1962 चीन युद्ध में हमारी हार के दोषी...

महेश मांजरेकर निर्देशित वेब सीरीज 1962: The war in the hills हॉटस्टार पर हाल ही में रीलीज हुई है। सीरीज की पृष्ठभूमि जितनी मजबूत है, उतना ही हल्का निर्देशन है। पात्रों का कमजोर अभिनय, बेवजह के सीन, उच्च पदों पर बैठे जिम्मेदारों का सटीक चित्रण न होना, हल्के डायलॉग और खराब एडिटिंग से नींद की पूरी खुराक देने का प्रयास किया गया है। खैर, सिनेमा का अपना-अपना टेस्ट होता है। बात करते हैं 1962 के चीन युद्ध की। 

प्रधानमंत्री थे चाचा नेहरू। रक्षा मंत्री की कुर्सी पर कृष्ण मेनन थे। आगे बढ़ने से पहले प्रख्यात पत्रकार खुशवंत सिंह की चर्चित किताब Truth, Love & a Little Malice के एक हिस्से का जिक्र जरूरी है। मेनन जब यूके में भारत के उच्चायुक्त थे, तब खुशवंत सिंह उनके जनसंपर्क अधिकारी हुआ करते थे। खुशवंत सिंह ने किताब में लिखा है कि ‘मेनन एक बदमिजाज और नाकाम बैरिस्टर थे। पंडित नेहरू जब भी ब्रिटेन आते, मेनन उनकी जी-हजूरी में लगे रहते। वे पैदायशी झूठे इनसान थे। उनकी नजर हमेशा सुंदर महिलाओं पर रहती थी। उच्चायोग में उनके कई महिलाओं से संबंध थे।’

मेनन के बारे में ‘विवादित किताब’ Reminiscences of the Nehru age में भी लिखा गया है। चाचा नेहरू के सचिव रहे एमओ मथाई ने ये किताब लिखी है। (खैर मैंने ये किताब  अभी पूरी नहीं पढ़ी है)। मथाई लिखे हैं कि ‘अक्टूबर 1951 में नेहरू जी ने लंदन में मेनन के बारे में जांच करने के लिए कहा था। दफ्तर में मेनन ड्रग्स के ओवरडोज में थे। आंखें नहीं खुल रहीं थीं। नेहरू के भेजे पत्र उनकी मेज में बंद हालत में ही रखे थे। मेनन के डॉक्टर हांडू ने बताया कि मेनन एक बीमार और लगभग पागल व्यक्ति है।’ 

मथाई ने एक डॉक्टर के हवाले से यौन रोगी होने का भी दावा किया है। मथाई ने लिखा है कि नेहरू को जब यह रिपोर्ट दी तो उन्होंने कहा, 1952 (करीब एक साल बाद) में जब आम चुनाव होगा तब नई सरकार में शामिल करने के बहाने उन्हें (मेनन) भारत बुला लेंगे। हालांकि चीन से हार के बाद नेहरू जी ने यह भी कहा था कि मेनन के खिलाफ मुझे पहले ही कार्रवाई करनी चाहिए थी। 

अगस्त 1959 में जनरल केएस थिमैया और तत्कालीन रक्षा मंत्री मेनन के बीच का विवाद सुर्खियों में रहा था। मेनन 12 अधिकारियों की वरिष्ठता को दरकिनार कर लेफ्टिनेंट जनरल बीएम कौल की पोष्टिंग करना चाहते थे। कौल को पूर्वोत्तर के पूरे युद्ध क्षेत्र का कमांडर बनाना चाहते थे। पूर्वोत्तर फ्रंटियर ही आज का अरुणाचल प्रदेश है। कौल को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी का बेहद करीबी माना जाता था। सेना प्रमुख रह चुके पीएन थापर भी मेनन के फैसले के खिलाफ थे, लेकिन टकराव मोल लेने से बचने के लिए वे खामोश रहे। । 

जनरल थिमैया ने राष्ट्रपति को दी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि लेफ्टिनेंट जनरल कौल को युद्ध का बिल्कुल अनुभव नहीं है। आर्मी के सर्विस कोर में ही उन्होंने अपना करियर बिताया है। ऐसे में चीन से तनातनी वाले वक्त में इन्हें पूर्वोत्तर फ्रंटियर का कमांडर बनाना आत्मघाती होगा। खैर उस रिपोर्ट को फेंक दिया गया और कौल साहब कमांडर बन गए। जब युद्ध शुरू हुआ तब कौल साहब मेडिकल लीव पर दिल्ली आ गए। मेनन ने दिल्ली से ही कौल को युद्ध की कमान संभालने का हुक्म दिया था। 

चीन से हार के बाद जनरल थिमैया नेहरू जी से मिलने गए। सेना के आदर्श आचरण के तहत उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की। नेहरू जी ने फौरन लिखित में इस्तीफा देने का आदेश दिया। थापर के इसी इस्तीफे की कॉपी को संसद में लहराकर नेहरू जी ने उस वक्त भड़के सांसदों का गुस्सा शांत करने की कोशिश की थी। लेकिन, मेनन को भी कुर्सी से हटाने की आवाज उठ रही थी। नेहरू जी ने बेहद दबाव के बीच मेनन को रक्षा मंत्रालय से हटाकर रक्षा उत्पादन मंत्रालय का जिम्मा सौंप दिया। देश का पहला रक्षा घोटाला भी इन्हीं के समय हुआ था, जीप घोटाले के नाम से उसे जाना जाता है। इसकी फाइल बाद में बंद करवा दी गई थी।

कहा तो यह भी जाता है कि नेहरू जी मेनन का इस्तीफा स्वीकार नहीं कर रहे थे। तब इंदिरा गांधी राष्ट्रपति राधाकृष्णन के पास गईं। राष्ट्रपति के कहने पर नेहरू जी ने इस्तीफा आगे बढ़ाया था। 2014 में कांग्रेस नेता जयराम रमेश का एक लेख छपा था। संपादकीय पेज पर छपा लेख काफी चर्चा में रहा था। उन्होंने ही यह बात लिखी थी। जयराम रमेश ने लिखा था कि भारत में प्रधानमंत्री की अनुशंसा पर राष्ट्रपति किसी मंत्री का इस्तीफा स्वीकार करते हैं। लेकिन, इतिहास में यह पहला मौका था जब राष्ट्रपति ने नेहरू जी को इस संबंध में निर्देश दिए थे। 

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