मोपला विद्रोह... जब महिलाओं, बच्चों के शव से पट गए थे कुएं

अंग्रेजों की गिरफ्त में मोपला विद्रोही
केरल में मोपला विद्रोह (Mopla vidroh) पर बहस काफी गर्म है। लेकिन, हिंदीभाषी इलाकों में यह मसला दब गया। भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (Indian Council of Historical Research) ने एक रिपोर्ट में मालाबार विद्रोहियों (Malabar rebellion) को शहीदों की सूची से हटाने की सिफारिश की है।


साल था 1921... मालाबार इलाका सांप्रदायिक दंगे की आग में जल रहा था। वयस्क ही नहीं, महिलाओं और बच्चों को भी मौत के घाट उतारा गया था। कहते हैं कि नरसंहार में कई कुएं शवों से पाट दिए गए थे। 300 से ज्यादा मंदिर जमींदोज हो गए थे। हजारों घरों को आग के हवाले कर दिया गया। जमींदारों के खिलाफ ये विद्रोह था। जमींदार नंबूदिरी ब्राह्मण थे। 


मोपला विद्रोह का कारण

मोपला मालाबार तट के मुस्लिम किसान थे। करीब 32 पर्सेंट आबादी मोपला की थी। अंग्रेज एक काश्तकारी कानून लाए थे। यह कानून जमींदारों के पक्ष में था। मोपला की हालत पहले से दयनीय थी। नए कानून में अधिक लगान और नजराना देना था। विद्रोह की चिंगारी यहीं से उठी, लेकिन तथाकथित मुस्लिम धर्मगुरुओं ने उसे शोला बना दिया। 


मुस्लिम धर्मगुरु छोटी-छोटी सभाएं करने लगे। उग्र भाषण का दौर चलता। जमींदारों से मोर्चा लेने के लिए छापेमारी युद्ध का प्रशिक्षण भी दिलाया। एक कानून के खिलाफ जो चिंगारी उठी थी, उग्र भाषणों ने उसे शोला बना दिया। कई हिंदुओं का धर्म परिवर्तन भी कराया गया।  


जमींदारों के घरों पर मोपला के हमले शुरू हो गए। हजारों घर जला दिए गए। जो मिला, उसकी हत्या कर दी। महिलाओं से बलात्कार हुआ। बच्चों को भी नहीं छोड़ा। कुछ किताबों में तो यहां तक दावा किया गया कि ब्राह्मण जमींदारों के कुएं शवों से भर गए थे। 10 हजार से ज्यादा पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का कत्ल किया गया। 300 से ज्यादा मंदिर तोड़ दिए गए। हिंदुओं के घर वीरान हो गए थे। 


महात्मा गांधी और कांग्रेस ने किया था समर्थन, बाद में हुए थे दूर

मोपला आंदोलन शुरू में बिल्कुल सांप्रदायिक या राजनीतिक नहीं था। किसान अंग्रेजों के काले कानून का विरोध कर रहे थे। इसी वजह से महात्मा गांधी और कांग्रेस ने मोपला का समर्थन किया था। मोपला जब हिंदुओं के घर जलाने लगे, हत्या, बलात्कार और लूट में जुट गए तब कांग्रेस और महात्मा गांधी इनसे दूर हो गए।  


मालाबार स्पेशल फोर्स ने किया था दमन का अंत

कुंजाहम्मद हाजी और अली मुसलीयर (बाएं से)
फरवरी में शुरू हुआ मोपला का खूनी खेल करीब 11 महीने तक चला। कहा जाता है कि 11 महीनों में ये मानवता की सारी सीमाएं लांघ गए। गांधी जी और बड़े नेता आंदोलन से दूर हुए तो अंग्रेजों ने इसे उतनी ही बर्बरता से कुचला। 


दंगाइयों से निपटने के लिए विशेष बटालियन मालाबार स्पेशल फोर्स का गठन किया गया था। 387 मोपला विद्रोहियों को मौत के घाट उतारा गया। अली मुसलीयर,  वरियामकुननाथ कुंजाहम्मद हाजी इस आंदोलन के बड़े नेता थे। अंग्रेजों ने 20 जनवरी, 1922 को गोली मारकर हाजी की हत्या कर दी थी। 


इस हाल में बोगी में भरे गए थे विद्रोही
क्रूरतम हत्याओं में दर्ज है वैगन ट्रैजडी (Wagon Tragedy) 

मोपला विद्रोह के कई कैदियों को तिरूर जेल में रखा गया था। नवंबर 1921 में ऐसे ही कुछ कैदियों को तिरूर से पोदनूर केंद्रीय कारागार में भेजने का फैसला हुआ। इनकी बर्बरता से अंग्रेज भी वाकिफ थे। अंग्रेजों ने वैसा ही बर्बर व्यवहार इनके साथ किया। माल गाड़ी के डिब्बे में इन्हें बंद कर पोदनूर ले जाया जा रहा था। दम घुटने से 70 कैदियों की मौत हो गई थी। जो बचे थे, वे यूरिन पीकर पोदनूर तक पहुंचे थे।


राम माधव (Ram Madhav) ने फिर गर्म किया मुद्दा

19 अगस्त को कोझिकोड में एक कार्यक्रम में बीजेपी नेता राम माधव शामिल हुए थे। उन्होंने कहा था कि 1921 में मालाबार विद्रोह को दंगों के रूप में जाना जाता है। देश में तालिबानी मानसिकता की यह पहली अभिव्यक्ति थी। 


आईसीएचआर ने कौन सी किताब से तथ्य हटाने की सिफारिश की

पीएम नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने साल 2019 में शहीदों को याद रखने के लिए एक किताब जारी की थी। किताब का नाम है डिक्शनरी ऑफः इंडियाज फ्रीडम स्ट्रगल 1857-1947 (Dictionary of Martyrs India's Freedom Struggle 1857-1947). इसी किताब के 5वें हिस्से की प्रविष्टियों की आईसीएचआर ने समीक्षा की है। 


आईसीएचआर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस विद्रोह में शामिल 387 लोगों के नाम किताब से हटाने चाहिए। इन्होंने अंग्रेजों के विद्रोह की आड़ में हिंदुओं का नरसंहार किया था। विद्रोह के प्रमुख नेता हाजी को कुख्यात मोपला विद्रोही और कट्टर अपराधी बताया गया है।


क्या है आईसीएचआर

आईसीएचआर 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय का एक स्वायत्त निकाय है। 1972 में सोसायटी पंजीकरण अधिनियम- 1860 के तहत इसकी स्थापनी हुई थी। यह फेलोशिप, अनुदान और संगोष्ठी के माध्यम से इतिहासकारों और विद्वानों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।


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