तारीख थी 4 फरवरी 1948। गांधी जी की हत्या के बाद पूरे देश में मातम पसरा था। Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) को सीधे तौर पर जिम्मेदार माना जा रहा था। छोटे से बड़े तक हर कोई देशद्रोही, आतंकी संगठन का तमगा दे रहा था। कांग्रेस की सरकार थी। माहौल भुनाने में सरकार ने तनिक भी देर न की। #सरदार वल्लभ भाई पटेल गृह मंत्री थे। उन्होंने #संघ को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया। करीब 18 महीने तक संघ पर प्रतिबंध लगा रहा। 11 जुलाई 1949 को प्रतिबंध हटाया गया। संघ प्रमुख माधवराव सदाशिव गोलवलकर के प्रयास से प्रतिबंध हटाया गया था।
1984 चुनाव तक #कांग्रेस का देश में लगभग एकछत्र राज्य था। पार्टी के खिलाफ किसी का बोलना लगभग देशद्रोह के बराबर था। 1984 में इंदिरा गांधी की उनके सिख सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। देश पूरी तरह से उबल उठा। कहते हैं कि नाई की दुकानों में उस वक्त दाढ़ी और बाल कटवाने के लिए लाइन लगने लगी थी।
बात 1984 की करूं, इससे पहले साल 1980 का जिक्र जरूरी है। तब जनसंघ में फूट पड़ गई थी। #बीजेपी (BJP) का उदय हुआ। पार्टी की कमान अटल बिहारी वाजपेयी ने संभाली। 1984 में इंदिरा की हत्या के बाद देश में कांग्रेस के पक्ष में तेज लहर थी। राजीव गांधी प्रधानमंत्री चेहरा थे। लेकिन, बीजेपी और जनसंघ से अलग हुए नेता उनकी टेंशन बढ़ा रहे थे। राजीव समेत कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं को डर था कि इस माहौल में भी अगर कम सीटें आईं तो इंदिरा की ब्रांडिंग पर असर पड़ेगा। जिस कांग्रेस ने 1949 में आरएसएस को प्रतिबंधित संगठन घोषित किया था, उसी के प्रमुख नेता नागपुर की परेड करने लगे।
1984 के लोकसभा चुनाव में #आरएसएस ने बीजेपी को समर्थन नहीं दिया। नानाजी देशमुख के काफी करीबी थे अटल बिहारी वाजपेयी। नानाजी ने अपने ग्राम प्रवास के दौरान कहा था कि हिंदुओं का धर्म बनता है कि इंदिरा गांधी यानी कांग्रेस के पक्ष में मतदान करें। नानाजी की इतनी सी बात पर आरएसएस कार्यकर्ताओं ने पूरी ताकत झोंककर कांग्रेस का प्रचार किया। 542 सीटों के लिए चुनाव हुआ था। कांग्रेस को 401 सीटें मिलीं। बीजेपी को सिर्फ 2 सीटें मिलीं। ग्वालियर से अटल जी भी चुनाव हार गए थे।
आरएसएस वही प्रतिबंधित संगठन है, जिसके 1962 में हुए युद्ध के सेवाभाव को कभी भुलाया नहीं जा सकता। सेना की मदद के लिए पूरे देश से स्वयंसेवक सीमा पर पहुंचे थे। सैन्य मार्गों की चौकसी, प्रशासनिक मदद, रसद आपूर्ति में ऐसा कार्य किया कि जवाहर लाल नेहरू भी तारीफों के पुल बांध दिए।
संघ के इन्हीं कार्यों की वजह से नेहरू ने 1963 में 26 जनवरी की परेड में मात्र 2 दिन पहले स्वयंसेवकों के शामिल होने का न्योता दिया। मात्र 2 दिन में 3500 से ज्यादा स्वयंसेवक गणवेश में परेड में शामिल हुए थे। तब नेहरू जी का बयान था- यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है। इसी वजह से विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।
#प्रदीप

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