महानंदा महादेव की अनन्य भक्त थी। घर के मंदिर में एक शिवलिंग रखा था। रोज उसकी पूजा करती। पूरे सावन मौन व्रत रखती और रोज एक हजार बेलपत्र भोलेनाथ को अर्पित करती।
एक दिन उसने रुद्राभिषेक कराने का विचार किया। कश्मीर के पंडितों से निवेदन किया तो वे तैयार हो गए। पंडितों ने कहा, जहां होंगे भोलेनाथ, वहां जाने में क्या संकोच। पंडित रुद्राभिषेक कराने महानंदा के कोठे पर पहुंच गए।
भव्य अभिषेक से पूरा कोठा दिव्यमान हो गया। महादेव की पूजा में तो नृत्य, संगीत का भी विधान है। महानंदा ने भोलेबाबा के सामने अद्भुत नृत्य किया। पूजा संपन्न हुई। पंडितों को भी खूब दान-दक्षिणा देकर विदा किया।
महानंदा आराम करने के लिए बैठी, तभी दासी ने एक ग्राहक के आने की सूचना दी। महानंदा अपने कक्ष से निकलकर उसके स्वागत के लिए पहुंची। सोने की जिस कुर्सी पर खुद बैठती थी, उस पर अतिथि को बड़े प्रेम से बैठाया।
महानंदा सौंदर्य में जितनी समृद्ध थी, उतनी ही धन और सुख-सुविधाओं में भी। नौकर-चाकर, दसियों से पूरा कोठा भरा था। दिव्य सुगन्ध से पूरा वातावरण अलौकिक था। खाने-पीने की हर चीज उसके पास सुगम थी।
जो ग्राहक आया था, उसकी सुंदरता भी अलौकिक थी। वह युवा व्यापारी था। देखने में बेहद धनवान लग रहा था। कलाई में उसने एक कीमती कड़ा पहना था। हीरे, जवाहरात उसमें जड़े थे। कड़े की चमक ने महानंदा को भी मोह लिया। ग्राहक ने महानंदा की इच्छा देखकर कड़ा दे दिया और 3 दिन उसके साथ बिताने का प्रस्ताव रखा।
महानंदा राजी हो गई। उसका एक नियम था। जिस ग्राहक के साथ जब तक रहती, तब तक उसके पतिव्रता धर्म का पालन करती। ग्राहक ने कहा, मेरे पास एक दिव्य शिवलिंग है। हमेशा अपने पास रखता हूं। रोज इसकी पूजा से दिन का प्रारम्भ करने की आदत है। अगले 3 दिन मैं सिर्फ आराम करूंगा। अब 3 दिन तुम मेरी पत्नी हो तो इसकी पूजा करना।
महानंदा ने सहमति जताई तो ग्राहक ने कहा- ध्यान देना, इस शिवलिंग के साथ मेरी एक प्रतिज्ञा भी जुड़ी है। जिस दिन यह किसी तरह खंडित हुआ या जल गया तो चिता बनाकर देह त्याग दूंगा। महानंदा ने बेहद सावधानी से अपने मंदिर में शिवलिंग को रख दिया।
उसी रात महानंदा के कोठे में आग लग गई। महानंदा ने एक मुर्गा और एक बन्दर भी पाला था। रोज शिव पूजन करके उनपर भी भभूत मलती। उन दोनों जीवों को उसने आग से बचाकर बाहर किया। फिर ग्राहक के साथ खुद भी निकल गई।
कुछ देर बाद ग्राहक ने पूछा- महानंदा मेरा शिवलिंग कहां है? महानंदा को तब याद आया कि मंदिर से उसे निकालना भूल गई थी। शिवलिंग आग में जल गया। प्रतिज्ञा के तहत ग्राहक ने कोठे के सामने चिता सजाई। महानंदा ने बहुत रोकने का प्रयास किया, लेकिन वह अपने प्रण से डिगा नहीं। जलती चिता पर ग्राहक ने खुद को आग के हवाले कर लिया।
महानंदा तुरन्त गई और पूर्ण विवाहिता का श्रृंगार कर लौटी और जलती चिता में कूद गई। महानंदा ने भी 3 दिन पूर्ण पतिव्रता का संकल्प लिया था। उसी संकल्प के तहत वह अपने पति की चिता में सती हो गई।
महानंदा जैसे ही चिता में कूदी महादेव प्रकट हो गए। उनके 10 हाथ और 5 मुंख थे। महानंदा को सीने से लगाकर भोलेनाथ ने आग से बाहर किया। बोले हे महानंदा, आपके प्रेम और आस्था की परीक्षा लेने मैं ही ग्राहक के रूप में आया था। आपकी आस्था और प्रेम से मैं प्रशन्न हूं। मांगिए, क्या वर चाहती हैं।
साक्षात महादेव को देखकर महानंदा के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने कहा- हे महादेव, आपने मुझे अपनाया। अपने सीने से लगाया, यही मुझ अभागे के लिए बहुत है। कुछ देना ही चाहते हैं तो मेरे नंदी गांव के हर जीव, जड़, चेतन को कैलाश पर अपनी छाया में स्थान दें। महादेव खड़े रहे और महानंदा ने उनके सामने खुशी में अद्भुत नृत्य किया। भोलेनाथ ने कहा- तुम्हारे साथ जीव न रहे तो कोई बात नहीं, तुम्हारे शिव हैं, महादेव हैं।
हर हर महादेव, बम भोले

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