करीब साढ़े 3 लाख अफगान पुलिस और सैन्य बलों को मुट्ठी भर तालिबानी लड़ाकों ने पछाड़ दिया। 17 प्रांतीय शहरों पर तालिबान (Taliban) ने महज 120 घंटे में कब्जा कर लिया था। करीब साढ़े 3 महीने में पूरे देश ने घुटने टेक दिए। कई जगह तो अफगान नैशनल आर्मी (Afghan National Army) ने हथियार ही नहीं उठाया। 50 से 80 हजार के बीच तालिबानी लड़ाके जीत का जश्न मनाने काबुल (Kabul) आ गए। अफगानिस्तान की हार के 5 बड़े कारण...
1. सेना में भ्रष्टाचार
तालिबान की जीत की सबसे बड़ी वजह भ्रष्टाचार रहा। पुलिस से लेकर सेना तक हर स्तर पर भ्रष्टाचार था। सैन्य बलों की भर्ती को अवैध कमाई का जरिया बना लिया गया। अफगानिस्तान राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशालय के पूर्व प्रमुख रहमतुल्ला नबील ने एक रिपोर्ट में कहा कि सैन्य बलों में घोस्ट सैनिकों आ गए थे।
घोस्ट सैनिक मतलब जो केवल कागजों में थे। अफसर इनका वेतन जेब में रखते थे। कुछ जगह तो दावा किया गया कि 1000 में करीब 200 ही सैनिक थे, बाकी सब कागजों में चल रहा था। 2019 में ही अफगान राष्ट्रीय सुरक्षा बल में ऐसे 42 हजार फर्ज़ी सैनिकों का पता चला था।
2. अक्षम नेतृत्व
तालिबान को सत्ता से बेदखल हुए करीब 20 साल बीत चुके थे। अफगानिस्तान के लिए अमेरिका, भारत समेत तमाम देश दिल खोलकर मदद कर रहे थे। 20 साल में अमेरिका ने अफगान सेना की ट्रेनिंग और हथियार पर करीब 83 अरब डॉलर खर्च किए।
आंकड़े समझने में दिक्कत हो तो बस इतना जान लीजिए कि यह रकम हमारे सालभर के रक्षा बजट से अधिक है। भारत ने भी करीब 22 हजार करोड़ रुपये का निवेश किया। अफसरों और सैनिकों को ट्रेनिंग भी दी। अफगान सरकार को इतने वर्ष का मौका मिला, लेकिन तालिबान को खत्म करने का ठोस प्रयास नहीं किया।
सत्ता से बेदखल होने के बाद तालिबान ने अफगान के दक्षिण में पश्तूनों के बीच खुद को मजबूत किया। ताजिक और उज्बेक की तरफ उसने उत्तर की तरफ अपने कदम बढ़ाए। यही वजह रही कि अफगानिस्तान के ज्यादातर समूहों के बीच धीरे-धीरे उसने अपनी पहुंच मजबूत कर ली।
3. सरकार और अफसरशाही में सेंध
20 वर्षों के वनवास में तालिबान शांत नहीं बैठा। जमीनी स्तर पर खुद की पहुंच आम लोगों तक लगातार बढ़ाता रहा। इसके साथ ही उसने सरकार और अफसरशाही में भी सेंध लगानी शुरू की। सरकार के कई मंत्रियों के रूप में तालिबान ने अपने नुमाइंदों को बैठा दिया। कई अहम पदों तक भी तालिबानी पहुंच गए।
कांधार फतेह के दौरान यही नेता तालिबान के मददगार बने। उन्होंने सैनिकों को हथियार उठाने से मना कर दिया। कंधार के गवर्नर रोहुल्लाह खानजादा ने भी इसकी पुष्टि की। कांधार अफगानिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। इसके हाथ से निकलने के बाद तीसरे सबसे बड़े शहर हेरात का भी यही हाल हुआ।
दो बड़े शहरों पर फतेह पाने के बाद अगली राह आसान हो गई। अफगान सेना में शामिल तालिबानी मददगार अफवाहों का बाजार गर्म करने लगे। जो चंद सैनिक देशभक्ति की भावना के साथ खड़े थे, उनका मनोबल टूट गया। काबूल जीतने से पहले इसी अफवाह ने बची कसर पूरी कर दी। सैनिकों ने बगैर लड़े ही हथियार डाल दिया।
4. अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता
अमेरिका और तालिबान के बीच फरवरी 2020 में हुए समझौते के बाद 5000 तालिबानी लड़ाकों को अफगानिस्तान की जेलों से रिहा कर दिया गया। दूसरी तरफ अमेरिकी सैनिकों की घर वापसी होने लगी। तालिबान के पक्ष में लश्कर-ए-तैयबा (Lashkar-e-Taiba) और जैश-ए-मोहम्मद (Jaish-e-Mohammed) जैसे आतंकी संगठन भी आ गए।
अमेरिकी सैनिकों की घर वापसी की सूचना के बाद से ही अफगान सेना में भी हलचल मच गई। सैनिक नौकरी छोड़ने लगे। इन्हें रोकने का प्रयास नहीं किया गया। अमेरिकी सेना की घर वापसी और सैनिकों के नौकरी छोड़ने की वजह से अफ़गान राष्ट्रीय सुरक्षा बल कमजोर हो गया। दूसरी तरफ जेल में बंद लड़ाकों के छूटने और आतंकी संगठनों की मदद से तालिबान मजबूत होता गया।
5. पाकिस्तान और चीन की मदद
तालिबान की ताकत बढ़ाने में अफगानिस्तान के पड़ोसी देश पाकिस्तान का मजबूत हाथ रहा। चीन ने भी पर्दे के पीछे से सपोर्ट किया। चीन का ख्वाब है कि पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) को अफगानिस्तान तक बढ़ाया जाए। अफगानिस्तान में जब भारत मजबूती से खड़ा था तो यह चाल कामयाब नहीं हो रही थी।
अमेरिकी फौज ने घर वापसी की घोषणा की तो चीन खुश हो गया। पाकिस्तान को आगे कर वह अपना हित साधने लगा। चीन चाहता है कि वन बेल्ट वन रोड (One Belt One Road) परियोजना का दायरा अफगानिस्तान तक बढ़ जाए। पेशावर और काबुल के एक राजमार्ग से जोड़ने का उसका प्लान है। अफगानिस्तान को बड़े बाजार के रूप में चीन देख रहा था। बस इसी चाहत में तालिबान को पाकिस्तान के जरिए जमकर फंडिंग की। पाकिस्तान की सेना से तालिबानी लड़ाकों को प्रशिक्षित कराया और हथियार भी दिए।

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