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| वकील आभा सिंह के साथ हाई कोर्ट से मुआवजा पाने वालीं लाभार्थी |
तस्वीर मुंबई हाई कोर्ट (HIGH COURT OF BOMBAY) की वकील और ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट (human rights activist) आभा सिंह (Abha Singh) ने लिंक्डइन (linkedin) पर शेयर की है। बताया कि कैसे वकील ईसा सिंह (Isha Singh) इन महिलाओं की आवाज बनीं। कोर्ट के सामने जमीनी हकीकत दिखाई। कोर्ट तक आवाज पहुंची कि माईलॉर्ड किस तरह से प्रोहिबिशन ऑफ इम्पालॉयमेंट मैन्युअल एक्साकावेंजिंग एंड रिहैबिलिटेशन एक्ट 2013 मतलब सिर पर मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध से जुड़े कानून का मजाक बनाया जा रहा है।
खंडपीठ ने महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra Government) से कहा कि पता लगाकर बताया जाए कि कानून बनने के बाद क्या सिर पर अब भी मैला ढोया जा रहा? इस काम से जुड़े लोगों के पुनर्वास के लिए क्या किया? 1993 से अब तक इस काम से जुड़े कितने लोगों की मौत हुई? क्या सरकार ने ऐसे लोगों के परिवार को मुआवजा दिया? 18 अक्टूबर तक सरकार को जवाब देना है। गोवंडी थाना एरिया की एक सोसायटी में सेप्टिक टैंक साफ करते हुए तीनों महिलाओं के पति की मौत हुई थी। कोर्ट ने गोवंडी थाना पुलिस से भी एफआईआर की स्थिति के बारे में बताने को कहा है।
महाराष्ट्र से हैं केंद्र के जिम्मेदार विभाग के मंत्री
मैला ढोने वालों के पुनर्वास, मुआवजे, आर्थिक मदद आदि की जिम्मेदारी सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (Ministry of Social Justice and Empowerment) की है। इस विभाग के राज्यमंत्री रामदास आठवले (Ramdas Athawale) महाराष्ट्र से ही हैं। आठवले राज्यसभा सांसद हैं।
महज 80 करोड़ रुपये का है बजट (Budget for manual scavengers rehabilitation)
लोकसभा की वेबसाइट (http://loksabhaph.nic.in/) पर 20 सितंबर 2020 को मंत्री आठवले की ओर से पेश की गई एक रिपोर्ट मिली। 2020-21 में मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए 110 करोड़ रुपये का फंड रखा गया था। लेकिन, 15.09.2020 तक एक रुपये भी इसमें से जारी नहीं किया गया। 2019-20 में भी इतना ही फंड था, लेकिन 84.80 करोड़ रुपये ही जारी हुए। इस साल इस बजट में 30 करोड़ रुपये कम कर दिए गए हैं।
स्वरोजगार योजना के तहत होता है पुनर्वास
मैला ढोने वालों के पुनर्वास का कार्य स्वरोजगार योजना (SRMS) के तहत होता है। इसे लागू कराने का जिम्मा नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन (NSKFDC) को दिया गया है। लेकिन, बजट इतना कम है कि पुनर्वास का कार्य लगभग अधिकतर राज्यों में हो ही नहीं पाता।
6 साल में 3 गुना बढ़ गए मैला ढोने वाले
एनएसकेएफडीसी ने 2018-19 में एक सर्वे कराया था। उसमें 42,303 लोग मिले थे, जो मैला ढोने के काम से जुड़े थे। 14 राज्यों के 86 जिलों में इनकी पहचान हुई थी। इनमें 70 पर्सेंट महिलाएं थीं। 2013 में भी संस्था ने ऐसा ही सर्वे किया था। तब 13 राज्यों में सर्वे कराया गया था। 14505 मैला ढोने वालों की पहचान हुई थी।
बिहार समेत 4 राज्यों का दावा- कानून का हो रहा पालन
3 साल पहले की एक रिपोर्ट है। 18 राज्यों में 170 जिलों में 87913 लोगों ने पंजीकरण कराया कि वे मैला ढोते हैं। स्थानीय प्रशासन ने उनका पंजीकरण खारिज कर दिया। सरकार ने केवल 42303 लोगों को ही मैला ढोने वाला माना। बिहार, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और तेलंगाना ने दावा किया कि उनके यहां मैला ढोने वाला एक भी व्यक्ति नहीं है। बिहार में 4757, हरियाणा में 1221, जम्मू-कश्मीर में 254 और तेलंगाना में 288 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया था, जिनका फॉर्म रद्द कर दिया गया था।
पुनर्वास और मदद के लिए ये है नियम
मैला ढोने से जुड़े परिवार को 40 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जाती है। फिर 2 साल तक कौशल विकास प्रशिक्षण दिया जाता है। इस दौरान हर महीने 30 हजार रुपये की मदद भी मिलती है। स्वरोजगार के लिए सब्सिडी पर 3.25 लाख रुपये तक लोन देने का नियम है।
आर्थिक मदद दी, लेकिन प्रशिक्षण भूल गए
संसद में पेश किया गया एक आंकड़ा मिला। उसके मुताबिक, पिछले साल 15 सितंबर तक 13990 मैला ढोने वालों को 40 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी गई। लेकिन, किसी को भी कौशल विकास का प्रशिक्षण नहीं दिया गया। 30 लोगों को सब्सिडी पर लोन मिला।

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