अफगान तालिबान युद्ध (Afghan Taliban war) की खबरों के बीच इस टॉपिक पर लिखना थोड़ा अटपटा लग रहा है। लेकिन, आपसे वादा किया था तो कैसे मुकरता। देरी महज इसलिए हुई कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) का 20 अगस्त को जन्मदिन था। अब जन्मदिन या उससे पहले ऐसी पोस्ट लिखना कत्तई सही नहीं था। नि:संदेह वे महान नेता थे। उनके योगदान को हम कभी नहीं भूल सकते। अगली पोस्ट में उन पर भी लिखूंगा। लोकतंत्र की तो यही खूबसूरती है... अच्छी चीज के जिक्र के साथ गलत फैसलों पर भी चर्चा होनी चाहिए।
बहादुर शाहबानो कोर्ट गईं। निचली अदालत ने 25 रुपये महीने का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। 6 लोगों का पेट पालने के लिए सिर्फ 25 रुपये बहुत कम थे। केस हाई कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट ने गुजारा भत्ता 179 रुपये महीना कर दिया।
वकील साहब को 179 रुपये बहुत ज्यादा लगे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। अब तक यह केस (Mohd. Ahmed Khan v. Shah Bano Begum) चर्चा में आ चुका था। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी वकील साहब के साथ खड़ा था। मुस्लिम गुरु भी शाहबानो का विरोध करने लगे। संविधान और मुस्लिम पर्सनल लॉ के बीच टकराव की स्थिति बन गई। सर्वोच्च न्यायालय ने केस को 5 जजों की खंडपीठ में भेज दिया।
जस्टिस चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसला
लंबी बहस के बाद 23 अप्रैल 1985 को फैसला आया। जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया। वकील साहब को अब 500 रुपये महीने का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। विवाद यहीं से शुरू हुआ।
सर्वोच्च न्यायालय का जब फैसला आया, तब 10 सीटों पर लोकसभा के उपचुनाव चल रहे थे। इसमें राजीव गांधी को करारी शिकस्त मिली। लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी 414 सीटें जीते थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मतदाताओं ने कांग्रेस पर जमकर प्यार उड़ेला था।
आंध्र प्रदेश की तेलगू देशम पार्टी महज 30 सीट जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। उपचुनाव में मिली हार से राजीव गांधी का आत्मविश्वास हिल गया। उनके सलाहकारों ने इस हार का दोष शाहबानो केस पर मढ़ दिया। राजीव गांधी कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए तैयार हो गए। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और दूसरे दबाव भी उन पर थे।
एक अफसर ने राजीव गांधी को किया था आगाह
राजीव गांधी की सरकार में आरडी प्रधान केंद्रीय गृह सचिव थे। उनकी एक किताब है Working With Rajiv Gandhi. नई किताब तो करीब 8 हजार रुपये की है, लेकिन सरकारी पुस्तकालयों और विश्वविद्यालयों में यह मिल जाएगी।प्रधान ने लिखा है कि राजीव गांधी पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ पदाधिकारियों, पार्टी के कुछ नेताओं और मौलवियों की बातों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। राजीव गांधी ने प्रधान से कहा कि आप शायद भूल रहे हैं कि मैं एक पॉलिटिशियन भी हूं। फिर उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधान से बातचीत ही बंद कर दी।
राजीव सरकार को ले डूबा विधेयक
आरडी प्रधान और दूसरे अफसरों की राय को दरकिनार कर राजीव गांधी ने मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) विधेयक 1986 लोकसभा में लेकर आ गए। चूंकि लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस भारी बहुमत में थी। ऐसे में 25 फरवरी को जबरदस्त विरोध के बाद भी यह पास हो गया। मई के आसपास राज्यसभा से पास होकर कानून बन गया।
क्या था नया कानून
नए कानून के मुताबिक, गुजारा भत्ता के लिए मुस्लिम महिलाएं कोर्ट नहीं जा सकती। उनका यह अधिकार खत्म हो गया। तलाक के बाद केवल इद्दत मतलब 3 महीने तक ही गुजारा भत्ता मिलेगा। इसके बाद शौहर पर किसी भी भत्ते के लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता है।
विपक्ष के निशाने पर आए राजीव गांधी
कानूनी चश्मे से अगर देखा जाए तो संविधान के अनुच्छेद 44 का भी यह कानून विरोध करता था। अनुच्छेद 44 देश में एक समान नागरिक संहिता की वकालत करता है। विपक्ष ने इन तमाम मुद्दों को खूब भुनाया। हिंदुत्व छवि के नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, उमा भारती, अशोक सिंघल के भाषण राजीव गांधी के लिए जहर बन गए।
414 सीटें जीतकर सत्ता में आई कांग्रेस इसके बाद हुए चुनाव में महज 197 सीटों पर सिमट गई। हालांकि तब भी यह सबसे बड़ी पार्टी थी। लेकिन, 5 दलों को मिलकर बने नैशनल फ्रंट ने वीपी सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई। यही सरकार थी, जब कम्युनिस्ट और भाजपा भी एक छत के नीचे थे। बीजेपी भले सरकार में नहीं थी, लेकिन बाहर रहकर इस सरकार को सपोर्ट किया था।
बाद में नरेंद्र मोदी सरकार ने राजीव गांधी की इसी गलती को सुधारा। मुस्लिम महिलाओं को कानूनी हथियार दिया। अमानवीय 3 तलाक को कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में खड़ा किया। अफसोस, एक काले कानून को दुरुस्त होने में कई दशक बीत गए। केस जीत चुकी शाहबानो एक नेता की गलती की वजह से हार गई थीं। शाहबानो का केस मुस्लिम महिलाओं के लिए कवच बनता, लेकिन राजीव सरकार के काले कानून ने उनकी जिंदगी नर्क बना दी थी।
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