उदय माहूरकर ((Uday Mahurkar) और चिरायु पंडित (Chirayu Pandit) की लिखी इस किताब के अगले पड़ाव में वीर सावरकर की दया याचिका और सेल्युलर जेल (cellular jail) से रिहाई का जिक्र है।
सावरकर अपनी रिहाई के प्रयास के साथ जेल में रहने वाले दूसरे क्रांतिकारियों का भी मनोबल बढ़ा रहे थे। कहते थे, स्वाधीनता की लड़ाई बाकी हर चीज से ज्याद अहम है।
वे कैदियों को छत्रपति शिवाजी का उदाहरण देते। शिवाजी जब 1666 में आगरा में जब औरंगजेब की कैद में थे, तब उन्होंने भी मिर्जा राजा जय सिंह से संधि का प्रस्ताव रखा था। पुरंधर संधि के रूप में इसे जाना जाता है।
सावरकर कहते थे, जब आप कैद में हो तो पहली प्राथमिकता आजाद होने की रखें। आजादी से ही मिशन को कामयाब बना सकते हैं। शिवाजी के प्रबल अनुयायी सावरकर को 1910 में जब लंदन से गिरफ्तार कर लाया जा रहा था, तब फ्रेंच कोस्ट के पास फरार होने का असफल प्रयास किया था।
जब सावरकर को रिहा किया गया तो वामपंथी और इस्लामिक तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले उनके खिलाफ अभियान शुरू कर दिए। किताब में एक किस्से का भी जिक्र है, जब भगत सिंह और राजगुरु क्रांतिकारी गतिविधि के लिए सावरकर से मार्गदर्शन लेने पहुंचे थे।
बाद में जब भगत सिंह को फांसी पर लटकाया गया तो वामपंथी और मुस्लिम लेखकों ने उनकी हंसते हुए फांसी पर झूलने की कहानी और सावरकर की दया याचिका को मुद्दा बनाया। कुछ घटनाक्रम में सबूतों के आधार पर किताब में दावा किया गया है कि भगत सिंह सावरकर से बहुत प्रभावित थे। उनका बहुत सम्मान करते थे। वे न तो वामपंथी विचाराधारा को मानते थे और न ही नास्तिक थे। लेनिन की क्रांति को समझने के लिए उनकी किताब को जेल में पढ़े थे, जिसके आधार पर वामपंथी लेखकों ने भगत सिंह को वामपंथी प्रचारित कर दिया।
नेता जी सुभाष चंद्र बोस की आजाद फौज के सूत्रधार भी सावरकर थे। जून 1940 में नेता जी से मुंबई में उनके आवास पर मुलाकात हुई थी। इसी मुलाकात के 6 महीने बाद नेता जी देश छोड़कर फरार हुए थे।
1932 में सामने आया था पाकिस्तान
1932 में ही पाकिस्तान का नाम पब्लिक डोमेन में आ चुका था। मुस्लिम नेता गाहे-बेगाहे पाकिस्तान की मांग उठा रहे थे। चौधरी रहमत अली उस वक्त कैंब्रिज में पढ़ रहे थे। जिन्ना भी तब लंदन में थे।
दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने वाला था। सावरकर जानते थे कि हिंदुओं के सैन्यकरण का इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा। उन्होंने हिंदू युवाओं को ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।
सावरकर देख रहे थे कि मुस्लिम लीग से जुड़े लोग मुस्लिम युवाओं को ज्यादा से ज्यादा संख्या में ब्रिटिश सेना में भर्ती कराना चाहते थे। वे चाहते थे कि विश्व युद्ध के बाद मुस्लिम सैनिकों के दम पर पार्टिशन में ज्यादा लाभ ले सकें।
हिंदू महासभा और सावरकर की अपील के बाद लाखों हिंदुओं ने ब्रिटिश भारतीय सेना को जॉइन किया। मुस्लिम लीग ने कई बार आधिकारिक तौर पर भी ब्रिटिश सेना में हिंदुओं के ज्यादा शामिल होने पर ऐतराज जताया।
पार्टिशन के बाद 90 पर्सेंट से ज्यादा मुस्लिम ब्रिटिश भारतीय सैनिक पाकिस्तान का हिस्सा बन गए। ज्यादा हिंदू सैनिकों की वजह से भारत को इसका लाभ मिला। आजादी के कुछ महीनों बाद ही 1948 में पाकिस्तान ने जब कश्मीर पर हमला किया तब, इन्हीं सैन्य शक्ति की बदौलत उसे मात खानी पड़ी। 1965 की लड़ाई में भी ब्रिटिश भारतीय सेना से प्रशिक्षण पाए भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान को धूल चटाई। सावरकर की दूरदर्शिता का यह नतीजा था।
ब्रिगेडियर उस्मान (Brigadier Usman) को कैसे भूल गए लेखक
ब्रिगेडियर उस्मान सैम मानेकशॉ और मोहम्मद मूसा उनके बैचमेट थे, जो बाद में भारतीय और पाकिस्तानी सेना के चीफ बने थे। मुस्लिम सैन्य अधिकारी होने की वजह से सभी सोच रहे थे कि उस्मान पाकिस्तान जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।केंद्रीय राज्यमंत्री जनरल (रिटायर्ड) वीके सिंह (General VK Singh) की एक किताब है Leadership in the Indian Army - Biographies of Twelve Soldiers. इसमें ब्रिगेडियर उस्मान पर भी एक चैप्टर है। 1948 के युद्ध का जिक्र हो और ब्रिगेडियर उस्मान उर्फ नौशेरा के शेर का जिक्र न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। पाकिस्तान ने हमारे इस हीरो पर 50 हजार रुपये का इनाम रखा था। इस चैप्टर के एक हिस्से में जनरल ने लिखा है...
‘कबाइलियों के हमले नाकाम करने के बावजूद गैरिसन के सैनिकों का मनोबल बहुत ऊंचा नहीं था। विभाजन के बाद फैले सांप्रदायिक वैमनस्य की वजह से कुछ सैनिक अपने मुस्लिम कमांडर (उस्मान) की वफादारी के बारे में निश्चिंत नहीं थे। उस्मान को न सिर्फ़ अपने दुश्मनों के मंसूबों को ध्वस्त करना था, बल्कि अपने सैनिकों का भी विश्वास जीतना था। उनके शानदार व्यक्तित्व, व्यक्ति प्रबंधन और पेशेवर रवैये ने कुछ ही दिनों में हालात बदल दिए। उस्मान ने ब्रिगेड में एक दूसरे से बात करते हुए जय हिंद कहने का प्रचलन शुरू करवाया।’
जनरल वीके सिंह ने लिखा है कि मोहम्मद अली जिन्ना और लियाक़त अली दोनों ने कोशिश की कि उस्मान भारत में रहने का अपना फैसला बदल दें। उन्होंने उनको तुरंत पदोन्नति देने का लालच भी दिया, लेकिन उस्मान अपने फ़ैसले पर कायम रहे। ब्रिगेडियर उस्मान 3 जुलाई 1948 को 36 साल की उम्र में पाकिस्तानी घुसपैठियों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। महावीर ब्रिगेडियर को जामिया मिलिया इस्लामिया में दफनाया है।
कहते हैं कि ब्रिगेडियर उस्मान ने कभी शराब नहीं पी। वे शाकाहारी और अविवाहित थे। अपनी तनख्वाह का अधिकतर हिस्सा गरीब बच्चों पर खर्च करते थे।
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