Lal Bahadur Shastri को जब अखबारों में लेख लिखकर चलाना पड़ा घर का खर्च

लिखत-पढ़त से जुड़े लोग मुझे शुरू से प्रभावित करते रहे हैं। मेरे बाबा (दादा जी को बाबा कहता था) हमेशा कहते थे- मां सरस्वती की कृपा होगी तो लक्ष्मी हमेशा पास रहेंगी। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का इसी से जुड़ा एक किस्सा है। आज उनकी जयंती है तो देश के इस महान सपूत का जिक्र जरूरी है। 

साल 1963 की बात है। नेहरू मंत्रिमंडल में शास्त्री जी गृहमंत्री थे। उन्हें तब इस्तीफा देना पड़ा था। उस दौर में एक सांसद को 500 रुपये का मासिक वेतन मिलता था। दिल्ली के बंगले में इतनी रकम में पूरे परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था। अब मंत्री तो थे नहीं, ऐसे में जेब से बिजली का बिल भी देना पड़ता। 

कुलदीप नैयर एक दिन शास्त्री जी से मिलने पहुंचे। ड्राइंग रूम के अलावा पूरा बंगला अंधेरे में डूबा था। शास्त्री जी वहां अखबार पढ़ रहे थे। नैयर ने पूछा, अंधेरा क्यों है? शास्त्री जी ने कहा- "अब से मुझे इस घर का बिजली का बिल अपनी जेब से देना पड़ेगा। इसलिए हर जगह बत्ती जलाना बर्दाश्त नहीं कर सकता।"

नैयर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "मैंने उन्हें अख़बारों में लिखने के लिए मना लिया था। उनके लिए एक सिंडिकेट सेवा शुरू की, जिसकी वजह से उनके लेख द हिंदू, अमृतबाज़ार पत्रिका, हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपने लगे। तब हर अख़बार उन्हें एक लेख के 500 रुपये देता था।"

इस तरह शास्त्री जी की 2000 रुपये की अतिरिक्त कमाई होने लगी। नैयर ने लिखा है कि मुझे याद है कि उन्होंने पहला लेख जवाहरलाल नेहरू और दूसरा लेख लाला लाजपत राय पर लिखा था। 

मां भारती के इसी सपूत को अमेरिका ने 1965 की लडाई में आंख दिखाने की जुर्रत की थी। अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉन्सन ने धमकी दी थी कि अगर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़ाई बंद नहीं की तो पीएल 480 के तहत जो लाल गेहूँ भेजते हैं, उसे बंद कर देंगे।

वो वक्त था, जब देश अन्न संकट से जूझ रहा था। अक्टूबर 1965 में उस दिन पूरा देश दशहरे के उत्साह में डूबा था। दिल्ली के रामलीला मैदान में लोगों से भरे ग्राउंड में शास्त्री जी ने ऐतिहासिक भाषण दिया था। उस दिन पहली बार 'जय जवान, जय किसान' का नारा देश में गूंजा था। शास्त्रीजी ने लोगों से सप्ताह में एक दिन व्रत रखने की अपील की। उन्होंने खुद से यह व्रत शुरू किया। 

इस अपील ने गजब का जादू किया। हर घर में एक वक्त चूल्हा ठंडा पड़ गया। उसी धमकी का असर है कि आज हम गेहूँ की खेती में आत्मनिर्भर हैं। अन्न भंडार का रिजर्व इतना है कि कई महीने तक एशिया का पेट भरने की कूवत है। 


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