60 करोड़ का घोटाला था, जांच में खर्च हो गए 250 करोड़ रुपये

24 मार्च 1986 का दिन था। थल सेना के लिए 155mm की 400 होवित्जर (Bofors Scandal) तोप का एक सौदा हुआ था। राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) प्रधानमंत्री थे। ठीक 23 दिन बाद स्वीडिश रेडियो ने खुलासा किया कि इस सौदे में 60 करोड़ रुपये का घूस दिया गया है। अब उस वक्त के 60 करोड़ रुपये को ऐसे समझिए... मेरे पापा को तब 280 रुपये तनख्वाह मिलती थी। पिछले साल रिटायर हुए तो उनकी सैलरी 78,965 रुपये थी। मतलब आज के हिसाब से देखा जाए तो करीब 17 हजार करोड़ रुपये का घोटाला।

राजीव सरकार में मंत्री थे हमारे यहां के राजा मांडा वीपी सिंह। उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। विरोध यहीं खत्म नहीं हुआ, वीपी सिंह ने कांग्रेस भी छोड़ दी। घोटाला इतना बड़ा था कि हर तरफ विरोध के स्वर उठने लगे। 415 सीटें जीतकर प्रधानमंत्री बनने वाले राजीव गांधी अगला चुनाव हार चुके थे। तब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। 

सीबीआई ने कई लोगों को आरोपित बनाया। राजीव गांधी का नाम भी इसमें शामिल था। करीब डेढ़ साल बाद लिट्टे के आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की मौत हो गई। फिर उनका नाम इस केस से हटा लिया गया। ऐसा नहीं कि वे बेदाग साबित हुए। हमारे संविधान में मृत व्यक्ति पर केस चलाने का नियम नहीं है। साल 2011 में सीबीआई की विशेष कोर्ट की टिप्पणी से पता चला कि इस केस की जांच में 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे। पूरे घोटाले में किसी को सजा नहीं हुई। 60 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच में 250 करोड़ रुपये और बर्बाद कर दिए गए। 

मुलायम सिंह यादव 1996 से 98 के बीच रक्षा मंत्री थे। बाद में उन्होंने लखनऊ में एक बयान दिया था... ‘जब मैंने बोफोर्स तोप को देखा तो वे ठीक से काम कर रही थीं। उस वक्त मेरे मन में पहला विचार यह आया कि राजीव गांधी ने बढ़िया काम किया है। इसलिए मैंने बोफोर्स घोटाले से जुड़ी फाइलों को गायब करवा दिया।’

राजीव गांधी की पढ़ाई और राजनीतिक सफर

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की तरह राजीव गांधी की शिक्षा पर भी विवाद है। देहरादून के वेल्हम स्कूल में पढ़ने गए थे। लेकिन, कुछ दिनों बाद ही हिमालय की तलहटी में बने दून स्कूल भेज दिया गया। यहां से निकले तो कैंब्रिज के ट्रिनिट कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन, कुछ दिन बाद ही लंदन के इंपीरियल कॉलेज पहुंच गए। वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। लेकिन, फेल होने की वजह से कोर्स पूरा नहीं कर सके। 

1966 में राजीव गांधी जब भारत लौटे तो उनकी मां इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बन चुकी थीं। लेकिन, राजीव को राजनीति में रुचि नहीं थी। उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय एवं आधुनिक संगीत पसंद था। फोटोग्राफी और रेडियो सुनने का भी शौक था। हवाई जहाज उड़ाने का उन पर जुनून सवार था। पायलट की ट्रेनिंग लेने के बाद 1970 में इंडियन एयरलाइंस (सरकारी कंपनी) में पायलट बन गए। भाई संजय गांधी और मां इंदिरा गांधी की मौत के बाद मजबूरी में उन्हें राजनीति में आना पड़ा। 

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