चीन की लड़ियों से इतनी नफरत तो पटाखों से प्यार क्यों

हम भारतीय होते बहुत भोले हैं। हमारा रहन-सहन, खान-पान, तीज-त्योहार प्रकृति के करीब होता था। हर त्योहार में उसके पकवान और मनाने के तरीकों का वैज्ञानिक महत्व था। विदेशियों को इसी से जलन थी। उन्होंने सिर्फ हमें लूटा नहीं, हमारी इन खुशियों को भी बदरंग किया। विदेशी चाहते थे कि उत्साह और उमंग का यह ईको सिस्टम टूट जाए। 

अब दिवाली के त्योहार को ही ले लीजिए। यह मौसम मच्छरों के लिए स्वर्णकाल होता है। हम सरसों तेल के दीये जलाकर त्योहार मनाते तो मच्छरों का नाश हो जाता। खूब दीये खरीदे जाते। कुम्हार का घर भी रोशन होता था। मिठाइयां घर में बनतीं। त्योहार पर दुकानें बंद होती और कामगार अपनों के बीच खुशियां मनाते थे।  

अब दीयों की जगह लड़ियों ने ले ली। बिजली खर्च बढ़ा, लेकिन फायदा कुछ नहीं हुआ। रोशनी की ऐसी चमक बिखरी कि पूरा ईको सिस्टम हिल गया। पशु-पक्षी परेशान हो गए। रात्रिचर डिप्रेशन में आकर दम तोड़ने लगे। पूरी दुनिया जलती थी हमारे दिवाली की चमक से। साफ-सुथरे त्योहार में फिर पटाखों का जहर घोला गया। हम तो पटाखों का नाम भी नहीं जानते थे। पड़ोसी देश चीन ने ऐसा जहर फैलाया कि अब हम दुनिया के दूसरे बड़े पटाखा निर्यातक बन गए। 

छठी सदी के आसपास का दौर था, जब चीन में पटाखों की खोज हुई। कहानी है कि चीनी सैनिक ने कोयले पर सल्फर फेंका, पोटैशियम नाइट्रेट और चारकोल के साथ मिलकर बारूद बन गया। धूप निकली तो उसकी गर्मी से इसमें तेज धमाका हुआ। फिर चीनी सैनिक बांस में भरकर विस्फोटक बनाने लगे। 

वहां सुख-शांति और बुरी आत्माओं को भगाने के लिए विस्फोट का रिवाज था। बारूद की खोज से पहले बांस को आग में डाल देते थे। उसकी गांठ गर्म होने पर फटती थी तो तेज आवाज होती। मान्यता थी कि इस आवाज से बुरी आत्माएं भाग जाती थीं। बारूद बना तो इस रिवाज को आगे बढ़ाने के लिए बारूद भरकर विस्फोट करने लगे। फिर तो हर खुशी के मौके पर बारूद का यह विस्फोट चलन बन गया। हमारी दिवाली को भी बदरंग करने बारूद वहीं से आया। 

इस दौर तक भी हम बारूद बनाने में ज्यादा अभ्यस्त नहीं थे। मुगलों का वह दौर था। 15वीं सदी में बाबर ने हमला किया तो जमकर बारूद का भी इस्तेमाल हुआ। बाबर ने तब यहां बारूद बनाने की कई फैक्ट्रियां लगवाईं। वक्त बीतता गया और बारूद की इन फैक्ट्रियों ने चेन्नई से करीब 500 किमी दूर शिवकाशी में अपना ठिकाना बना लिया।

शिवकाशी में आज पटाखों की 8 हजार से ज्यादा यूनिटें हैं। 10 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का यहां पटाखा कारोबार है। देश में पटाखों की कुल खपत का 90 पर्सेंट हिस्सा यहीं पर तैयार होता है। वैसे शिवकाशी के पटाखा किंग बनने की कहानी कोलकाता से शुरू होती है। 

षणमुगम नडार और अय्या नडार दो भाई थे। उन्होंने कोलकाता में माचिस बनाने की कला सीखी। 1922 में जब एक्सपर्ट हो गए तो अपने घर शिवकाशी लौट गए। वहां दोनों ने छोटी सी फैक्ट्री डाली। कारोबार जम गया तो 4 साल बाद दोनों अलग हो गए। माचिस बनाने से शुरू हुईं दोनों फैक्ट्रियां आज पटाखा उत्पादक के बड़े नाम हैं। 

चीनी सामानों का जिस उत्साह के साथ हमने बहिष्कार किया, उसी उत्साह के साथ अब पटाखों का भी बहिष्कार कीजिए। तमाम तरह के उदाहरण देकर इसे भारतीय संस्कृति से जोड़ने का पाप न कीजिए। हम शोर नहीं, ध्यान की शांति फैलाने वाले हैं। हमारा इतिहास प्रकृति को विकृत नहीं, आबाद करने का रहा है। पूरा दिल्ली एनसीआर जहरीली गैस का चैंबर बन जाता है। जिस घर में दमा के मरीज होंगे, उनकी हालत सोचकर देखिए। हम इतने निष्ठुर नहीं हो सकते कि अपनी खुशी में किसी के आंसू निकाल दें। भगवान श्रीराम के घर वापसी का उत्सव ऐसे मनाएं कि हर चेहरे पर मुस्कान बिखर जाए...

जय श्रीराम, शुभ दीपावली 

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