यूपी में फिट नहीं बैठेगा पंजाब का फॉर्म्यूला

विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पंजाब (Punjab) में कांग्रेस (Congress) ने दलित सीएम की चाल चली है। अगले साल यूपी में भी विधानसभा चुनाव (Legislative Assembly elections 2022) है। दलित राजनीति का यूपी भी केंद्र रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या यहां भी दलित फॉर्म्यूला फिट होगा? 


15 मार्च 1934 का दिन था। पंजाब के रोपड़ (रूपनगर) जिले के खवासपुर गांव में दलित परिवार में एक बच्चे ने जन्म लिया था। तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि 47 साल बाद यही बच्चा यूपी की राजीनीति बदलने निकलेगा। उस 20-21 पर्सेंट दलित मतदाताओं की जुबान बनेगा, जो हर पार्टी के लिए हाशिए पर थे। वह बालक था कांशीराम। 


‘ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस4।’ कांशीराम ने 6 दिसंबर, 1981 को दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस4) का गठन कर इस नारे से चर्चा बटोरी थी। दौर 1984 का आया। बसपा अस्तित्व में आ चुकी थी। इसी दौर में कांशीराम के दूसरे नारे ‘तिलक, तराजू और तलवार,  इनको मारो जूते चार’ ने जातिगत राजनीति की तस्वीर बदल दी। सिक्का चल निकला। हाशिए पर रखा गया दलित समाज भी कांशीराम के साथ दौड़ने लगा। 


लेकिन, दौर 2007 का भी आया। अब तक 3 बार सीएम की कुर्सी संभाल चुकीं, कांशीराम की शिष्या मायावती (Mayawati) समझ चुकी थीं कि यूपी केवल दलितों के भरोसे नहीं फतेह होने वाला। ब्राह्मणों को लुभाने के लिए माया ने नारा दिया ‘पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है।’ माया की सोशल इंजीनियरिंग हिट हुई और ब्राह्मणों ने यूपी सीएम की कुर्सी पर दलित नेता की ताजपोशी कर दी। 


अब फिर 2021 का विधानसभा चुनाव है। लेकिन, मायावती 2007 के ही समीकरण पर भरोसा कर रही हैं। ब्राह्मणों को लुभाने के लिए सम्मेलन का दौर चल रहा। परसुराम का फरसा छोटे-छोटे कार्यक्रमों में दिख रहा। सपा भी इसी राह पर है।


कांशीराम-मायावती से पहले जगजीवन राम भी यूपी में दलितों के बड़े नेता रहे हैं। राजनीतिक पंडित तो कहते हैं कि जगजीवन राम ने ही यूपी की राजनीति में दलित पहचान को एक मुकाम दिया था। लेकिन, दलितों को राजनीतिक मोहरा बनाने का असल काम तो बसपा ने ही किया।


सीएसडीएस की रिपोर्ट से समझें दलित मतदाताओं की गणित

सीएसडीएस (The Centre for the Study of Developing Societies) की वेबसाइट पर एक रिपोर्ट में दलितों के वोटिंग पैटर्न (लोकसभा) को बताया गया है। 1971 के दौर में बीजेपी/जनसंघ (BJP)  को केवल 10 पर्सेंट दलित वोट मिलता था। 2014 में यह आंकड़ा 24 पर्सेंट तक पहुंच गया। बसपा को 2004 में सबसे ज्यादा 24 पर्सेंट दलित वोट मिले थे, लेकिन 2014 में यह 14 पर्सेंट पर आ गया। कांग्रेस 1971 में 46 पर्सेंट दलितों का वोट अपने खाते में रखती थी। लेकिन, 2014 में महज 19 पर्सेंट पर सिमट गई। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 24 पर्सेंट दलित वोट हासिल की, कांग्रेस 18.5 पर्सेंट पर रही, लेकिन बीएसपी (BSP) 13.9 पर्सेंट पर ठहर गई।


यूपी में दलित मतदाताओं का क्या है गुणा-भाग

पंजाब में देश की सबसे ज्यादा करीब 32 पर्सेंट दलित आबादी रहती है। लेकिन, यूपी में 40-45 पर्सेंट वोटर ओबीसी हैं। 20-21 पर्सेंट दलित मतदाता हैं। इनमें भी बड़ी संख्या जाटव की है। मतलब दलित में भी जाटव करीब 54 पर्सेंट हैं। जाटव के अलावा 66 उपजातियां हैं, जिनमें 55 का कोई ज्यादा प्रभाव नहीं हैं। इनमें मुसहर, बसोर, सपेरा, रंगरेज आदि हैं। 


अब अगर दलित को ही फोकस कर कोई चुनाव में उतरे तो महज 14 पर्सेंट जाटव का ही प्रभाव दिखेगा। जाटव के अलावा बाकी बचे 46 पर्सेंट में करीब 16 पर्सेंट पासी, 15 पर्सेंट में धोबी, कोरी और वाल्मीकि, 5 पर्सेंट में गोंड, धानुक और खटिक हैं। यूपी के 42 जिले ऐसे हैं, जहां दलित वोटर 20 पर्सेंट से ज्यादा हैं। 


पंजाब में दलित वोटर का मिजाज है अलग

पंजाब और यूपी में दलित वोटर के मिजाज में जमीन-आसमान का अंतर है। यहां का दलित वोटर कभी किसी पार्टी के साथ नहीं रहा। कांग्रेस और अकाली के बीच इनका वोट बंटता रहा है। बीएसपी ने इसमें सेंध लगाने की कोशिश जरूर की, लेकिन यूपी की तरह सफल नहीं हुई। ऐसी ही हालत आम आदमी पार्टी की भी रही है। रविदासी और वाल्मीकि यहां के 2 बड़े दलित वर्ग हैं। 


हां, चुनाव के वक्त यहां डेरों की भूमिका अहम होती है। दोआब बेल्ट में जो दलित हैं, वे पंजाब के बाकी हिस्सों से अलग हैं। ये समृद्ध हैं और अधिकतर परिवारों के लोग एनआरआई हैं। फगवाड़ा, जालंधर और लुधियाना के कुछ हिस्सों में इनका असर ज्यादा है। 

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