आजाद भारत का जलियांवाला बाग नरसंहार

जलियांवाला बाग... खूनी इतिहास को याद करने के लिए बस नाम ही काफी है। 13 अप्रैल 1919 का मनहूस दिन था। 1200 लोग मारे गए थे। 3600 बेगुनाह जख्मी हुए थे। लेकिन, आजाद भारत के माथे पर भी एक जलियांवाले बाग का कलंक है। लाशों की गिनती से इसे कमतर आंकना नाइंसाफी होगी। 1200 लाशों को जब हमने गिना था, तब गुलाम थे। लोकतंत्र की बात वहां बेमानी थी। 24 लाशों को जब गिना, तब हम आजाद थे। गोली चलाने का हुक्म देकर अट्टाहास करने वाले हमारे वोटों के दम पर कुर्सी पर बैठे थे। लोकतंत्र के संविधान की सौगंध खाई थी। हमें यकीं दिलाया था... हर हाल में लोक (जनता)
का तंत्र (शासन) होगा। लेकिन, ये केवल कहने की बातें थीं। काली चमड़ी के अंदर का दिल गोरा था। हक की आवाज कानों में इतनी तेज गूंजी कि गोलियों के शोर से उसे शांत कराने की ठान ली। आगे पढ़ने से पहले अब तस्वीर देखिए...  अपना हक मांगने निकले किसानों का ये हाल कांग्रेस शासन में किया गया था।

संतरों के लिए मशहूर नागपुर से महज सवा सौ किमी दूर मध्यप्रदेश की एक तहसील है मुलताई। जनवरी का महीना और साल 1998 था। यहां के अधिकांश किसानों की एकमात्र फसल थी सोयाबीन। करीब 4 साल से गेरुआ बीमारी का कहर सोयाबीन पर टूट रहा था। 1998 में बेमौसम बारिश ने किसानों की कमर तोड़ दी। 4 साल से घाटा सह रहा किसान टूट गया। राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। सीएम की कुर्सी पर राजा जय सिंह के पूर्वज और राघोघढ़ रियासत के दिग्विजय सिंह बैठे थे। बैतूल में किसानों की सभा हुई थी। फरियाद लेकर कलेक्टर साहब के पास जाने का फैसला हुआ।

किसान कलेक्टर के पास झोली फैलाए पहुंचे। 5000 रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा मांगा। उस साल #सोयाबीन का समर्थन मूल्य 3050 रुपये प्रति क्विंटल था। ऐसे में 5000 रुपये का मुआवजा कोई ज्यादा बड़ी मांग नहीं थी। तब बाजार में 4500 रुपये क्विंटल के हिसाब से सोयाबीन बिक रही थी। सत्ता की गोद में बैठे कलेक्टर ने तो पहले नुकसान मानने से ही मना कर दिया। किसानों को नियमों का पाठ पढ़ाने लगे। फिर भी किसान विनती करते रहे। मिन्नतों के बाद कलेक्टर ने 400 रुपये प्रति एकड़ के हर्जाने का प्रस्ताव रखा। किसान समझ चुके थे कि कलेक्टर साहब उनकी नियती का मजाक उड़ा रहे हैं। किसानों ने अपने हक के लिए मुलताई तहसील के बाहर धरना शुरू कर दिया। 

12 जनवरी दोपहर करीब एक बजे से मुलताई तहसील के बाहर धरना शुरू हो गया। इसी बीच किसानों के बीच से किसी ने तहसील में तैनात पुलिसवालों पर पथराव कर दिया। कहा जाता है कि धरना खत्म कराने के लिए कांग्रेस ने यह पथराव कराया था। पथराव होते ही सीआरपीएफ को गोली चलाने का हुक्म दे दिया गया। प्रोटोकॉल के तहत कोई चेतावनी नहीं दी गई। लाठीचार्ज नहीं किया गया। हवाई फायरिंग नहीं हुई। सीधे किसानों के सीने की तरफ थ्री नॉट थ्री की नाल करके फायर झोंक दिया। 

राजनीति से बेखबर कुछ बच्चे क्रिकेट खेलकर लौट रहे थे। वे भी घायल हो गए। एक बच्चे की गोली लगने से मौत भी हो गई। 23 किसान भी गोली लगने से मारे गए। भीड़ ने फायर ब्रिगेड के एक कर्मचारी की जान ले ली। सरकार ने कहा, पहली बार में 88 गोलियां और दूसरी बार में 46 गोलियां चलाई गईं। लेकिन, चश्मदीद कहते हैं कि 2 हजार से ज्यादा गोलियां चलीं। सरकार केवल 18 किसानों और एक फायर ब्रिगेड कर्मचारी की बात कहती है। 250 किसानों पर 67 से ज्यादा केस लादे गए।

जुल्म-ओ-सितम का ये दौर यहीं पर नहीं ठहरा। कई किसान गोली लगने से घायल हुए थे। भगदड़ में भी उन्हें चोट आई थी। फायरिंग के बाद हुई पुलिस की पिटाई से भी जख्मी थे। ऐसे सभी घायल आसपास के अस्पतालों, क्लिनिकों और डॉक्टरों के यहां इलाज कराने पहुंचे। कहते हैं कि पुलिसवाले अस्पतालों में पहुंचे। जख्मों पर बूट रगड़ कर यातना देने लगे। अस्पतालों के बेड में हाथ-पैर बांधकर घायल किसानों को पीटा गया। दवा तो छोड़िए पीने के लिए पानी भी नहीं दिया। थाने में खून से लथपथ बैठी एक महिला और 8 साल के बच्चे की तस्वीर ने हर आंख नम कर दी थी। 

जुल्म की इस इंतहा पर पूरा देश रो उठा। किसानों के मसीहा महेंद्र टिकैत मुजफ्फरनगर में खामोश बैठे थे। मुलताई में उस साल 60 किसानों ने आत्महत्या की थी। उन्होंने सोयाबीन की फसल उगाई थी। एक सांसद ने इनकी आत्महत्या का मुद्दा संसद में उठाया था। इस केस में अब तक 3 लोगों को कोर्ट ने सजा सुनाई है, लेकिन इनमें से एक भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी नहीं है। 

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