दिल्ली में क्यों रुक गया था आसिफ के घर चला बुलडोजर

अगर परिचय न दूं तो शायद यह तस्वीर सामान्य लगेगी। आगे की लाइन नहीं पढ़ेंगे। मुझसे मोहब्बत होगी तो बगैर देखे लाइक चिपकाकर आगे बढ़ जाएंगे। बहुत हुआ तो आंखें सिर्फ इस कपल का प्यार देखेंगी। धार्मिक कट्टरता तो सोच भी नहीं सकेंगे। 


आभाष नहीं हुआ होगा कि गले में भगवा गमछा डाले आसिफ खान (Asif Khan) खड़ा है। खड़े होने की जगह एक मंदिर है। जिस मांग को भर रहा वह साक्षी साहू (Sakshi Sahu) की है। मांग में किसी मजार की राख नहीं, सिंदूर है। 


आसिफ मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) के हैं। साक्षी उनकी पड़ोसी थीं। दोनों को प्यार हुआ। घरवाले, गांववाले, समाज, धर्म के ठेकेदार किसी ने साथ नहीं दिया। दोनों ने भागकर शादी कर ली। फिर पढ़िए... शादी की, निकाह नहीं। आसिफ चाहता तो निकाह पढ़ता। 


हिंदू भले ही बचपन में रामायण, गीता न पढ़ें, लेकिन मुस्लिम कुरान जरूर पढ़ते हैं। आसिफ ने भी पढ़ी होगी। ‘ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मद रसूल अल्लाह‘ भी रटा होगा। 


फिर भी आसिफ की ऐसी क्या मजबूरी थी जो मंदिर पहुंच गया। मूर्ति पूजा की। भगवा गमछा गले में डाला। दुआ मांगने की जगह हाथ जोड़ा। आसिफ को यह भी पता होगा कि इस दुस्साहस का हिसाब उसका परिवार चुकाएगा।


सबकुछ पता होने पर भी इस जोड़े ने अपने इश्क को सबसे ऊपर रखा। साथ जीने-मरने की कसम नहीं तोड़ी। एक हो गए। उनका एक होना सरकार को भी खटक गया। 


धड़धड़ाता बुलडोजर घर रौंदने पहुंच गया। असल में वह घर नहीं, इश्क के जुनून को रौंदने पहुंचा था। दुकानें तोड़ दीं। चंद दिनों पहले तक जो वैध था, आसिफ-साक्षी के इश्क की आंच से अवैध हो गया। 


ये बुलडोजर भी टोपी और तिलक देखता है। उसे चलाने वाला अपना दिल निकालकर स्टेयरिंग थामता है। जब दिल नहीं, तब इश्क का ककहरा भला क्या जाने। दिल धड़कता तो दिल्ली (Delhi) की अवैध बिल्डिंग (Mundka Fire) में 27 लोग नहीं जलते। 


लाल डोरा में बनी वह बिल्डिंग कागजों में सील थी। एनजीटी ने जुर्माना लगाया था। एमसीडी ने जुर्माना वसूलकर कागजों में सील लगाई थी। फिर भी धड़ल्ले से सब चल रहा था। चुनाव लड़ने की वहीं रणनीति भी बनी थी।


सवाल उठा सकते हैं कि आसिफ का घरौंदा बड़ा कातिल था या दिल्ली वाली बिल्डिंग? जब आंखों पर कट्टरता की पट्टी बंधी होगी तो जवाब नहीं मिलेगा। फिर तो हर आसिफ अतिक्रमणकारी ही दिखेगा। 


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