, आम लोगों को इसकी कीमत भारी न पड़े, इसका भी ध्यान रखते हुए कदम बढ़ाना होशियारी होगी। रियल एस्टेट सेक्टर के लिए विशेष पैकेज मिलना चाहिए। होम लोन की ब्याज दरों को कम किया जाना चाहिए। 

5. बैड बैंक

मेरी राय में यह सबसे जरूरी है। बैड #बैंक बनाने के विरोध में कुछ लोग हैं। लेकिन, बैंकों को डूबने से बचाने के लिए इससे बेहतर विकल्प कुछ नहीं हो सकता। हर साल बैंकों का एनपीए बढ़ रहा है। इनकी वसूली का अभी कोई ठोस उपाय नहीं है। लेकिन, बैड बैंक में कुछ बातों को भी ध्यान रखना होगा। इसमें सभी बैंकों के साथ ही हर सेक्टर के एक्सपर्ट को शामिल किया जाना चाहिए। नाउम्मीद हो चुके कर्ज को अगर यहां खरीदा जाए तो उसे वसूलने के लिए सख्ती की पूरी छूट हो। कर्ज लेकर न चुकाने में कड़ी सजा का प्रावधान हो और केस फास्ट्रैक कोर्ट में चले। पीएम स्‍वनिधि योजना, मुद्रा (शिशु) लोन जैसे माइक्रो फाइनैंस की योजनाएं बैंकों का एनपीए बढ़ाने और चुनावी हथकंडा हैं। इस तरह के लोन देने के लिए जब माइक्रो फाइनैंस कंपनियां हैं, फिर बैंकों को बलि का बकरा क्यों बना रहे हैं? माइक्रो फाइनैंस कंपनियां ऐसे लोन देने और वसूली में एक्सपर्ट होती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, मुद्रा के शिशु लोन और पीएम स्वनिधि योजना के 90 पर्सेंट कर्ज एनपीए हो चुके हैं। सरकार को इन्हें बंद करना चाहिए।

6. टैक्स

सरकार की आय का यह अहम हिस्सा है। #आयकर की सीमा इस बार यथावत रखनी चाहिए। कोविड की वजह से लोगों की हालत पहले ही खराब है। कोविड सेस सभी पर लगाने की जगह खास वर्ग और सेक्टर पर फोकस करना चाहिए। कोविड के दौरान सभी सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। लेकिन, आईटी, हेल्थ और कंज्यूमर गुड्स से जुड़ी कंपनियां फायदे में रहीं। आईटी और हेल्थ सेक्टर की कंपनियों पर कॉर्पोरेट टैक्स का थोड़ा भार बढ़ाने का विकल्प है। कंज्यूमर गुड्स सेक्टर की कंपनियों को दूर रखना मजबूरी होगी, क्योंकि यहां से गरीब वर्ग भी जुड़ा है। यहां कोविड सेस भी लगाया जा सकता है। मिड कैप और माइक्रो कैप कंपनियों पर टैक्स का बोझ लाद दिया तो इनकी कमर टूट जाएगी। हां, इन क्षेत्रों की लीडर कंपनियों पर कोविड सेस लगाया जा सकता है। प्रदूषण फैलाने में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जिम्मेदार कंपनियों पर आधे पर्सेट का एक्स्ट्रा टैक्स लगाया जाए। इन रुपयों का इस्तेमाल हवा, पानी को प्रदूषण मुक्त बनाने में हो।

7. विदेशी निवेश को लुभाना

पूरी दुनिया की निगाहें इस वक्त हमारी तरफ है। सस्ता श्रम, भौगोलिक वातावरण और हमारी बड़ी आबादी नामचीन कंपनियों को अपनी ओर बुला रही है। सरकार की कूटनीति भी बेहतर है। ऐसे में इन्हें लुभाने की खूब कोशिश इस बजट में करनी चाहिए। कम मूल्य पर जमीन देना, इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराना, सुरक्षा, कागजी कार्रवाई को सीमित करना जैसे फैसलों को जगह मिले। जरूरत पड़े तो प्रॉडक्शन के एक साल या कुछ महीनों तक टैक्स छूट का लॉलीपॉप भी देने से पीछे नहीं हटना चाहिए। लेकिन, ध्यान रहे कि विकास केवल एक क्षेत्र में सीमित न हो। देश के हर कोने में सरकार को अपनी कूटनीति के तहत ऐसी कंपनियों को बसाने पर जोर लगाना होगा। किसी एक क्षेत्र में कंपनियां लगीं तो वातावरण के साथ ही डिवेलपमेंट के ढांचे पर भी नकारात्मक असर होगा। सुदूर इलाकों में कंपनी लगाने पर टैक्स छूट की सीमा बढ़ाने का विकल्प देना चाहिए। विदेशी निवेश की समय सीमा का निर्धारण हो, लेकिन 3 साल से कम न हो।

8. सब्सिडी

देश का एक बड़ा वर्ग है, जहां #सब्सिडी की बहुत जरूरत है। लेकिन, यह उसी वर्ग तक सीमित होनी चाहिए। सरकार के पास पैन और आधार का डेटा है। लगभग सभी के आधार उनके बैंक खातों से जुड़ चुके हैं। अपात्र लोगों तक जो सब्सिडी जा रही है, उससे कम खर्च पर आधार और पैन के डेटा से इनकी लिस्ट निकल सकती है। 3 लाख से ज्यादा आय वाले को सब्सिडी क्यों मिलनी चाहिए? इनसे गैस सिलिंडर से लेकर कृषि उत्पादों तक की सब्सिडी बंद करनी चाहिए। 4-5 ग्राम पंचायत या एक लाख की जनसंख्या पर कृषि रिसर्च सेंटर, हर शहर में आरएंडडी (अनुसंधान) की व्यवस्था होनी चाहिए। इन सेंटरों तक छात्रों की पहुंच हो। हर रिसर्च पर सरकार की सीधी नजर रहे। बेहतर रिसर्च को बढ़ाने में सरकार की तरफ से पहल हो। गैरजरूरी लोगों की सब्सिडी से बचे रुपयों को यहां लगाना बेहतर विकल्प होगा। 

9. सरकारी खर्च में कटौती

सरकार को अपने खर्च में कटौती करनी चाहिए। अफसरों, मंत्रियों को मोटी पगार मिलती है। ऐसे में उन्हें सरकारी गाड़ी देने का क्या औचित्य है? इनके मेंटिनेंस और ड्राइवर पर मोटा खर्च होता है। सेल्फ ड्राइविंग, कार पुलिंग या पब्लिक ट्रांसपोर्ट अनिवार्य होना चाहिए। यहां से बचने वाली रकम और मैनपावर को पुलिस में देने पर विचार हो। जनसंख्या के हिसाब से पुलिसबल कम हैं। इनके पास संसाधन और फंड की भी कमी है। सुरक्षा के बड़े लाव-लश्कर को कम करके थानों में मैनपावर बढ़ाने पर जोर देना होगा। 

10. शिक्षा, रक्षा और बाकी सेक्टरों में सरकार का फोकस बेहतर है। लेकिन, इस बार यहां बजट बढ़ाने की खास जरूरत नहीं है।


 #Budget #Pradeep


टिप्पणियाँ