टीवी चैनलों की लाइव डिबेट में कई बार दूसरे तक आवाज पहुंचने में देरी की खामी तो देखी होगी। इसकी वजह लेटेंसी है। इंटरनेट पर जब हम कुछ टाइप करते हैं तो रिजल्ट आने में जो देरी होती है, उसे ही लेटेंसी कहते हैं। देरी का यह वक्त मिली सेकंड में होता है। शेयर मार्केट में मिली सेकंड की भी बड़ी अहमियत होती है। एनएसई में इसी मिली सेकंड का लाभ 2012 से 2014 के बीच कुछ खास लोगों को दिया गया। तब चित्रा रामकृष्णन यहां की प्रबंध निदेशक थीं।
कैसे खुला को-लोकेशन स्कैम
2015 में एनएसई को सिंगापुर से एक गुमनाम शिकायत मिली। जांच शुरू हुई, लेकिन तकनीकी तौर पर यह इतना उलझा मामला था कि एनएसई के अधिकारी एक साल तक कुछ समझ ही नहीं सके। इसी बीच एक साप्ताहिक ई-मैगजीन ने पूरे स्कैम पर खबर की। चित्रा ने इसे एनएसई की छवि खराब करने का प्रयास बताया। मैगजीन पर धौंस जमाने के लिए 100 करोड़ रुपये की मानहानि का केस ठोंक दिया।
मैगजीन की रिपोर्ट ने स्कैम से जुड़े मसले को काफी हद तक समझने लायक बना दिया। शेयर मार्केट की गतिविधियों पर नजर रखने वाली संस्था सेबी (SEBI) ने एक कंसल्टिंग सर्विस देने वाली कंपनी को हायर किया। उस कंपनी को एनएसई की फॉरंसिक ऑडिट का काम सौंपा। इस कंपनी में आईआईटी जैसे संस्थानों से पासआउट एक्सपर्ट की बड़ी टीम है। इसी कंपनी ने 2016 में को-लोकेशन का नाम लिया। बताया कैसे तकनीक का फायदा उठाकर कुछ लोगों ने एनएसई में गलत काम किया।
इस स्कैम के तार कई लोगों से जुड़े। हाल ही में मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर संजय पांडे को ईडी ने गिरफ्तार किया। आईपीएस संजय ने इस्तीफा देकर अपनी ब्रोकरेज कंपनी ओपीजी सिक्युरिटीज (OPG Securities) बनाई थी। को-लोकेशन स्कैम के केंद्र में यही कंपनी है। इस घोटाले में एनएसई की उस वक्त प्रबंध निदेशक रहीं चित्रा रामकृष्णन और पूर्व समूह संचालक आनंद सुब्रमण्यम को भी जेल भेजा गया है।
कैसे हुआ एनएसई में स्कैम (How the NSE scam happened)
लेटेंसी 4 तरीके से कम की जा सकती है। कम लेटेंसी मतलब, कंप्यूटर पर रिजल्ट जल्दी मिलेगा। ओएफसी अर्थात ऑप्टिकल फाइबर केबल से लेटेंसी बहुत कम हो जाती है। इसी तरह अगर सर्वर से करीब में बैठे हैं तो भी रिजल्ट आपके कंप्यूटर पर जल्दी मिलेगा। इन्हीं 2 उपायों के जरिए लेटेंसी को कम करके एनएसई के डेटा को आम लोगों से जल्दी देखा गया।
एनएसई का जहां सर्वर था, उसी जगह ओपीजी सिक्युरिटीज को काम करने की अनुमति दी गई। सर्वर के बिल्कुल बगल में बैठी ओपीजी को सूचनाएं जल्दी मिलने लगीं। यह बात बाकी ब्रोकरेज कंपनियों तक पहुंची तो उन्होंने भी करीब बैठने की इजाजत मांगी। दूसरी तरफ गुमनाम शिकायत पर सेबी हाथ-पैर मार रहा था। कहते हैं कि चित्रा ने सेबी का ध्यान भटकाने के लिए निष्पक्षता दिखाई और दूसरी कंपनियों को भी ओपीजी की तरह आसपास बैठने की इजाजत दे दी। जब दूसरी कंपनियां भी सर्वर के करीब बैठ गईं तो डेटा उनके पास भी उसी रफ्तार से मिलने लगा। ओपीजी को लाभ पहुंचाने के लिए फिर लेटेंसी के तीसरे तरीके को अजमाया गया।
सीबीएसई बोर्ड का रिजल्ट आता था तो वेबसाइट क्रैश होने की खूब खबरें सुने होंगे। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि एक ही वक्त में इतने यूजर जानकारी मांगने लगते हैं कि वेबसाइट का सर्वर सबको उतनी तेजी से जवाब ही नहीं दे पाता। हर कंपनी एक बैकअप सर्वर रखती है। डेटा सुरक्षित रखने और वेबसाइट के ऐसे भारी ट्रैफिक से बचकर कुछ जल्दी हासिल करने के लिए बैकअप सर्वर का इस्तेमाल होता है।
एनएसई के पास भी ऐसा ही बैकअप सर्वर था। जब ओपीजी के पास बाकी कंपनियां बैठ गईं तो सबको बराबर स्पीड में जानकारी मिलने लगी। फिर ओपीजी को लाभ पहुंचाने के लिए बैकअप सर्वर का एक्सेस दे दिया गया। मुख्य सर्वर पर ट्रैफिक ज्यादा होता था। ऐसे में वहां से आउटपुट मिलने में कुछ देर हो जाती, लेकिन बैकअप सर्वर पर ट्रैफिक नहीं होता था। वहां से ओपीजी को बाकी सबसे तेज सूचनाएं मिलने लगीं।
फॉरेंसिक जांच करने वाली कंपनी ने खोला राज
सेबी ने जिस कंपनी को एनएसई की फॉरेंसिक जांच का जिम्मा सौंपा था, उसने यह गड़बड़ी पकड़ी। कंपनी को पता चला कि ओपीजी को चंद सेकंड का जो लाभ मिला, उससे शेयर के रेट की जानकारी पहले हासिल कर ली। इसी जानकारी के आधार पर ट्रेडिंग कर हजारों करोड़ रुपये गलत तरीके से हासिल किए। सेबी ने इसी रिपोर्ट के आधार पर एनएसई पर 624.89 करोड़ रुपये का जुर्माना ठोंका। इस रकम पर एक अप्रैल 2014 से 12 पर्सेंट वार्षिक ब्याज देने का भी आदेश दिया। पूरे स्कैम की जांच अब ईडी और सीबीआई कर रही है।

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