इस किताब के विमोचन पर जब इतना बवाल है तो सोचिए लोगों के पढ़ने के बाद क्या हाल होगा। केवल कांग्रेस ही नहीं, कई राजनीतिक दलों को मिर्ची लगने वाली है। स्याही नहीं, तेजाब से उदय माहूरकर और चिरायु पंडित ने इसे लिखा है।
किताब की शुरुआत का एक किस्सा...
साल 1956 था। ब्रिटिश के तत्कालीन प्रधानमंत्री Clement Attlee पश्चिम बंगाल के कार्यवाहक राज्यपाल जस्टिस पीबी चक्रबर्ती के मेहमान बनकर कोलकाता (तब कलकत्ता) आए थे।
चक्रबर्ती से बातचीत में एटली ने कहा था कि भारत को आज़ादी देने में ब्रिटिश पर गांधी का प्रभाव बहुत कम था। ब्रिटिश को यह कदम उठाने में दूसरे कारण जिम्मेदार थे।
एटली ने कहा था कि बोस की आज़ाद हिंद फौज (Indian National Army: INA) और दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप से लौट रहे लाखों भारतीय सैनिकों का डर था। वे चाहते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य के लिए जो युद्ध लड़ा है, उसके बदले में ब्रिटिश भारत छोड़ दें।
ब्रिटिश को डर था कि यूरोप से लौट रहे ये ब्रिटिश भारतीय सैनिक उन सैनिकों के खिलाफ बनाए गए कानून के लिए विद्रोह कर सकते हैं, जिन्होंने जर्मनी और जापान के युद्ध बंदी बनाए जाने के बाद INA जॉइन कर लिया था। एटली ने यह भी उल्लेख किया था कि 1946 में बॉम्बे (अब मुंबई) के नेवी सोल्जर्स का विद्रोह ब्रिटिश के जाने की अंतिम वजह बना था।
यहां से शुरू हुआ विवाद
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ किताब के विमोचन में मौजूद थे। दिल्ली में विमोचन का कार्यक्रम था। राजनाथ सिंह ने इसी कार्यक्रम में कहा कि सावरकर के 'दया याचिका' दायर करने को एक खास वर्ग ने गलत तरीके से फैलाया।
उन्होंने दावा किया कि सावरकर ने जेल में सजा काटते हुए अंग्रेज़ों के सामने दया याचिका महात्मा गांधी के कहने पर दाखिल की थी। राजनाथ सिंह के इस बयान पर सोशल मीडिया में बहस छिड़ गई है। कई नेता, इतिहासकार और पत्रकार इस पर टिप्पणी कर रहे हैं।
हालांकि किताब के प्राक्कथन (Foreword) में सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी बिल्कुल यही बात लिखी है। किताब के लिए उन्होंने 1 जुलाई 2021 को यह नोट लिखा था। सरसंघचालक का इस नोट के अंत में हस्ताक्षर भी है।
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